अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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सम बन्धन के स्थान पर शिथिल बन्ध और शिथिल बन्ध के स्थान पर बन्धन लगाना ही नहीं चाहिए, केवल उसे मक्बी, धूल आदि से बचाना चाहिए। पितरक्त-प्रधान ब्रणों पर बाँधे गये ब्रणबन्धनों को ग्रीष्म एवं शरद ऋतुओं में सायंकाल तथा प्रातःकाल दो बार खोलना, साफ करना और पुनः बाँध देना चाहिए॥ ६२-६५॥
बक्तव्य —सुश्रुत, वृद्धावगभट तथा वाग्भट ने ब्रणबन्धन के कालों में पाँच ऋतुओं का नामतः इस प्रकार उल्लेख किया है—शीतऋतु ( हेमन्त-शिशिर ), वसन्त-ग्रीष्म तथा शरद किन्तु वर्षा ऋतु को छोड़ दिया है, ऐसा पाठक-वर्ग कह सकता है। उसका समाधान इस प्रकार है—वर्षा ऋतु में जब पानी नहीं बरसता तो वह ग्रीष्म के अनुरूप होती है और जब पानी बरसता रहता है तब वह शीत होती है। इसी दृष्टि से चिकित्सक इस ऋतु में बन्धन खोलने एवं बाँधने का निर्णय लें। ध्यान रहे, बन्धन खोलने के साथ ही विकेशिका ( ब्रण के भीतर रखी गयी बत्ती ) और कवलिका को भी बदल दें। इस विषय में सुश्रुत के उपदेशों पर भी दृष्टिपात कर लें—सू. १८।२२ से २६ तक। शास्त्रीय निर्देशों को न मानने से होने वाले दुष्परिणामों के लिए देखें—सू. १८।२७।
अबदो दंशमशकशीतवांतादिपोडितः॥ ६६॥
वृष्टीभवेच्चिरं चात्र न तिष्ठेत्तन्हेभेषजम्। कृच्छ्रेण शुद्धिं रुद्धिं वा याति रुदो विवर्णताम्॥ ६७॥
ब्रणबन्धन आवश्यक —ब्रण के ऊपर बन्धन न बाँधने से दंश ( डीस ), बडे मच्छर एवं छोटे मच्छर उस स्थान पर बैठकर काटते हैं, ठण्डी लगती है, हवा का उस पर प्रभाव पड़ता है, आदि शब्द से धूल, मिट्टी, मक्बी, तिनका का ग्रहण कर लेना चाहिए। इन सबके सम्पर्क से ब्रण दूषित हो जाता है और उस पर लगाया गया घी, औषध ( लेप-मलहम आदि ) भी स्थिर नहीं रहने पाते। ब्रण का अत्यन्त कष्ट से शोधन तथा रोपण हो पाता है और ब्रणस्थान का वर्ण सदा के लिए विकृत हो जाता है॥ ६६-६७॥
बद्धस्तु चूर्णितो भग्नो विम्बिलः पाटितोऽपि वा। छिन्नस्नायुसिरोऽध्याशु सुखं संरोहति ब्रणः॥ उत्थानशयनाद्यासु सर्वेहासु च पीड्यते। उद्वृत्तोष्ठः समुत्सन्नो विषमः कठिनोऽतिरुक्॥ ६९॥
समो मूदुररुक् शीघ्रं ब्रणः शुध्यति रोहति।
ब्रणबन्धन से लाभ —ब्रण के ऊपर पट्टी बाँधने से चूर्णित ब्रण, भग्न ब्रण, पाटित ब्रण तथा जिसकी स्नायु या सिरा कट गयी हो, ऐसा ब्रण भी शीघ्र सुखपूर्वक ( सरलता से ) भर जाता है। उठने, सोने, लेटने, चलने, फिरने आदि सभी प्रकार के व्यवहारों में ब्रणरोगी को कष्ट नहीं होता। जिस ब्रण के चारों ओर के किनारे उल्टे हों, समुत्सन्न अर्थात् चारों ओर से ऊपर की ओर को उभरा हुआ, विषम ( जो स्पर्श में कठोर ) हो, जिसमें अधिक पीड़ा हो वह ब्रण अपने अशुभ रूप को छोड़कर शीघ्र भीतर से शुद्ध होकर भर जाता है॥ ६८-६९॥
बक्तव्य —सुश्रुत के अनुसार समुचित प्रकार के बन्धन से ब्रण सुरक्षित और ब्रणरोगी सुखी रहता है। देखें—सू. १८।३१।
स्थिराणामल्पमांसाणां रौक्ष्यादनुरोहताम्॥ ७०॥
प्रच्छाद्यमौषधं पत्रैर्यादाेषं यथर्तु च। अजीर्णतिरुणाच्छिद्रेः समस्तात्सुनिवेशितैः॥ ७१॥
धौतैरकर्कशैः क्षीरिभृजार्जुनकदम्बजैः।
पत्रदान-उपक्रम —जो ब्रण चिरकाल से चला आ रहा हो, जिन ब्रणों की भूमि में मांस बहुत थोड़ा हो तथा जिन ब्रणों का रोपण रुक्षता के कारण नहीं हो रहा हो, उनमें लगाये जाने वाले औषधद्रव्य ( मलहम ) को पत्तों द्वारा ऊपर से ढक देना चाहिए। ये पत्र वात आदि दोषों तथा ऋतुओं के अनुरूप हों। वे पत्र पुराने ( पके या सूखे ) न हों, तरुण ( कच्चे ) न हों, वे छिद्र युक्त न हों, चारों ओर भलीभाँति रखे हों, वे धुले हों, खुरदरे न हों। वे पत्र क्षीरीवृक्षों के, भोजपत्र के, अर्जुन तथा कदम्ब वृक्ष के हों॥ ७०-७१॥