भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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पञ्चविंशोऽध्यायः

अथातो यन्त्रविधिमध्येयार्थं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से यन्त्रविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

वक्तव्य —प्रस्तुत अध्याय से पहले अध्यायों में बस्ति, नस्य, अञ्जन, क्षार आदि के प्रयोग भी यन्त्रों की अपेक्षा रखते हैं, अतः उनका वर्णन करने के बाद अब यहाँ यन्त्रविधि नामक अध्याय का वर्णन किया जा रहा है। इस २५वें अध्याय में ४८ यन्त्रों का वर्णन किया गया है, इनका प्रयोग विविध प्रकार के रोगों की चिकित्साओं के लिए किया जाता है। वृद्धबागभट ने अ.सं.सू. ३४।३ में ये यन्त्र असंख्य होते हैं, इस प्रकार 'अतः कर्मवशात् तेषामियत्ताऽवधारणमशक्यम्' कहा है। वृद्धबागभट ने एक ही अध्याय में यन्त्र तथा शस्त्रों का वर्णन किया है, जिसे अष्टाङ्गहृदय में २५वें तथा २६वें अध्यायों में अलग कहा है। यन्त्र उन उपकरणों को कहते हैं, जिनसे चुभा हुआ काँटा, उखाड़ने योग्य दाँत, निकालने योग्य मृतगर्भ आदि को पकड़ कर निकाला जाता है। इनके अतिरिक्त गुद, भग, मुख आदि को चौड़ा करके भीतर देखने, औषध प्रयोग करने आदि का कार्य भी लिया जाता है, जिनका वर्णन आगे यथास्थान किया जायेगा। सुश्रुत ने 'मन तथा शरीर को पीड़ित करने वाले शल्य होते हैं, इनको निकालने के उपाय यन्त्र होते हैं', ऐसा कहा है। देखें—सू.सू. ७।४।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सू. सू. ७ तथा अ. सं. सू. ३४ में देखें।

विशेष —चरक ने यन्त्र तथा शस्त्रों का वर्णन यह कहकर कि 'तत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविद्यौ'। (च.चि. ५।४४) अर्थात् चरककायचिकित्सा-प्रधान संहिता है और यन्त्र-शस्त्र के प्रयोग में धन्वन्तरि के अनुयायी चिकित्सकों का अधिकार है। फिर भी च.चि. २५।५५ से ६० तक छः प्रकार के शस्त्रकर्मों का वर्णन करते हुए कहा है—'इति षड्विधमृद्विष्टं शस्त्रकर्म मनोविभिः'। यहाँ यह मनोपि शब्द सुश्रुत आदि शल्यशास्त्रज्ञों की ओर संकेत करता है।

नानाविधानां शल्यानां नानादेशप्रबाधिनाम्। आहर्तुमस्युपायो यस्तद्यन्त्रं यच्च दशने ॥ १ ॥

अशोभगन्दरादीनां शस्त्रक्षाराशियोजने। शेपाङ्गपरिरक्षायां तथा बस्त्यादिकर्मणि ॥ २ ॥

घटिकालाबुभृङ्गं च जाम्बवौष्ठादिकानि च।

यन्त्रों का वर्णन —शरीर के विभिन्न देशों (अवयवों) में गढ़े हुए या चुभे हुए शल्यों, जो कष्ट पहुँचा रहे हों, को निकालने का जो उपाय है, उसे यन्त्र कहते हैं और जो अश्व, भगन्दर आदि को देखने में सहायक होते हैं उन्हें भी यन्त्र कहते हैं। शस्त्र, क्षार तथा अश्विकर्म का प्रयोग करते समय शेष अंगों की सुरक्षा के लिए भी इन यन्त्रों की आवश्यकता पड़ती है। बस्ति (गुदबस्ति, उत्तरबस्ति) आदि कर्मों में भी इनका प्रयोग होता है। ये यन्त्र घटिका (घड़ा, लोटा), अलग्बु (तुम्बी), शृंगी (सिगी) इनका प्रयोग वातदोष तथा दूषित रक्त को चूसकर निकालने में होता है। जाम्बवौष्ठा यन्त्र का प्रयोग क्षार लगाने में और काँटा आदि निकालने में सन्दश (चिमटी) आदि का प्रयोग होता है ॥ १-२ ॥

अनेकरूपकार्याणि यन्त्राणि विविधात्यतः ॥ ३ ॥

विकल्प्य कल्पयेद्वृद्ध्या—