भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदय

क्षारगालन-विधि —उक्त सभी भस्मों को अलग-अलग लेकर आधा भाग = ४-४ हजार तोला जल एवं गोमूत्र में घोलकर कुछ समय तक रहने ( टिकने ) दें, उसके बाद मोटे वस्त्र में डालकर उसका जलीय भाग अलग कर दें। फिर भी उस शेष भाग में से जब तक पिच्छिल ( चिपचिपा ), लाल, साफ तथा तीक्ष्ण द्रव निकलता रहे तब तक उसे वस्त्र से छानता रहे, बाद में उस गाढ़े भाग को फेंक दें और उस जलीय क्षार को लोहे की कड़ाही में डालकर पकाना प्रारम्भ कर उसे लोहे की करछल से चलाता रहे। जब वह क्षारीय जल पक रहा हो उस समय उसमें से १ कुड्व = ४ पल = १६ तोला उस क्षारीय द्रव को लेकर दूसरे लोहापत्र में डाल दें। उसमें वे चुने के फूँके हुए पत्थर, शुक्ति, क्षीरपंक ( खड़िया मिट्टी का गीला भाग ) और श्वननाभि को अग्नि में तपाकर लाल करके उस कुड्वभर जल में तीन-तीन बार बुझा-बुझाकर उसी में डालें। फिर उसी क्षारद्रव से इन्हें पीस कर कड़ाही में डालें हुए १ कुड्व क्षारीय जल में मिला दें। तदनन्तर उसमें मुरगा, मोर, गीध, कंक तथा कबूतर की बीट ( मल ) को पीसकर डालें। गाय आदि चौपायों, मोर आदि पक्षियों के पित्त को; हरिताल, मैनसिल, सभी नमकों को ४-४ तोला पकते हुए उस क्षारद्रव के ऊपर बुरक कर कड़छल से भलीभाँति मिला दें। जब उस क्षारद्रव के पकते-पकते भागयुक्त बुलबुले उठने लगे और वह क्षार अवलेह के सद्गुण गाढ़ा हो जाय तब कड़ाही को चूल्हे से नीचे उतार लें, क्षीतल हो जाने पर उस लोहापत्र को जी के ढेर में रख दें। यह मध्यम क्षार तैयार हो गया ॥ ८-१९ ॥

—न तु पिष्ट्वा क्षिपेन्मृदौ । निर्व्याप्यापनयेतीक्ष्णे पूर्ववत् प्रतिवापनम् ॥ २० ॥ तथा लाङ्गलिकादन्तिचित्रकातिविषावचाः । स्वर्जिकाकनकक्षीरहिङ्गपूतीकपल्लवाः ॥ २१ ॥ तालपत्री विडं चेति, सप्तरात्रात्परं तु सः । योज्यः—

मृदु क्षार बनाने की विधि—मृदुक्षार के निर्माण में चूना तथा सीप आदि द्रव्यों को पीसकर मिलाया नहीं जाता, केवल उस क्षारीय जल में मात्र बुझा दिया जाता है। इसे 'मृदु क्षार' कहते हैं।

तीक्ष्ण क्षार बनाने की विधि—इसका निर्माण मध्यम क्षार की ही भाँति किया जाता है। इसमें चूना तथा सीप को बुझाकर पीसकर मिला दिया जाता है। इसमें कलिहारीकन्द, दन्तीमूल, चित्रक के जड़ की छाल, अतीस, बालचत्र, सज्जीक्षार, सत्यानाशी की जड़, हींग, पूतीकरंज के पत्ते, मुशली तथा विडनमक का पूर्ण मिला दिया जाता है। इस कड़ाही को सात दिन तक जी के ढेर में दबाकर रखकर प्रयोग में लाया जाता है ॥ २०-२१ ॥

—तीक्ष्णोऽनिलश्चैष्णमेदोजेष्बर्बुदादिषु ॥ २२ ॥

मध्योप्वेष्ठेव मध्योऽन्यः पितासगुदजन्मसु । बलार्थं क्षीणपानीये क्षाराम्बु पुनरावपेत् ॥ २३ ॥

तीक्ष्ण-मध्य-मृदु क्षारों के प्रयोग : तीक्ष्णक्षार का प्रयोग वातज, कफज तथा मेदोज अर्बुद आदि रोगों में करना चाहिए। मध्यम क्षार का प्रयोग मध्यम कोटि के क्षारसाध्य रोगों में करना चाहिए। मृदुक्षार का प्रयोग पित्तज एवं रक्तज अशों पर करना चाहिए। बल ( शक्ति ) प्राप्त करने के लिए जब क्षार गाढ़ा हो जाय तो क्षारविधि से निकाला हुआ क्षारजल उसमें मिलाकर पीने के लिए देना चाहिए ॥ २२-२३ ॥

नातितीक्ष्णमृदुः श्लक्ष्णः पिच्छिलः शीघ्रगः सितः ।

शिखरी सुखनिर्वाण्यो न विष्यन्धी न चातिरुक् ॥ २४ ॥

क्षारो दशगुणः शस्त्रतेजसोरपि कर्मकृतः । आचूषप्रिव संरम्भाद्वात्रमापीडयन्त्रिव ॥ २५ ॥

सर्वतोऽनुसरन् दोषानुसूलयति मूलतः । कर्म कृत्वा गतरुजः स्वयमेवोपशाम्यति ॥ २६ ॥

क्षार के दस गुण—१. अतितीक्ष्ण न होना, २. अतिमृदु न होना, ३. श्लक्ष्ण, ४. पिच्छिल, ५. शीघ्र गति करना, ६. वर्ण से सफेद होना, ७. शिखरों वाला होना, ८. सुनियन्ती ( सरलता से शान्त हो जाने