अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशोऽध्यायः
अथातः क्षारग्रिकर्मविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से क्षारकर्म तथा अधिकर्म की विधियों की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इनके विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—‘क्षारग्रिकर्म’—क्षार का बाहर तथा भीतर उपयोग होने के कारण इसका पहले निर्धारण सम्बन्धी दाहकर्म केवल बाहरी अवयवों पर ही होता है। इसी के २९वें अध्याय में शस्त्रसाध्य रोगों में किया गया है और अपि द्वारा होने वाला चिकित्सा शस्त्रप्रयोग का वर्णन किया गया, उसके बाद अब इस ३०वें अध्याय में क्षारकर्म तथा अधिकर्म का वर्णन किया जा रहा है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सु.सू. ११ एवं १२; च.सू. ११५५; च.वि. ११५; च.चि. ५१३९ शस्त्र; च.चि. २५१०१-१०६ शस्त्र; च.चि. २५१०७ क्षार और अ.सं.सू. ३९ तथा ४० में देखें।
सर्वशस्त्रानुशस्त्राणां क्षारः श्रेष्ठो बहूनि यत्। छेद्यमेद्यादिकर्माणि कुरुते विषमेष्वापि ॥ १ ॥
दुःखावचार्यशस्त्रेषु तेन सिद्धिमात्सु च। अतिकृच्छ्रेषु रोगेषु यच्च पानेऽपि युज्यते ॥ २ ॥
क्षार-प्रशंसा—उपयोगिता की दृष्टि से क्षार नामक पदार्थ सभी शस्त्रों तथा अनुशस्त्रों में श्रेष्ठ ( प्रधान या उत्तम ) माना गया है, क्योंकि यह अनेक ऐसे विषम स्थलों में भी छेदन, भेदन तथा लेखन कर्म सरलता से कर देता है, जैसा शस्त्र नहीं कर पाता। नासाशर्, अर्बुद आदि रोगों में जहाँ शस्त्रों का प्रयोग बड़ी कठिनाई से किया जा सकता है, वहाँ भी इस क्षारप्रयोग से सरलता मिल जाती है। इनके अतिरिक्त और भी अनेक कष्टसाध्य रोगों में इसका प्रयोग पानीय क्षार के रूप में किया जाता है ॥ १-२ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने कहा है—‘स द्विविधः प्रतिसारणीयः पानीयश्च’ । ( सु.सू.११६ ) प्रतिसारणीय क्षार वह है, जो लेपन आदि बाह्य प्रयोगों में लिया जाता है। पानीय क्षार उसे कहते हैं जो मन्दाग्नि आदि में पिलाया जाता है। जैसे—सोडावाटर आदि।
स पेयोऽशौऽग्निसादाशमगुल्मोदरगरादिवृ ।
पानीय क्षार-प्रयोग—वह पानीय क्षार अर्श, मन्दाग्नि, अश्मरी, गुल्म, उदरविकार, विषविकार; आदि पद से अजीर्ण, अरुचि, अफरा और क्रिमिरोग में पीना चाहिए।
योज्यः साक्षात्मषश्चित्रबाह्याशःकुष्ठसुषिषु ॥ ३ ॥
भगन्दरार्बुदग्रन्थिदुष्टनाडीव्रणादिवृ ।
अन्वत्र क्षार-प्रयोग—इन रोगों में प्रतिसारणीय क्षार का प्रयोग करें—मष या मषक ( मरसा ), श्वित्र ( किल्लास या सफेद कोढ़ ), बाहरी अर्श, कुष्ठ, सुषि ( त्वचा का सूख हो जाना ), भगन्दर, अर्बुद, ग्रन्थि ( रोग-विशेष ), दूषित नाडीव्रण तथा आदि शब्द से चर्मकील, त्यच्छ, व्यंग, किटिभकुष्ठ, रोहिणी, उपकुश, अधिजिह्वा, उपजिह्वा, सर्पदश, वृथिकदंश, वाह्यविद्रधि और रोहिणी रोगों में क्षार का साक्षात् प्रयोग करना चाहिए ॥ ३ ॥
न तृषयोऽपि योक्तव्यः पिते रक्ते चलेऽबले ॥ ४ ॥