अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयन्त्रविधिरध्यायः २५ ]
सूत्रस्थानम्
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यन्त्रों की विविधता—उक्त यन्त्रों के विविध आकार-प्रकार तथा अनेक कार्य होते हैं अर्थात् योग्य चिकित्सक इनसे अनेक कार्य ले सकते हैं। अतः अपनी विवेकबुद्धि से विचार करके इनका प्रयोग किया जा सकता है॥ ३॥
—यथास्थूलं तु वक्ष्यते।
सामान्य वर्णन—सामान्य दृष्टि से उक्त यन्त्रों का वर्णन आगे किया जायेगा।
वक्तव्य—महर्षि सुश्रुत ने १०१ यन्त्रों का होना स्वीकार कर उनका विभाजन इस प्रकार ६ भागों में किया है। यथा—(क) स्वस्तिकयन्त्र २४, (ख) सन्दशयन्त्र २, (ग) तालयन्त्र २, (घ) नाडीयन्त्र २०, (ङ) शलाकायन्त्र २८ तथा (च) उपयन्त्र २५; योग—१०१। देखें—सु.सू. ७।६। वाग्भट ने सुश्रुतोक्त उपयन्त्र को अनुयन्त्र संज्ञा दी है। देखें—अ.हृ.सू. २५।३२-४०। ये सभी यन्त्र लौहधातु से अथवा लौह जैसे दृढ़ पदार्थ से बनाये जाते हैं। देखें—सु.सू. ७।७। लौह शब्द से सभी धातुओं का ग्रहण किया जाता है। देखें—'सर्व स्यात्तैजसं लोहम्'। (अमरकोष २।९।९९)
तुल्यानि कङ्कसिंहर्क्षकाकादिमृगपक्षिणाम्॥ ४॥
मुखैर्मुखाणि यन्त्राणां कुर्यात्संज्ञकानि च। अष्टादशाङ्गुलायामान्यायसानि च भूरिशः॥ ५॥ मसुराकारपर्यन्तैः कण्ठे बद्धानि कीलकैः। विद्यात्स्वस्तिकयन्त्राणि मूलेऽङ्कुशतानि च॥ ६॥ तैर्दुंदेरस्यिसंलग्नशल्याहरणमिष्यते ।
स्वस्तिकयन्त्र-परिचय—स्वस्तिकयन्त्रों के मुख (अग्रभाग) कंकपक्षी, सिंह, ऋक्ष (भालू), कौआ आदि मृग, पक्षियों के मुखों की आकृति वाले होते हैं, अतएव इन यन्त्रों के नाम भी उन्हीं प्राणियों के नामों के अनुसार रखे गये हैं। यथा—कंकमुख, सिंहमुख आदि। अधिकांश इन यन्त्रों की लम्बाई १८ अंगुल होती चाहिए और इनका निर्माण लोहा धातु से होना चाहिए। इनके कण्ठ (मुख के निचले भाग) में मसुर की आकृति वाली कीलों से बँधे हों और इनका अन्तिम भाग (छोर) अंकुश की भाँति मुड़ा होना चाहिए। क्योंकि इसे पकड़े रहने से हाथ फिसलता नहीं। ये यन्त्र दृढ़ बने हों। इनसे अस्थियों में चुभे हुए शल्यों का आहरण करना चाहिए॥ ४-६॥
कीलबद्धविमुक्ताग्री सन्दंशो योदशाङ्गुलो॥ ७॥
त्वक्शिरास्नायुपिशितलग्नशल्यापकर्षणो ।
सन्दशयन्त्र-परिचय—सन्दशयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. कीलबद्ध (पेंच या कील से जुड़े हुए, जैसे—सँइसी), जिन्हें अन्यत्र सनिग्रह अथवा सनिबन्धन भी कहते हैं तथा २. विमुक्ताग्र (जैसे—चिमटा या चिमटी), जिन्हें अन्यत्र अनिग्रह या अनिबन्धन भी कहा जाता है। इन दोनों की लम्बाई सोलह अंगुल होती है। इनका उपयोग त्वचा, सिरा (धमनी), स्नायु तथा मांस में धँसे, गड़े शल्य (काँटा) आदि को निकालने में किया जाता है॥ ७॥
षडङ्गुलोऽन्त्यो हरणे सूक्ष्मशल्योपपक्षमणाम्॥ ८॥
सन्दशयन्त्र का भेद—ऊपर जो दो सोलह अंगुल वाले सन्दशयन्त्र कहे हैं, उनसे अतिरिक्त इसका एक भेद और होता है, जिसकी लम्बाई छः अंगुल होती है। इसका उपयोग सूक्ष्म शल्य तथा उपपक्षम अर्थात् परबालों को निकालने में किया जाता है॥ ८॥
मुचुण्डी सूक्ष्मदन्तर्जर्मूले रुचकभूषणा। गम्भीरव्रणमांसातानमर्मणः शेषितस्य च॥ ९॥
मुचुण्डी यन्त्र का वर्णन—उक्त षड्गुल सन्दश यन्त्र का नाम 'मुचुण्डी' है। इसके मुख के भीतरी भाग में छोटे-छोटे दाँत जैसे होते हैं, यह सीधी होती है। इसके अन्तिम छोर में रुचक (अँगूठी) का