भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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क्षाराश्रिकर्मविधिप्रध्यायः ३० ]

सूत्रस्थानम्

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क्षार का शमनकर्म—अतिदग्ध हो जाने पर प्रमुख रूप से अम्लद्रवों ( कौजी तथा मस्तु आदि ) से सेचन करना चाहिए, तिलों को पीसकर मधु-घृत में मिलाकर इसका लेप करें। साथ ही वात एवं पित्त नाशक चिकित्सा और सभी शीतल उपचारों का प्रयोग करें। निश्चय ही अम्लरस स्पर्श में शीतल होता है और क्षार इसके साथ मिलकर मधुरता को प्राप्त हो जाता है, इसलिए क्षार-प्रयोग से हुई जलन की शान्ति अल्पपेय पदार्थों के प्रयोग से करनी ही चाहिए ॥ ३८-३९ ॥

बक्तव्य—यही कारण है कि लू लगने पर भी ये अम्लरस के पेय लाभदायक होते हैं। वृद्धवाम्भट ने तीक्ष्ण अम्लों ( तेजाब आदि ) के सेवन का निषेध किया है। देखें—अ.सं.सू. ३९।१५-१९।

( विषाग्रिशस्त्राशनिमृत्युतुल्यः क्षारो भवेदल्पमतिप्रयुक्तः ।

स धीमता सम्यगनुप्रयुक्तो रोगान्निहय्यादचिरेण योरात् ॥ १ ॥ )

( क्षारप्रयोग से हानि-लाभ—अयोग्य चिकित्सक द्वारा प्रयोग किया गया क्षार विष, अग्नि, शस्त्र, वज्र तथा मृत्यु के समान कष्टकारक होता है। वही योग्य चिकित्सक द्वारा प्रयुक्त भयावह रोगों को शीघ्र ही शान्त कर देता है ॥ १ ॥

बक्तव्य—यह पद्य अविकल रूप में सुश्रुत से लिया गया है। देखें—सु.सू. ११।३१।

अग्निः क्षारादपि श्रेष्ठस्तृष्टधानामसम्भवात् । भेषजक्षारशस्त्रैश्च न सिद्धानां प्रसाधनात् ॥ ४० ॥

अग्रिकर्म की प्रधानता—अग्रिकर्म क्षारकर्म से भी उत्तम माना जाता है, क्योंकि अग्नि द्वारा दागे गये अर्श आदि रोग फिर कभी उभरते नहीं हैं और जो रोग औषध-प्रयोग, क्षारकर्म तथा शस्त्रकर्म करने पर भी सिद्ध नहीं होते अर्थात् जिनमें पूर्ण सफलता नहीं मिलती, उनमें अग्रिकर्म से पूर्ण सफलता मिल जाती है ॥ ४० ॥

बक्तव्य—वास्तव में यह अग्रिकर्म, जिसे सामान्य भाषा में दागना कहते हैं, की प्रशंसा है। अपवाद सभी प्रकार की चिकित्सा में देखे जाते हैं, तथापि प्रसंगवश प्रशंसा अथवा निन्दा की जाती है। सभी चिकित्साओं का 'सम्यक् योग' प्रशंसनीय होता है, यह ध्यान रखना चाहिए। देखें—सु.सू. १।३१।

त्वचि मांसे सिरास्नायुसन्ध्यस्थिषु स युज्यते ।

अग्रिकर्म का प्रयोग—अग्रिकर्म ( दागना ) त्वचा, मांस, सिरा, स्नायु, सन्धि तथा अस्थि में किया जाता है।

मषाङ्गलानिमुर्धार्तिमन्थकीलतिलादिषु ॥ ४१ ॥

त्वघ्नाहो वर्तिगोदन्तसूर्यकान्तशरादिभिः ।

त्वचारोगों में अग्रिकर्म—मष ( मषक या मस्सा ), अंगलानि ( शरीर के किसी अवयव-विशेष का शोष ), शिरोरोग, मन्थ ( अधिमन्थ, चर्मकील तथा तिल आदि ( व्यंग ) ) में त्वचा का दाह इन द्रव्यों द्वारा किया जाता है—वर्ति ( रुई या कपड़ा की बत्ती ), गाय के दांत, सूर्यकान्तमणि ( आतशी शीशा या स्फटिक ) अथवा शर ( लोहे की शलाका ); आदि शब्द से पिप्पली, बकरी की मैगन से करना चाहिए ॥ ४१ ॥

अशोभगन्दरग्रन्थिनाडीवुष्टव्रणादिषु ॥ ४२ ॥

मांसदाहो मधुरस्नेहजाम्बवौष्ठगुडादिभिः ।

मांसरोगों में अग्रिकर्म—अर्श ( बवासीर के मत्से ), भगन्दर, ग्रन्थिरोग, नाडीव्रण, दुष्ट व्रण; आदि शब्द से अर्बुद, गण्डमाला का ग्रहण कर लेना चाहिए। इनमें मांस का दाह मधु से, स्नेहद्रव्यों से, जाम्बवौष्ठ यन्त्र-विशेष से ( देखें—अ.हू.सू. २५।२६ ) तथा गुड से अथवा जिस देश-विशेष में जिस पदार्थ से दाह किया जाता हो, उससे भी दाह करें ॥ ४२ ॥