भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 368

३३२

अष्टाङ्गहृदये

बत्कथ —सुश्रुत ने क्षार शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है—‘तत्र क्षरणात् क्षणनाद् वा क्षारः’, (मु.मु. ११४) अर्थात् यह-दूषित मांस को काटता है और जहाँ यह लगाया जाता है वहाँ स्थित विकार का क्षरण (प्रवण) करता है। देखा गया है—इसके प्रयोग से अर्शों के मुख से बहुत-सा द्रव निकलता है और अन्त में वे सुख जाते हैं। यह एक क्षार-प्रयोग का शुभ लक्षण है।

यदि च स्थिरमूलत्वाक्षारदग्धं न शीर्यते। धान्याम्लबीजयष्टघाहृत्तिलेरालेपयेत्तः॥ ३३॥ तिलकल्कः समधुको घृतात्को ब्रणरोपणः।

क्षारदग्ध ब्रण का रोपण —यदि गहरी जड़ें होने के कारण क्षार द्वारा जलाये गये बवासीर के मत्से क्षीण नहीं होते तो धान्याम्लबीज अर्थात् काँजी के तलहटी में जमा हुआ पदार्थ, मुलेठी तथा तिलों को समभाग लेकर तथा पीसकर बनाया हुआ लेप लगाना चाहिए। इससे अर्शों का मूल मुलायम हो जाता है, तदनन्तर पुनः क्षार-प्रयोग करने से वह मत्सा नष्ट हो जाता है। उस घाव को भरने के लिए तिल तथा मुलेठी को पीसकर घी में मिलाकर बनाया हुआ लेप लगाना चाहिए॥ ३३॥

पक्वजम्ब्वसितं सन्त्रं सम्यग्दग्धं—

सम्यग्दग्ध के लक्षण —भलीभाँति क्षार द्वारा जले हुए के लक्षण—क्षार द्वारा जला हुआ स्थान पके हुए जामुन के समान काला दिखलाई देता है और वह स्थान कुछ दब जाता है।

—विपर्यये॥ ३४॥

ताम्रतातोदकण्डवाद्यैर्दुर्दग्धं—

दुर्दग्ध के लक्षण —इसके लक्षण सम्यक् दग्ध के विपरीत होते हैं। यथा—उस ब्रण के मुख में तीन्धा की-सी लालिमा, चुभन, खुजली आदि लक्षण होते हैं॥ ३४॥

—तं पुनर्द्वेहत्।

पुनः क्षार-प्रयोग —उस दुर्दग्ध ब्रण को पुनः जलाना चाहिए, जिससे वह सम्यग्दग्ध हो जाय।

अतिदग्धे प्रवेद्रक्तं मूर्च्छादाहज्वरादयः॥ ३५॥

अतिदग्ध के लक्षण —अतिदग्ध ब्रण में से रक्तस्राव होता है, मूर्च्छा, दाह तथा ज्वर आदि शब्द से पाक, राग, पिपासा, मृत्यु आदि लक्षण होते हैं॥ ३५॥

गुदे विशेषाद्विग्मूरसंरोधोऽतिप्रवर्तनम्। पूस्त्वोपघातो मृत्युर्वा गुदस्य शातनादध्ववम्॥ ३६॥

अतिदग्ध गुद के लक्षण —विशेष करके गुदप्रदेश के अतिदग्ध हो जाने पर (गुदमार्ग के सिकुड़ जाने से) मल-मूत्र के निकलने में रुकावट अथवा चौड़ा हो जाने से मल-मूत्र का निकलते रहना, नपुंसकता तथा गुदभाग के कट जाने से मृत्यु भी हो जाती है॥ ३६॥

नासायां नासिकावशदरणाकुञ्चनोद्भवः। भवेच्च विषयाज्ञानं—

अतिदग्ध नासा के लक्षण —नासिका में क्षारकर्म करते समय यदि वह अधिक जल जाती है, तो नासावंश फट जाता है अथवा सिकुड़ जाता है और उसे सुगन्ध-दुर्गन्ध का ज्ञान नहीं होता।

—तद्वृद्धोत्रादिकेष्वपि॥ ३७॥

श्रोत्रादि दग्ध के लक्षण —इसी प्रकार कान, नासिका तथा जीभ पर अतिदग्ध हो जाने से शब्द, रूप एवं रस (उत्त-उत्त के विषयों) का ज्ञान नष्ट हो जाता है॥ ३७॥

विशेषादत्र सेकोऽस्मैलेप्ये मधु घृतं तिलाः। वातपित्तहरा चेष्टा सर्वैव शिशिरा क्रिया॥ ३८॥

अस्मो हि शीतः स्पर्शेन क्षारस्तेनोपसंहितः। यात्याशु स्वादुतां तस्मादस्मैर्निर्विषयितराम्॥ ३९॥