भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदय

आभूषण पहनाया जाता है। इसका कोई उपयोग न होने के कारण ही इसे भूषण कहा गया है। इसका उपयोग गहरे ब्रणों ( घावों ) के मांसों तथा शेष बचे हुए अर्म नामक नेत्ररोग-विशेष का आहरण के लिए किया जाता है ॥ ११ ॥

द्वे द्वादशाङ्गुले मत्स्यतालवत् द्वयेकतालके। नालयन्ते स्मृते कर्णनाडीशल्यापहारिणी ॥ १० ॥

तालयन्त्र-परिचय—तालयन्त्र दो होते हैं—१. एकतालक तथा २. द्वितालक। इनके ताल मछली के गले के ताल के सदृश होते हैं। इनकी दोनों लम्बाई १२-१२ अंगुल होती है। इनका उपयोग कान, नासिका तथा नाडीब्रण के भीतर का शल्य ( पूय = मवाद तथा गर्भ को भी शल्य कहा गया है ) को निकालने में होता है ॥ १० ॥

नाडीयन्त्राणि सुषिराण्येकानेकमुखानि च। स्रोतोगतानां शल्यानामामयानां च दर्शने ॥ ११ ॥

क्रियाणां सुकरत्वाय कुर्यादाचूषणाय च। तद्विस्तारपरीणाहृदैर्घ्यं स्रोतोऽनुरोधतः ॥ १२ ॥

नाडीयन्त्र-परिचय—नाडीयन्त्र सुषिर ( खोखले ) होते हैं। बाहर की ओर उनमें अनेक छिद्र बनाये जाते हैं। इनका उपयोग गुद तथा भग ( योनि तथा गर्भाशय ) आदि स्रोतों में गये हुए शल्यों को एवं उनके भीतर पैदा हुए अर्श के मस्यों को देखने के लिए किया जाता है। उक्त स्थानों में क्षारकर्म, अग्निदाह आदि चिकित्सा करने में उक्त यन्त्रों से सुविधा होती है। इनका प्रयोग रक्त-आचूषण आदि के लिए भी होता है। ( आचूषण क्रिया में प्रयुक्त नाडीयन्त्र अनेक छिद्रों वाला नहीं होता। आप ध्यान दें—छिद्रों के होने पर आचूषण क्रिया नहीं हो सकेगी। ) स्रोतों के आकार-प्रकार का विचार कर तदनुसार उन यन्त्रों के विस्तार, परिणाह ( मोटा या पतलापन ) तथा दीर्घता ( लम्बा-छोटापन ) का निर्धारण कर लेना चाहिए ॥ ११-१२ ॥

वक्तव्य—‘क्रियाणां सुकरत्वाय’ इस पद्यांश में महर्षि वामट का ‘सुकरत्वाय’ यह प्रयोग वैदिक प्रक्रिया के अनुसार ही ठीक माना जा सकता है। जैसे—‘क्त्वो यक्’ ( ७१।४७ ) पाणिनि के इस सूत्र का उदाहरण है—‘द्विं सुपुर्णो गत्वाय’। ( ऋग्वेद ) और अव्ययान्त शब्दों से ‘सु’ का लोप होकर वह शब्द सदा एक ही रूप में बना रहता है, क्योंकि ‘यत्रव्येति तदव्ययम्’ अर्थात् जिस शब्द के रूप विभक्तियों के अनुसार परिवर्तित नहीं होते उसे ‘अव्यय’ कहते हैं।

दशाङ्गुलाऽर्धनाहाऽन्तःकण्ठशल्यावलोकनी। नाडी—

कण्ठशल्यावलोकनी नाडी—कण्ठ के भीतर गये हुए शल्य को देखने के लिए जिस नाडीयन्त्र का निर्माण कराया जायेगा, वह १० अंगुल लम्बी और ५ अंगुल मोटी होनी चाहिए।

—पञ्चमुखच्छिद्रा चतुष्कर्णस्य सङ्ग्रहे ॥ १३ ॥

वारङ्गस्य, द्विकर्णस्य त्रिच्छिद्राः तत्प्रमाणतः ।

द्विकर्ण, चतुष्कर्ण नाडीयन्त्र—चार कर्ण वाले वारंग ( मूठ ) को पकड़ने के लिए पाँच मुखों वाली नाडी तथा दो कर्ण वाले वारंग को पकड़ने के लिए तीन छेदों ( मुखों ) वाली नाडी उसी प्रमाण से बनायी जाती है ॥ १३ ॥

वारङ्कर्णसंस्थानानाहृदैर्घ्यानुरोधतः ॥ १४ ॥

नाडीरेवविधाश्चात्या द्रष्टुं शल्यानि कारयेत् ।

विविध नाडीयन्त्र—शल्य के वारंग ( मूठ ), कर्ण ( फर ), संस्थान ( आकार, स्वरूप ), आनाह ( मोटाई ) तथा लम्बाई के अनुसार उसे ( शल्य को ) देखने के लिए विविध प्रकार के नाडीयन्त्र तैयार करवाने चाहिए ॥ १४ ॥