अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतर्पणपुटपाकविधिरध्यायः २४ ]
सूत्रस्थानम्
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वक्तव्य —तर्पण तथा पुटपाक के अनुचित प्रयोग से जो रोग पैदा हो जाता है, उसकी चिकित्सा अंजन, आश्रोतन तथा स्वेदन आदि द्वारा तत्काल करें। देखें—सू.उ. १८।३०।
सर्वार्त्तमना नेत्रबलाय यत्नं कुर्वीत तस्याञ्जनतर्पणाद्यैः ॥ २२ ॥
दृष्टिश्च नष्टा विविधं जगच्च तमोमयं जायत एकरूपम् ॥ २३ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भानभटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने तर्पणपुटपाकविधिर्नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
नेत्ररक्षा की आवश्यकता —नेत्ररक्षा के उपाय—नस्य, अंजन, तर्पण आदि ( इस अध्याय में कहे गये ) उपचारों द्वारा सभी प्रकार से नेत्रों की शक्ति को बलवान् बनाये रखने के लिए सर्वदा प्रयत्न करते रहना चाहिए। यदि किसी प्रकार की असावधानी से नेत्रों में विकार उत्पन्न हो जाता है और उससे नेत्र की दर्शनशक्ति नष्ट हो जाती है तो यह विश्व रूप संसार उस नेत्रहीन के लिए अन्धकारमय एकरूप का होकर रह जाता है ॥ २२-२३ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारावत् त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
तर्पणपुटपाकविधि नामक चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २४ ॥
१८ अ० ह०