भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

वक्तव्य —‘यथादोषं यथर्तुं च’—वातव्रण में शीत ऋतु में स्तिग्ध तथा उष्णवीर्य वाले हों, पित्तव्रण तथा उष्णकाल में शीतवीर्य वाले हों, कफव्रण तथा ग्रीष्मकाल में रूक्ष एवं शीतवीर्य हों।

पत्रदान —सुश्रुत ने व्रण के ६० उपक्रमों की चर्चा की है। देखें—सु. चि. १।८। इसी में एक उपक्रम ‘पत्रदान’ भी है, इसका वर्णन विस्तार से देखें—‘पत्रदान’—‘विजनता’। (सु.चि. १।११२-११८) चरक-संहिता में ३६ व्रणों के ही उपक्रमों का उल्लेख किया गया है। देखें—‘यथाक्रम’—‘समुपक्रमः’। (च.वि. २५।३९-४३) इन स्थलों का अवश्य अवलोकन करें।

कृष्णिनामग्निदग्धानां पिटिकामधुमेहिनाम् ॥ ७२ ॥

कर्णिकाश्चोन्द्रविषे क्षारदग्धा विषान्विताः। बन्धनीया न मांस्याके गुदपाके च दारुणे ॥ ७३ ॥

शीर्यमाणाः सहृदवाहः शोफावस्थाविसर्पिणः।

व्रणबन्धन का निषेध —कूष्ठरोगियों के, अग्निदाह के, मधुमेह के, मूषिकविष की कर्णिकाएँ, क्षारदग्ध व्रण, विषयुक्त व्रण, दारुण मांसपाक के व्रण, गुदपाक के व्रण, जो व्रण फट या गल रहे हों, जिनमें पीड़ा तथा दाह हो रहा हो, जो शोथ युक्त व्रण हों और विसर्पयुक्त व्रणों में बन्धन नहीं बांधना चाहिए ॥ ७२-७३ ॥

वक्तव्य —सुश्रुत ने भी व्रणबन्धन का निषेध किया है। देखें—सु. सू. १।८। ३२-३४। व्रणवास्तु पर मक्षिकाएँ न बैठें, घूल आदि न पड़े इस दृष्टि से साफ वस्त्र से उसे सदैव ढककर रखें।

अरक्षया व्रणे यस्मिन् मक्षिका निक्षिपेत्कुमीन् ॥ ७४ ॥

ते भक्षयन्तः कुर्वन्ति रूजाशोफासंस्रवान्। सुरसादि प्रयुज्जीत तत्र धावनपूरणे ॥ ७५ ॥

सप्तपर्णकरञ्जाकिनिम्बराजादनत्वचः। गोमूत्रककितो लेपः सेकः क्षाराम्बुना हितः ॥ ७६ ॥

प्रच्छाद्य मांसपेश्या वा व्रणं तानाशु निर्हरेत्।

व्रणज क्रिमियों का वर्णन —सुरक्षा (देख-रेख) न होने के कारण जिस व्रण (घाव) में मक्षिकाएँ क्रिमियों को डाल जाती हैं, वे बड़े होकर उस व्रण के मांस आदि को खाते हुए उस स्थान पर पीड़ा, शोथ, रक्तस्राव को पैदा कर देते हैं। इन क्रिमियों को मारने के लिए सुरसादि गण (अ. हू. सू. १५।३०-३१) का प्रयोग व्रण को धोने तथा रोपण के लिए करें। अथवा—सप्तपर्ण (छतिवन), करंज (डिठ्ठीरी), मदार, नीम तथा राजादन (खिरनी) इनकी छालों को गोमूत्र में पीसकर उसका लेप करें अथवा जौवार आदि किसी क्षार के जल से सेक (सेचन) करें अथवा मांसपेशी से व्रण को ढककर क्रिमियों को शीघ्र वहाँ से हटा दें ॥ ७४-७६ ॥

वक्तव्य —‘मक्षिका निक्षिपेत् क्रिमीन्’—यहाँ जिस मक्षिका का वर्णन श्रीवामभट ने किया है, वह ‘जन्तुमाता’ है। इसका वर्णन देखें—अ.हू.नि १।४।४२-५६। इसे किरानी मक्खी भी कहते हैं। ‘प्रच्छाद्य मांसपेश्या’—बकरा आदि के मांस का टुकड़ा उस स्थान पर कुछ देर रख देने से वे क्रिमि उस दूषित व्रण को छोड़कर इस मांस में लिपट जाते हैं, अतः इसे उठाकर फेंक दें।

न चैतनं त्वरमाणोऽन्तः सदोषमुपरोहयेत् ॥ ७७ ॥

सोऽल्पेनाप्यपचारण भूयो विकुरुते यतः।

रोपण में शीघ्रता का निषेध —जब तक व्रण (घाव) के भीतर किसी प्रकार का दोष (पूयशोथ आदि) शेष है, तब तक रोपण (घाव को भरने) रूपी कार्य में शीघ्रता (जल्दीबाजी) नहीं करनी चाहिए, अपितु व्रण का भलीभाँति शोधन करता रहे। क्योंकि वह व्रण थोड़ी भी भूल रह जाने के कारण फिर विकृत हो जाता है ॥ ७७ ॥

वक्तव्य —‘भूयो विकुरुते’ अर्थात् यदि पूय के भीतर रहते हुए उसका रोपण कर दिया जाता है तो यह पुनः नाडीव्रण (नासूर) के रूप में भयंकर हो जाता है। अतः पूर्ण शोधन करने के बाद ही रोपण करें।