अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतर्पणपुटपाकविधिरध्यायः २४ ]
सूत्रस्थानम्
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समयोग के लक्षणों के विपरीत लक्षण होते हैं। तर्पण का अतियोग—इसमें कफज रोगों की उत्पत्ति हो जाती है ॥ ११ ॥
वक्तव्य —तर्पण के हीनयोग में तब तक तर्पण कराना चाहिए जब तक समयोग के लक्षण दृष्टिगोचर न हों और तर्पण के अतियोग में कफनाशक विधियों ( नस्य, धूमपान, अञ्जन, सेक, गण्डूष, कवल आदि ) का प्रयोग कराना चाहिए। कफनाशक विधियों का वर्णन यहाँ भी किया गया है तथा सुश्रुत में भी। देखें—सू.उ. १८।१६।
स्नेहपीता तनुरिव क्लान्ता दृष्टिर्हि सौदति । तर्पणानन्तरं तस्मादुगुबलाधानकारिणम् ॥ १२ ॥ पुटपाकं प्रयुजीत पूर्वोत्तेज्येव यक्षमत् ।
पुटपाक का वर्णन —जिस प्रकार स्नेहपान कर लेने पर शरीर ढीला पड़ जाता है, वैसे ही स्नेह द्वारा तर्पण करने पर दृष्टि भी ढीली पड़ जाती है। अतएव तर्पण-प्रयोग के बाद दृष्टि को बलवती बनाने के लिए पुटपाक-विधि से निकाले गये रसों का यथोचित प्रयोग करना चाहिए। इसका प्रयोग पहले श्लोक २-३ में कहे गये वातज एवं कफज रोगों में करना चाहिए ॥ १२ ॥
स वाते स्नेहनः, श्लेष्मसहिते लेखनो हितः ॥ १३ ॥ दृग्दीर्बल्येऽनिले पिते रक्ते स्वस्थे प्रसादनः ।
दोषानुसार पुटपाक-प्रयोग —पुटपाक तीन प्रकार के होते हैं—१. स्नेहन, २. लेखन तथा ३. प्रसादन। इनका उपयोग—स्नेहन पुटपाक का प्रयोग वातज नेत्ररोगों में, लेखन पुटपाक का प्रयोग कफयुक्त वातज नेत्ररोगों में तथा प्रसादन पुटपाक का प्रयोग दृष्टि की दुर्बलता में, वातज, पित्तज तथा रक्तप्रकोपज नेत्र-रोगों में और स्वस्थ नेत्रों में इनको सदा स्वस्थ रखने की दृष्टि से किया जाता है ॥ १३ ॥
भूशयप्रसहानूपमेदोमज्जवसाभिषैः ॥ १४ ॥ स्नेहनं पयसा पिष्टैर्जीवनीयेश्च कल्पयेत् ।
स्नेहन पुटपाक के द्रव्य —भूशय ( लोमड़ी आदि प्राणी ), प्रसह ( अ.ह.सू. ६।४८ इसमें प्रसहवर्ग के प्राणियों की गणना की गयी है ) तथा अनूप ( 'बृहदकनगोऽनूपः'—शा.सं.पू.खं. १।६४ ) देश में रहने वाले मृग एवं पक्षियों की मेदा, मज्जा, मांस तथा जीवनीय गण के द्रव्यों को दूध में पीसकर स्नेहन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १४ ॥
मृगपक्षियकुन्मांसमुक्तायस्ताप्रतैन्धवेः ॥ १५ ॥ स्रोतोजशङ्खफेनालेलेखनं मस्तुकल्कितैः ।
लेखन पुटपाक के द्रव्य —जांगलदेशीय मृग एवं पक्षियों के यकृत, मांस, मोती, लौहभस्म, ताम्रभस्म, संधानमक, काला तथा सेफेद मुरमा, शंख, समुद्रफेन और हरिताल—इन द्रव्यों को मस्तु ( दही के पानी ) में पीसकर लेखन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १५ ॥
मृगपक्षियकुन्मज्जवसान्त्रहृदयामिषैः ॥ १६ ॥ मधुरैः सघृतैः स्तन्यक्षीरपिष्टैः प्रसादनम् ।
प्रसादन पुटपाक के द्रव्य —साधारणदेशीय मृग एवं पक्षियों के यकृत, मज्जा, वसा, अन्त्र ( आंत ), हृदय, मांस तथा मधुरवर्ग में परिगणित द्रव्य एवं घी—इन सबको स्त्री के दूध में पीसकर प्रसादन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १६ ॥