भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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अष्टाङ्गहृदये

वक्तव्य—उक्त पद्य अ.सं.सू. ४०।१५ से यहाँ लिया गया है। सुश्रुत ने अग्रिकर्म के अन्त में 'धूमोपहत' के लक्षण दिये हैं। चिकित्साकाल में इसकी भी आवश्यकता पड़ सकती है, अतः इस प्रसंग को 'अत ऊर्ध्व'-'कल्पयेत्' तक का अवलोकन कर लें। (सु.सू. १।२१-३७)

समाप्यते स्थानमिदं हृदयस्य रहस्यवत्।

इस अष्टांगहृदय नामक ग्रन्थ का यह सूत्रस्थान हृदय के समान चिकित्सा के गूढ़ रहस्यों का संग्रह है, यहाँ अब इसे समाप्त किया जा रहा है।

अत्रार्थाः सूत्रिताः सूक्ष्माः प्रतन्यन्ते हि सर्वतः ॥५३॥

इति श्रीबैद्यपतिसिंहगुप्तसुतुश्रीमद्भागभटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने क्षाराग्रिकर्मविधिनाम त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३० ॥

॥ समाप्तं चेदं प्रथमं सूत्रस्थानम् ॥

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विविध सूत्रों का वर्णन—इस सूत्रस्थान में चिकित्सा के सूक्ष्म से भी सूक्ष्म विषयों को सूत्रित किया गया है अर्थात् एक धागा में पिरौया गया है। आगे उन्हीं अर्थों (विषयों) का सम्पूर्ण ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक वर्णन किया जायेगा ॥५३॥

वक्तव्य—भगवान् धन्वन्तरि ने भी 'सूत्रस्थान' नाम की सार्यकता को इस श्लोक द्वारा स्पष्ट किया है—'सूचनात् सूत्रणान्नैव सवनाच्चार्यसन्ततेः। '...'सूत्रस्थानं प्रवक्षते' ॥ (सु.सू. ३।१२) अर्थात् अर्थों को सूचित करने से, अर्थों का यथास्थान सन्निवेश करने से और अर्थसमूह को उत्पन्न करने से इस स्थान को सूत्रस्थान कहते हैं।

इस प्रकार बैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि में विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

क्षाराग्रिकर्मविधि नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ ३० ॥

यह प्रथम सूत्रस्थान समाप्त हुआ।

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