अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
शिल्लवर्त्मन्यसुकुत्रावनीत्यसम्यग्ब्याधिषु ॥ ४३ ॥
सिरादिदाहस्तैरेव—
सिरादि रोगों में अधिकर्म—शिल्लवर्त्म ( नेत्ररोग-विशेष, देखें—अ.हृ.उ. ८।१७ ), रक्तध्राव, नीली तथा सिरा का अनुचित वेध हो जाने पर सिरा, आदि शब्द से स्नायु, सन्धि, अस्थि, दन्तनाड़ी, उपपश्चमक, लगण का दाह, उन्हीं मांसदाह में कहे गये मधुस्नेह, जाम्बवौष्ठ यन्त्र और गुड से करना चाहिए ॥ ४३ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने 'शिल्लवर्त्म' को 'अकिल्लवर्त्म' कहा है। देखें—सु.उ. ३।२२। मधुकोशकार ने इसी को 'पिल्ल' रोग कहा है। आचार्य विदेह ने भी इसे 'पिल्ल' रोग कहा है। आधुनिक ग्रन्थों में इसके दो भेद देखे जाते हैं—१. वलमशोथ ( Oedema of lid ) और २. वलन्तिशोथ ( blepharitis )। श्वागम्भट ने 'नीली' शब्द का प्रयोग किया है, इसके पूर्व किसी टीकाकार ने इसका अर्थ नहीं लिखा। वृद्धवाग्भट ने इस शब्द के स्थान पर 'लिंगनाश' शब्द का प्रयोग किया है। देखें—अ.सं.सू. ४०।३। सुश्रुत ने लिंगनाश के पर्याय के रूप में नीलिका शब्द का प्रयोग किया है, अतः 'नीली' तथा 'लिंगनाश' एक ही रोग हैं। देखें—सु.उ. ७।१८। सुश्रुतोक्त दहनोपकरण—सु.सू. १२।४।
—न दहेश्वास्वारितान्। अन्तःशल्यासुजो भिन्नकोष्ठान् भूरिब्रणातुरान् ॥ ४४ ॥
अधिकर्म का निषेध—इसी अध्याय के ४ से ७ श्लोक तक जिन्हें क्षारप्रयोग का निषेध किया गया है, उन रोगियों में अधिकर्म भी नहीं करना चाहिए। यथा—जिनके शरीर में शल्य का प्रवेश हुआ हो, कोष्ठ में रक्त भरा हो अथवा जिनका कोष्ठ फट गया हो तथा जो ब्रणों से अधिक पीड़ित हों ॥ ४४ ॥
सुदग्धं घृतमध्वरुं स्निग्धशौतैः प्रदेहेयत्।
सम्यग्दग्ध का पश्चात्कर्म—भलीभाँति अधिकर्म के हो जाने पर उस स्थान पर मुलेठी आदि स्निग्ध एवं शीतवीर्य द्रव्यों के चूर्ण को मधु-घृत में मिलाकर इसका मोटा लेप लगा दें।
तस्य लिङ्गं स्थिते रक्ते शब्दवल्लसिकावितम् ॥ ४५ ॥
पक्वतालकपोताभं सुरुहं नातिवेदनम्।
सम्यग्दग्ध का लक्षण—सिरावेध आदि द्वारा किये गये रक्तध्राव का भलीभाँति रुक जाना, अधिकर्म करते समय ल्वादाह के समान शब्द का सुनायी पड़ना, लसीका युक्त स्राव का होना, पके हुए तालफल के सदृश, कभी कबूतर के जैसे वर्ण वाला और जिसमें अधिक वेदना न हो ऐसा दग्धस्थान जल्दी भर जाता है ॥ ४५ ॥
प्रमाददग्धवत्सवै दुर्दग्धात्यर्थदग्धयोः ॥ ४६ ॥
दुर्दग्ध तथा अतिदग्ध के लक्षण—इन दोनों में प्रमाद ( असावधानी ) से जल जाने के समान सभी लक्षण प्रायः देखे जाते हैं। देखें—आगे श्लोक ४८ ॥ ४६ ॥
चतुर्धा तत्तु तुच्छेन सह—
अग्निदग्ध के भेद—अग्निदग्ध के निम्नलिखित चार भेद होते हैं—१. तुच्छ या तुल्य दग्ध, २. दुर्दग्ध, ३. अतिदग्ध तथा ४. सुदग्ध अथवा सम्यग्दग्ध।
—तुच्छस्य लक्षणम्। त्वविर्वाणोऽत्यर्थे न च स्फोटसमुद्भवः ॥ ४७ ॥
तुच्छ दग्ध के लक्षण—इसमें ल्वाचा झुलस जाती है तथा अत्यन्त दाह होता है, किन्तु इसमें फफोले नहीं होते। ये सामान्य दग्ध के लक्षण होते हैं ॥ ४७ ॥
सस्फोटवाहतीब्रोषं दुर्दग्धम्—