अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
सूत्रस्थानम्
| अ | अ० | अंक | अल्पाशितोऽधुतिः शुद्धान् | अ० | अंक | अन्त्यो ब्रण्चनः स्निग्धोऽत्र | अ० | अंक |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अकालशयनानां होह | ७ | ६१ | अत्यासन्नातिदूरस्य | ११ | ३७ | अन्नधानं च विडुर्भेदि | ४ | ६ |
| अक्षिरोगाय दोषाः स्यु | २३ | १७ | अत्युद्विक्ते बलासे तु | २३ | २० | अन्नधानं विषाद्रक्षेत्रे | ७ | २ |
| अग्निः सारादपि श्रेष्ठ | ३० | ४० | अत्युष्णतीक्ष्णं ह्याग | २३ | ५ | अन्नधानं समासेन | ३ | ५७ |
| अग्रे प्रवर्ति दुष्टासं | २७ | ३८ | अथ साधारणे काले | १८ | ११ | अन्यत्र गृह्यमांश्चम | २९ | १६ |
| अङ्गमर्कटोपाश्वं | १७ | २६ | अथर्वविहिता शान्तिः | ४ | ३३ | अन्ये दोषेभ्य एवाति | १३ | २९ |
| अङ्गमर्कटं तत्रेष्टः | ४ | १३ | अथाञ्जनं शुद्धतनो | २३ | ८ | अन्नासनाहं विज्ञाय | १९ | २१ |
| अङ्गरतापसस्तप्त | ३ | १६ | अथानुस्मौल्यन्तु दृष्टि | २३ | २६ | अपथ्यः कटुलावण्या | ६ | १५२ |
| अङ्गुलानां क्रमात्पातुः | २१ | ९ | अथाममलसीभूतम् | ८ | १५ | अपथ्यमपि हि त्यक्तं | ७ | ४९ |
| अङ्गुलित्राणकं दान्तं | २५ | २१ | अथाहर्तुं कर्त्तव्यं | २८ | २२ | अपप्रसूता सुक्ते च | १६ | ८ |
| अङ्गुलिभ्यामनायस्तो | १८ | १९ | अथेतत् निशाकल्क | २६ | ४० | अपराण्यपि यन्वादी | २९ | २८ |
| अचिन्त्याया हर्षणेन | १४ | ३४ | अथैतं वामितं भूयः | १८ | ३३ | अपरज्ञातकोष्ठ | १८ | ५० |
| अच्छपातविचाराख्यौ | २० | ३६ | अथोत्ताननृविहस्य | २० | १८ | अपां पूर्णं विधुनूया | २८ | ४० |
| अजाविमहिषादीनां | १९ | १६ | अदृष्टस्नेहकोष्ठस्तु | १८ | ३७ | अपाङ्ग्यामुपनास्यां वा | २७ | १० |
| अजीर्णं च कफादामं | ८ | २५ | अदृश्यं ब्रणसंस्थानात् | २८ | २३ | अपानोऽपानागः शोणि | १२ | ९ |
| अजीर्णलिङ्गं सामान्यं | ८ | ३१ | अदृष्टनष्टमूर्धुपु | ३ | २४ | अपेतीषधसंरमं | २३ | २८ |
| अजीर्णत्विन्नादादीनां | २९ | ३८ | अदृष्टेऽकं शिरःस्ताते | २३ | २४ | अपानस्फुटघाताभ्यां | २८ | ३९ |
| अजीर्ण्यभिहतोन्मत्तात् | ७ | ५९ | अघोरतोरमाग्न्याम् | ८ | ६ | अभिभूयैतरांतस्तत् | ९ | २४ |
| अञ्जनं फलिनी मांसी | १५ | १४ | अघोदेशप्रविभूतेः | २६ | ५२ | अभीरवीरापनस | १० | २३ |
| अञ्जनक्षोभजमर्षौ | २९ | ५५ | अघो द्वे सप्त शिरसि | ११ | ३६ | अभ्यक्तन्तातमुचितात् | १९ | २२ |
| अतश्च विपरीतत्वात् | ९ | १६ | अघोवातस्य रोधेन | ४ | २ | अभ्यक्तत्वेदितोत्सृष्ट | १९ | ३७ |
| अतिकाश्यं घ्रमः कासः | १४ | २९ | अनभिष्यन्दि लघु च | ५ | १८ | अभ्यङ्गमाचरेनिसं | २ | ८ |
| अतितीक्ष्णमुदृतोक् | २३ | २५ | अनास्थाप्यास्त्वतिस्निग्धः | १९ | ४ | अभ्यासात्ताप्यते दृष्टिः | १२ | ५६ |
| अतिरुधे दूतं कुर्यात् | ३० | ५२ | अनुत्पत्त्यै समासेन | ४ | ३४ | अभ्युद्गतं बुद्धदवत् | २८ | २ |
| अतिमार्गं पुनः सर्वा | ८ | ४ | अनुपक्रम एव स्यात् | १ | ३३ | अभ्युद्गतविषद्वारा | २७ | २६ |
| अतियोगोऽतिवृत्तिस्तु | १२ | ४१ | अनुपानं करोत्युर्जा | ८ | ५२ | अमात्रयाऽहंतिऽकाले | १६ | ३२ |
| अतिरौष्यादनागच्छन् | १९ | ३२ | अनुरक्तः शुचिर्दयो | १ | २९ | अम्बच्छा मधुकं नम | १५ | ३८ |
| अतिसूक्ष्मांशां सूतां | ७ | ७० | अनुवासनवच्छेपं | १९ | ७७ | अम्बुनोयग्निरपन | ९ | २ |
| अतिसूक्ष्मांतिकाश्वदीन् | १४ | १९ | अनुजुः क्षवशुद्धार | २ | ४१ | अम्लोऽगिरीतिकुस्तिग्धो | १० | १० |
| अतिसूक्ष्मांपञ्चमेह | १४ | २० | अनेकवर्णं वमति | ७ | २४ | अम्लो हि शीतः | ३० | ३९ |
| अतुल्यदृश्यदेशतुं | १ | ३१ | अनेकोपायस्तत्पैः | १७ | ७ | अयन्त्रणसुखं यिन्न | १३ | ७ |
| अत्रोऽभियुक्तः सततं | १२ | ७३ | अन्तःकोष्ठो महाघोत | १२ | ४६ | अयमकविदो वर्णः | १५ | २६ |
| अत्यन्तमधिधानानां | ७ | ५१ | अन्तर्भागं च शोफाशो | १२ | ४७ | अयमेव विधिः कार्यः | ३ | १७ |