भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

राँगा और सीसा के पत्रकों का बन्धन लगाना चाहिए। अस्थिभंग होने पर काठ की पट्टी, मोटा चमड़ा, वृक्ष की मोटी छाल अथवा कुश ( बाँस की पट्टी ) ऊपर से रखकर बन्धन लगाना चाहिए ॥५७-५८॥

स्वनामानुगताकारा बन्धास्तु दश पञ्च च ॥५९॥

कोशस्वस्तिकमुत्तोलौचीनदामानुवेलितम्।खड़ाविबन्धस्थगिकावितानोत्सङ्गगोष्फणाः ॥६०॥

यमकं मण्डलाख्यं च पञ्चाङ्गी चेति योजयेत्।

( विदध्यातेषु तेज्येव कोशमङ्गुलिपर्वसु। स्वस्तिकं कर्णकक्षादिस्तनेषूक्तं च सन्धिषु ॥१॥

मुत्तोलौ मेदुग्रीवादी युज्याच्चीनमपाङ्गयोः। सम्ब्राधेऽङ्गै तथा दाम, शाखास्वेवानुवेलितम् ॥

खड़ां गण्डे हन्तौ शङ्खे, विबन्धं पूछकोदरे। अङ्गुष्ठाङ्गुलिमेद्वग्रे स्थगिकामन्त्रवृद्धिषु ॥३॥

वितानं पृथुलाङ्गद्वया तथा शिरसि चरेयेत्। विलिम्बिन तथोत्सङ्गं, नासीष्ठचिबुकद्विषु ॥४॥

गोष्फणं सन्धिषु तथा, यमकं यमिके ब्रणे। वृत्तेऽङ्गै मण्डलाख्यं च, पञ्चाङ्गै चोर्ध्वजत्रषु ॥५॥ )

यो यत्र सुनिबिष्टः स्यात् तेषां तत्र बुद्धिमान् ॥६१॥

बन्धन-भेदों का निर्देश—बन्ध ( बन्धन ) के पन्द्रह भेद अपने-अपने नाम के अनुरूप होते हैं। वे इस प्रकार कहे गये हैं—१. कोश, २. स्वस्तिक, ३. मुत्तोलौ, ४. चीन, ५. दाम, ६. अनुवेलित, ७. खट्वा, ८. विबन्ध, ९. स्थगिका, १०. वितान, ११. उत्संग, १२. गोष्फणा, १३. यमक, १४. मण्डल तथा १५. पंचांगी। ( उन-उन अंगुलियों के पोरों को कोशबन्ध से, कान, कक्षा आदि में तथा स्तनों के बीच में स्वस्तिक बन्ध से, ग्रीवा एवं शिषन में उत्तोलौ या मुत्तोलौ बन्ध से, नेत्रप्राप्तों को चीन बन्ध से, पीड़ित अंगों को दाम बन्ध से, टाँगों तथा बाँहों को अनुवेलितक बन्ध से, गण्डस्थल, हनु तथा शंखप्रदेश को खट्वा बन्ध से, पीठ तथा उदर को विबन्ध नामक बन्ध से, अंगुठा, अंगुलि को मेद्व ( लिं ) के अगले भाग तथा अन्त्रवृद्धि को स्थगिका बन्ध से, मूर्धा आदि चौड़े अंगों को वितान बन्ध से, अंग-विशेष को तथा लटकनेवाले हाथ, पैर आदि को उत्संग बन्ध से, नासिका, होंठ तथा ठोड़ी की अस्थियों को गोष्फणा बन्ध से, यमल ग्रणों को यमक बन्ध से, गोलकार अंगों को यमल बन्ध से और ऊर्ध्वजत्र के अवयवों को पंचांगी बन्ध से बाँधना चाहिए ॥१-५॥ ) विशेष निर्देश—उक्त बन्धों में जो बन्ध जिस अवयव पर भलीभाँति बाँधने के बाद स्थिर रह सके बुद्धिमान् चिकित्सक को चाहिए कि उसे उस अवयव पर बाँधे ॥५९-६१॥

बत्कव्य—सुश्रुत ने १४ बन्धन स्वीकार किये हैं। देखें—सु. सू.१८।१७-१८। ये पाँच प्रायः अनेक संस्करणों में नहीं पाये जाते। प्रसंगोचित होने के कारण इन्हें यहाँ उद्धृत कर दिया गया है।

बन्धीयाद्वाट्टमूरुस्फिककक्षावक्षणमूर्धसु । शाखावदनकर्णैःपूछपाषर्द्यगलोदरे ॥६२॥

सप्तं मेहनमुष्के च, नेत्रे सन्धिषु च श्लयम्। बन्धीयाच्छिथिलस्थाने वातश्लेष्मोदभवै समम् ॥

गाढमेव समस्थाने, भ्रूणं गाढं तदाशये। शीते वसन्तेऽपि च तौ मोक्षणीयौ श्र्यहात्यहात् ॥६४॥

पित्तरक्तोत्थोर्बन्धो गाढस्थाने समो मतः। समस्थाने श्लथो, नैव शिथिलस्याशये तथा ॥६५॥

सायं प्रातस्तयोर्माक्षो ग्रीष्मे शरदि चेष्यते।

पुनः बन्धभेद-निर्देश—विधिभेद से बन्ध ( बन्धन ) तीन प्रकार के होते हैं—१. गाढ़, २. सम तथा ३. शिथिल। १. गाढ़ बन्धन के स्थल—ऊरू ( दोनों टाँगों ) में, स्फिक ( चूतड़ों में ), कक्षा ( कानों ) में, वंशण ( कूलों ) में तथा सिर। २. समबन्धन के स्थल—शाखाओं, मुख, दोनों कानों, उरसु ( छाती ), पीठ, पसलियों, गला, उदर, मेहन ( लिं तथा अण्डकोषों ) और ३. शिथिल बन्धन के स्थल—नेत्रों तथा सन्धियों में उत्पन्न ग्रणों पर इन बन्धनों को बाँधना चाहिए। वातकफज प्रधान ग्रणों पर शिथिल बन्धन के स्थान पर सम और सम बन्धन के स्थान पर गाढ़ बन्धन तथा गाढ़ बन्धन के स्थान पर अधिक गाढ़ बन्धन बाँधना चाहिए। शीतकाल में तथा वसन्त ऋतु में तीन-तीन दिन में वे ( वात-कफज ब्रणबन्धन ) खोलने चाहिए। पित्तरक्त-प्रधान ग्रणों पर गाढ़ बन्धन करने योग्य स्थान पर सम बन्धन बाँधना चाहिए।