अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशस्त्रकर्मविधिर्ध्यायः २९ ]
सूत्रस्थानम्
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रूढेऽप्यर्जोर्णव्यायामव्यवायादीन् विवर्जयेत् ॥ ७८ ॥
हर्ष क्रोधं भयं चापि यावदास्थैर्यसम्भवात्। आदरेणानुवर्त्योऽयं मासान् षट् सप्त वा विधिः ॥
रोपण के पश्चात्कर्म—ब्रण का भलीभाँति रोपण हो जाने पर भी जब तक ब्रणस्थान पर स्थिरता न आ जाय तब तक अर्जीर्णकारक भोजन से, व्यायाम (अधिक शारीरिक परिश्रम) से तथा स्त्री-सहवास आदि कर्मों से अपने को बचाता रहे; हर्ष (प्रसन्नता), भय, क्रोध आदि से अपने को बचाये। इन नियमों का छः अथवा सात महीनों तक आदर के साथ पालन करना चाहिए अर्थात् इनकी उपेक्षा न करें ॥ ७८-७९ ॥
उत्पद्यमानासु च तासु तासु वार्तासु दोषादिबलानुसारी।
तैस्तेरुपायेः प्रयतश्चिकित्सेदालोचयन् विस्तरमुत्तरोक्तम् ॥ ८० ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने शस्त्रकर्मविधिर्नामिकोन्नत्रिशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
चिकित्सा-निर्देश—बीच-बीच में उत्पन्न हो जाने वाली ब्रण की विविध परिस्थितियों में दोष, देश, काल आदि के बलाबल का विचार करता हुआ चिकित्सक उत्तरस्थान में कही गयी चिकित्सा-विधियों पर ध्यान देता हुआ उन-उन उपायों द्वारा चिकित्सा करे ॥ ८० ॥
वक्तव्य—अष्टांगहृदय-उत्तरस्थान के २५ से ३० तक के अध्यायों में प्रस्तुत विषय का विस्तार से वर्णन किया गया है। ब्रणचिकित्सा के अवसर पर उक्त स्थलों का भी पर्यालोचन अवश्य कर लेना चाहिए, इससे चिकित्सा-कार्य में सहायता मिलेगी। ऐसा ही निर्देश वृद्धवाग्भट ने भी अ. सं. सू. ३८।४७ में दिया है। किसी विषय को पहले सूवरूप में कहकर बाद में विस्तार से उसका वर्णन करना यह तन्त्रकारों की परम्परा देखी जाती है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा बिरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विमृषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
शस्त्रकर्मविधि नामक उन्तीसवों अध्याय समाप्त ॥ २९ ॥