अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बिल्वमात्रं पृथक् पिण्डं मांसभेषजकल्कयोः ॥ १७ ॥
उरूकवटाम्भोजपत्रैः स्नेहादिषु क्रमात्। वेष्टयित्वा मुदा लिप्तं धवधन्वनगोमयैः ॥ १८ ॥ पचेत्यदीनैरन्यामं पक्वं निष्पीड्य तदस्मत्। नेत्रे तर्पणवद्युज्यात्—
पुटपाक-रचनाविधि—ऊपर तीन प्रकार के पुटपाकों के निमित्त कहे गये मांस आदि द्रव्यों तथा औषधद्रव्यों का बिल्वभर ( १-१ पल = ४ तोला ) कल्क ( चटनी ) लेकर गोला जैसा बनायें। फिर क्रमशः स्नेहन पुटपाक के लिए एण्ड के पत्तों से, लेखन पुटपाक के लिए बरगद के पत्तों से तथा प्रसादन पुटपाक के लिए कमल के पत्तों से लपेट कर उन सबके ऊपर दो अंगुल मोटा मिट्टी का लेप करके उसी क्रम से स्नेहन को धव की लकड़ियों में, लेखन को धामिन की लकड़ियों में तथा प्रसादन को उपलौ ( गोहरी ) की आग में पकायें। जब मिट्टी ऊपर से लाल हो जाय तो पका हुआ समझें। शीतल हो जाने पर मिट्टी को धीरे से हटाकर उसका रस निचोड़ कर तर्पण-विधि की भाँति इस रस का भी प्रयोग करना चाहिए ॥ १७-१८ ॥
—शतं द्वे त्रीणि धारयेत् ॥ १९ ॥
लेखनस्नेहनाल्येषु—
धारणकाल-अवधि—पुटपाक से प्राप्त रस को नेत्रों में डालने के बाद लेखन पुटपाक के रस को १०० मात्रा तक रखें। स्नेहन पुटपाक के रस को २०० मात्रा तक रखें और अन्तिम प्रसादन पुटपाक के रस को ३०० मात्रा तक रखें ॥ १९ ॥
—कोष्णौ पूर्वौ, हिमोऽपरः।
उष्ण-शीतप्रयोग भेद—इन पुटपाक के रसों में पहले के दो ( स्नेहन तथा लेखन ) पुटपाकों का रस गुनगुना करके प्रयोग करना चाहिए और बाद वाला अर्थात् प्रसादन पुटपाक का रस शीतल ही प्रयोग करना चाहिए।
धूमपोऽन्ते तयोरिव—
पश्चात् कर्म—स्नेहन तथा लेखन पुटपाक से निकले हुए रसों के प्रयोग करने के बाद रोगी को धूमपान कराना चाहिए। इससे स्नेह द्वारा उभड़े हुए कफ की शान्ति हो जाती है। 'एव' शब्द प्रसादन पुटपाक के अन्त में धूमपान-सेवन का निषेध करता है।
—योगास्तत्र च तुत्पित्वत् ॥ २० ॥
योगों का निर्देश—इस पुटपाक के प्रयोग में योग ( समयोग, हिनयोग तथा अतियोग ) तर्पण के समान ही होते हैं ( देखें—अ.हृ.सू. २४११ ) ॥ २० ॥
तर्पणं पुटपाकं च नस्यानहं न योजयेत्।
तर्पण एवं पुटपाक का निषेध—जिनको अ.हृ.सू. २०११-१३ में नस्य-सेवन के अयोग्य कहा गया है, उन्हें तर्पण एवं पुटपाक का प्रयोग भी नहीं कराना चाहिए।
यावन्त्यहानि युञ्जीत द्विस्ततो हितभागभवेत् ॥ २१ ॥
मालतीमलिकापुष्पैर्बद्धाक्षो निवसेन्निशाम्।
तर्पण एवं पुटपाक की अवधि—जितने दिनों तक तर्पण अथवा पुटपाक का प्रयोग कराया गया हो उससे दुगुने दिनों तक पथ्य का सेवन कराना चाहिए और इन दिनों रात्रि में मालती ( चमेली ) तथा मलिका के फूलों को आँखों पर बाँधकर सोना चाहिए ॥ २१ ॥