अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंधाराशिकर्मविधिरध्यायः ३० ]
सूत्रस्थानम्
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दुर्दग्ध के लक्षण—इस प्रकार से जलने पर दग्धस्थान पर फफोले पड़ जाते हैं, दाह युक्त स्थान पर अत्यन्त तीव्र पीड़ा होती है। इन लक्षणों वाले दाह को दुर्दग्ध कहते हैं।
—अतिदाहृतः । मांसलम्बनसङ्कोचदाहृधूपनवेदनाः ॥ ४८ ॥
सिरादिनाशस्तृणमूर्च्छात्रणगाम्भीर्यमृत्यवः ।
अतिदग्ध के लक्षण—अधिक जल जाने पर मांस के लोथोड़े लटक जाते हैं, जले हुए स्थान पर मांस सिकुड़ जाता है, दाह ( जलन ), धुँआ-सा निकलने की प्रतीति होना, अनेक प्रकार की पीड़ा का होना, सिरा, स्नायु आदि का नाश, प्यास लगना, मूर्च्छा का आना, गहरे ब्रणों ( घावों ) की उत्पत्ति तथा मृत्यु हो जाती है ॥ ४८ ॥
वक्तव्य—दुर्दग्ध या अतिदग्ध ये दोनों ही भेद व्यक्ति के प्रमाद से अथवा दुर्भाग्य से होते हैं। सुश्रुत ने भी इसके चार भेद माने हैं—१. प्लुष्ट ( तुच्छदग्ध ), २. दुर्दग्ध, ३. सम्यग्दग्ध तथा ४. अतिदग्ध। देखें—सू. सू. १२।१६। इसके आगे कुछ दग्धों का और वर्णन किया है—१. उष्णवातातपदग्ध, २. शीतवर्षानिलदग्ध तथा ३. इन्द्रवज्राग्निदग्ध। देखें—सू. सू. १२।३८-३९।
तुच्छस्याग्निप्रतपनं कार्यमुष्णं च भेषजम् ॥ ४९ ॥
स्यात्तेऽस्ते वेदनाऽत्यर्थं विलीने मन्दता रजः ।
अग्निदग्ध की चिकित्सा—तुच्छदग्ध में जले हुए शरीरावयव को पुनः आग से संकना चाहिए, उस पर लगाने वाला मलहम, लेप आदि भी गरम हो लगाना चाहिए। क्योंकि तुच्छदग्ध स्थान पर शीत चिकित्सा करने पर उस अवयव का रक्त गाढ़ा हो जाता है और पीड़ा अधिक होने लगती है तथा उष्ण चिकित्सा करने पर रक्त के पिघलने के कारण वेदना कम हो जाती है ॥ ४९ ॥
दुर्दग्धे शीतमुष्णं च युज्य्यादादी ततो हिमम् ॥ ५० ॥
दुर्दग्ध की चिकित्सा—दुर्दग्ध में सर्वप्रथम शीतल चिकित्सा करनी चाहिए, उसके बाद फिर उष्ण चिकित्सा करे। दोनों प्रकार की चिकित्सा कर लेने के बाद शतधौतयुत का लेप करे, फिर शीतल द्रवों द्वारा परिसंचन करना चाहिए ॥ ५० ॥
सम्यग्दग्धे तवक्षीरिलक्षचन्दनैरिक्केः । लिम्पेत्साज्यामृतेरुर्ध्वं पित्तविद्रधिवक्रिया ॥ ५१ ॥
सम्यग्दग्ध-चिकित्सा—सम्यग्दग्ध में तवक्षीरी ( संगंजराहत, तोखाखीर ), प्लक्ष ( पिल्वन ) की छाल, लालचन्दन, गेरु एवं गिलोय के चूर्ण को घी में मिलाकर उस पर लेप करें। यदि इससे लाभ न हो तो पित्तविद्रधि की भांति इसकी चिकित्सा करनी चाहिए ॥ ५१ ॥
वक्तव्य—तुगाक्षीरी = वंशलोचन है और तवक्षीरी = तोखाखीर या संगंजराहत पार्थिव द्रव्य है। देखें—भावप्रकाश प्र.खं. हरीतक्यादि वर्ष ११५-११७। तवक्षीरी, देखें—रा.नि.; वै.नि.।
अतिदग्धे द्रुतं कुर्यात्सर्वं पित्तविसर्पवत् ।
अतिदग्ध-चिकित्सा—अतिदग्ध में शीघ्र ही पित्तज विसर्प के समान लेप, शीतल द्रव्यों का सिंचन, शीतल पेयों का सेवन आदि चिकित्सा करनी चाहिए।
स्नेहदग्धे भृशतरं रूक्षं तत्र तु योजयेत् ॥ ५२ ॥
स्नेहदग्ध-चिकित्सा—घी-तेल आदि स्नेहों से जल जाने पर सभी रूक्ष चिकित्सा करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
( शस्त्रक्षाराग्रयो यस्मान्मृत्योः परममायुधम् । अप्रमतो भिषक् तस्मात्तान् सम्यग्बचारयेत् ॥ )
( शस्त्र आदि का प्रयोग—शस्त्र, धार, अधिकर्म ये मृत्यु के प्रधान आयुध ( शस्त्र ) हैं अर्थात् इनका समुचित प्रयोग न होने से मृत्यु हो सकती है। अतः इन सबका प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना चाहिए। )