अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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ज्वरेऽतिसारे हृन्मूर्धुरोगे पाण्डुवामयेऽरुचौ । तिमिरे कृतसंशुद्धौ श्वयथौ सर्वगान्नगौ ॥ ५ ॥ भीरुगर्भिण्यतुमतीप्रोद्भूतफलयोनियु । अजीर्णोऽन्ने शिशौ वृद्धे धमनीसन्धिर्मस्यु ॥ ६ ॥ तरुणास्थिसिरास्नायुसेवनीगलनाभिषु । देशेऽल्पमासे वृषणमेद्ग्रोतो नखान्तर ॥ ७ ॥ वर्त्स्वरोगादृतेऽक्षगोश्च शीतवर्षोष्णदुर्दिने ।
क्षार-प्रयोग का निषेध—निम्नलिखित रोगों में उक्त दोनों प्रकार के क्षारों का निषेध किया गया है—पित्तज रोग, रक्तज रोग, वातज रोग, दुर्बल पुरुष ( या स्त्री ), ज्वर, अतिसार, हृदयविकार, शिरोरोग, पाण्डुरोग, अर्चि, तिमिररोग, वमन-विरचन द्वारा संशोधन करने के बाद, सम्पूर्ण शरीर में शोथ होने पर, डरपोक पुरुष ( या स्त्री ), गर्भिणी, रजस्वला, उदावृत्ता नामक योनिय्यापद् रोग, अजीर्ण, बालक, वृद्ध, धमनी, सन्धिस्थल, मर्मस्थल, तरुणास्थस्थल, सिरा, स्नायु, सेवनी, गल, नाभि, अल्प मांस वाले स्थानों पर, वृषण ( अण्डकोष ), मेद्व ( लिम्फ ), नख के भीतर, वर्त्स्वरोग को छोड़कर अन्य नेत्ररोगों में, शीतकाल, वर्षाकाल, उष्ण ( ग्रीष्म ) काल तथा दुर्दिन ( जब आकाश में बादल छाये हों ) में क्षार-प्रयोग न करें ॥ ४-७ ॥
वक्तव्य—श्रीवामभट के उक्त निर्देश का आधार मु.सू. ११।७, ८, ९ गद्य हैं। इसी के आगे ११वें गद्य में इन्होंने प्रतिसारणीय क्षार के तीन भेद—मुद्ग, मध्य तथा तीक्ष्ण का निर्देश करके इनके निर्माण की विधि भी बतलाई है।
कालमुष्ककशम्याककदलीपारिभद्रकान् ॥ ८ ॥
अश्वकर्णमहावृक्षपलाशस्फोटवृक्षकान् । इन्द्रवृक्षार्कपूतीकनक्तमालाश्वमारकान् ॥ ९ ॥ काकजङ्गसपागार्मग्रिमम्याग्रितिल्वकान् । साद्रीन् समूलशखांदादीन् खण्डशः परिकल्पितान् ॥ कोशातकीश्वतस्रश्च शूकं नालं यवस्य च । निवाते निचयोक्तृत्य पुथक् तानि शिलातले ॥ ११ ॥ प्रक्षिप्य मुष्ककचये सुधाश्रमानि च दीपयेत् । ततस्तिलानां कुतलैर्दध्वाऽग्नौ विगते पृथक् ॥ १२ ॥ कृत्वा सुधाश्रमनां भस्म द्रोणं त्वितरभस्मनः । मुष्ककोत्तरमादाय प्रत्येकं जलमूत्रयोः ॥ १३ ॥ गालयेदधभारेण महता वाससा च तत् । यावत्यिच्छिलरक्ताच्छस्तीक्ष्णो जातस्तदा च तम् ॥ १४ ॥ गृहीत्वा क्षारनिष्पन्दं पचेलौह्यां विघटयन् । पच्यमाने ततस्तस्मिंस्ताः सुधाभस्मशर्कराः ॥ १५ ॥ शुक्तीः क्षीरपकं शङ्खानाभीश्चायसभाजने । कृत्वाऽग्रिवर्णान्बहूशः क्षारोत्ये कुडवोन्मिते ॥ १६ ॥ निर्वाप्य पिष्ट्वा तेनैव प्रतीवायं विनिक्षिपेत् । श्लक्षणं शकुदक्षशिखिगृधकङ्ककपोतजम् ॥ १७ ॥ चतुष्पात्यक्षिपितालमनोहालवणानि च । परितः सुतरां चातो दय्यां तमवघट्टयेत् ॥ १८ ॥ सबार्धेश्च यदोतिष्ठेद् बुद्धैर्लैहवद्वनः । अवतार्य तदा शीतो यवराशावयोमये ॥ १९ ॥ स्थाप्योऽयं मध्यमः क्षारो—
मध्यम क्षार के निर्माण की विधि—कालामुष्क ( मोखा ), अमलतास, केला, पारिभद्रक ( फरहद ), अश्वकर्ण ( सर्जरस भेद ), महावृक्ष ( सेहण्ड वृक्ष ), पलाश, आस्फोट ( कोविदार भेद ), कुटज, इन्द्रवृक्ष ( अर्जुन ), मदार, पूतिकरञ्ज, नक्तमाल ( बृहत् करञ्ज ), अश्वमार ( कनेर ), काकजघा, अपामार्ग, अरणी, अग्नि ( चित्रक ) तथा लोध—इन सबके गीले मूल, शाखा आदि को लेकर इनके छोटे-छोटे टुकड़े कर लें और चारों प्रकार की कोशातकी ( नेनुआ, घियातोरई ) के जड़, पत्ते, फूल लता सहित लें, जी के शूक तथा नाल लें। इन सबको हवा रहित स्थान में रखकर अलग-अलग ढेर लगायें। मोखा के ढेर में चूने के पत्थरों को रख कर उन्हें तिल की लकड़ियों के साथ सभी द्रव्यों के समूहों को जला डालें। अग्नि के बुझ जाने तथा गर्मी के शान्त हो जाने पर चूना बने हुए उन पत्थरों को उस ढेर में से अलग रख लें। यह चूना की भस्म १ द्रोण = १०२४ तोला हो और अमलतास आदि की भस्म १ द्रोण तथा मोखा की भस्म सवा ( १ १/२ ) द्रोण होनी चाहिए।