अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंक्षारशिकर्मविधिरेध्यायः ३० ]
सूत्रस्थानम्
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वाला), ९. न विष्यन्दी (पसीजने वाला न होना) तथा १०. न चातिरूक् (अधिक कष्टकारक न होना) ऐसा क्षार शस्त्र तथा अग्नि का भी कर्म कर डालता है।
क्षार का सम्यक् योग —उक्त गुणसम्पन्न क्षार का जहाँ प्रयोग किया जाता है वहाँ वह मानो चूस रहा हो, ऐसा लगता है मानो शरीर के अवयवों को पीड़ित कर रहा हो की भाँति चारों ओर फैलता हुआ दोषों को मानो जड़ से उखाड़ रहा हो, वह अपना लेखन कर्म करने के बाद वेदना रहित होकर बाद में स्वयं शान्त हो जाता है अर्थात् किसी प्रकार के अन्य रोग को पैदा नहीं करता है॥ १४-१६॥
रक्तव्य —सुश्रुत ने क्षार के आठ गुण एवं आठ दोषों का वर्णन किया है। देखें—सू.सू. ११।१६ तथा १७।
क्षारसाध्ये गदे छिन्ने लिखिते प्रावितेऽथवा । क्षारं शलाकया दत्त्वा प्लोतप्रावृतदेह्या ॥ २७॥ मात्राशतमुपेक्षेत—
क्षार-प्रयोग की विधि —क्षार-प्रयोग द्वारा ठीक होने वाले अर्बुद आदि रोगों का छेदन, लेखन अथवा रक्तप्रावण करने के बाद अगले भाग में मुलायम वस्त्र लपेटी हुई शलाका द्वारा क्षार को लगाकर १०० मात्रा (तीन मिनट) तक उसे लगा रहने दें॥ २७॥
—तत्रार्शःस्वावृताननम् । हस्तेन यन्त्रं कुर्वीत—
अर्शों पर क्षार-प्रयोग—गुदबलियों के ऊपर अर्शों की उत्पत्ति होने पर अर्शोयन्त्र से गुदद्वार को चौड़ा करके अर्शों पर क्षार-प्रयोग करते ही यन्त्र के मुख को हाथ से ढक दें।
—वर्त्तरोगेषु वर्त्तनी ॥ २८॥
निर्भुज्य पिचुनाऽऽच्छाद्य कृष्णभागं विनिक्षिपेत् । पद्मपत्रतनुः क्षारलेपो, प्राणार्बुदेषु च ॥ २९॥
वर्त्तरोगों पर क्षार-प्रयोग —वर्त्तरोग (रोहा आदि) में वर्त्त को उल्टा करके नेत्र के काले भाग को रूई के फाहा से ढक कर क्षार का प्रयोग करें। यह क्षार का लेपन कमल की पंखुड़ी बराबर पतला होना चाहिए। इसी प्रकार का पतला लेप नासावृंद में भी लगाना चाहिए॥ २८-२९॥
प्रत्यादित्यं निपण्णस्य समुन्नम्याग्रनासिकाम् । मात्रा विधार्थः पञ्चाशत्—
नासाशं पर क्षार-प्रयोग —सूर्य की ओर मुख करके लेटे हुए नासाशं के रोगों की नासिका को भलीभाँति ऊपर की ओर उठाकर उस अर्श के ऊपर क्षार का प्रयोग करके ५० मात्राकाल तक उस क्षार को लगा रहने दें।
—तद्वदशंसि कर्णजे ॥ ३०॥
कर्णाशं पर क्षार-प्रयोग —उसी प्रकार कान के ऊपर उत्पन्न अर्श पर भी क्षार-प्रयोग करके ५० मात्रा काल तक उस लगे हुए क्षार की प्रतीक्षा करें॥ ३०॥
क्षारं प्रमाजनेनानु परिमृज्यावगम्य च । सुदग्धं घृतमध्वत्कं तत्योमस्तुकाज्जिकैः ॥ ३१॥ निर्बापयेत्ततः साज्यैः स्वादुशीतैः प्रदेहयेत् । अभिष्यन्दीनि भोज्यानि भोज्यानि क्लेदनाय च ॥
क्षार का पश्चाकर्म्म —ऊपरनिर्दिष्ट मात्राकाल के बाद कोमल वस्त्र अथवा रूई से क्षारद्रव्य को पोंछकर क्षार का समुचित प्रयोग हो गया है, ऐसा समझ कर उसके ऊपर घी तथा शहद का लेप लगाकर उस क्षारदग्ध स्थान पर दूध, मस्तु (दही का पानी) या काँजी के द्रव से सेचन करके उस दाहजनित पीड़ा का निर्वापण करें। उसके बाद मुलेठी आदि मधुर तथा शीतल द्रव्यों के चूर्णों को घी में मिलाकर उस पर मोटा लेप करें। तदनन्तर रोगी को अभिष्यन्दी (उड़द, दही आदि) पदार्थों को खिलायें, जिससे क्षार से जलाया गया ब्रणस्थान क्लेदयुक्त होकर उसमें से दोष वहकर निकल जाय॥ ३१-३२॥