अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
वक्तव्य—कुछ संस्करणों में इसका पाठभेद मिलता है, किन्तु अर्थ की दृष्टि से दोनों पाठ समान नहीं हैं।
निशि स्वप्ने न मध्याह्ने स्नाने नोष्णगभस्तिभिः ॥ १६ ॥
अभिरोगाय दोषाः सूर्यर्धितोत्पीडितद्रुताः । प्रातः सायं च तच्छान्त्ये व्यध्रेऽर्कैस्तोऽज्येत्सदा ॥
अज्ञनप्रयोग-निर्देश—रात में, सोते समय, दोपहर में, सूर्य की तेज किरणों से आँखों के मलिन होने पर अंजन का प्रयोग न करें; क्योंकि उक्त अवसरों तथा स्थितियों में दोष बढ़े रहते हैं, उत्पीड़ित तथा पिघले हुए रहते हैं। अतः इन समयों में अंजन का प्रयोग करने से अंजन नेत्ररोगों को पैदा करने में कारण हो सकते हैं। अतएव नेत्ररोगों की शान्ति के लिए प्रतिदिन प्रातःकाल, सायंकाल तथा जब आकाश में बादल छाये न हों तब अंजन-प्रयोग करना चाहिए ॥ १६-१७ ॥
वदन्यन्त्ये तु न दिवा प्रयोज्यं तीक्ष्णमअंजन्म् । विरेकदुर्बलं चक्षुरादित्यं प्राप्य सीदति ॥ १८ ॥
अन्य आचार्यों का मत—अंजन-प्रयोग के सन्दर्भ में आचार्यों का मतभेद—कुछ आचार्यों का कथन है कि तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग दिन में करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि तीक्ष्ण अंजन को दिन में लगाने से आँखों से आँसूओं का अधिक स्राव हो जाने पर आँखें दुर्बल पड़ जाती हैं। इस स्थिति में वे सूर्य के प्रकाश को पाकर पीड़ित हो जाती हैं ॥ १८ ॥
स्वप्नेन राज्ञो कालस्य सोम्यत्वेन च तर्पिता । शीतसात्म्या दृग्ग्रायेन्यौ स्थिरतां लभते पुनः ॥ १९ ॥
तीक्ष्णांजन का रात्रि-प्रयोग—रात्रि में सोने से तथा काल के सोमगुणसम्पन्न होने से तृप्त हुई आग्नेय गुण-प्रधान होने पर भी शीतसात्म्य गुणवाली आँखें तीक्ष्ण अंजन द्वारा विरक्त होने पर भी पुनः स्थिरता को प्राप्त कर लेती हैं ॥ १९ ॥
अत्युद्विक्ते बलासे तु लेखनीयेऽथवा गदे । काममहद्यपि नात्युष्णे तीक्ष्णमक्षिण प्रयोजयेत् ॥ २० ॥
उष्णकाल में तीक्ष्णांजन-निषेध—कफदोष की अधिक वृद्धि होने पर अथवा लेखनीय नेत्ररोग होने पर दिन में तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग समशीतोष्ण ऋतुओं में भले ही कर लें, परन्तु अत्यन्त उष्णकाल में कभी भी दिन में तीक्ष्णांजन का प्रयोग न करें ॥ २० ॥
अशमनो जन्म लोहस्य तत् एव च तीक्ष्णता । उपघातोऽपि तेनैव तथा नेत्रस्य तेजसः ॥ २१ ॥
लौह एवं नेत्र की समानता—जिस प्रकार लौहधातु की उत्पत्ति पत्थर से होती है, उस पत्थर से ही उस लौह में तीक्ष्णता भी आती है और वह लौहधातु पत्थर के उपघात (चोट) से टूट भी जाता है; ठीक यही स्थिति नेत्र की उत्पत्ति आदि की है। यथा—नेत्र की उत्पत्ति तेजस् तत्त्व से होती है, उसमें जो तेजोमयता अर्थात् तीक्ष्णता होती है, वह भी तेजस् तत्त्व से ही होती है और वह नेत्र का उपघात (विनाश) भी तेजस् तत्त्व से ही होता है ॥ २१ ॥
वक्तव्य—नेत्र का यह आलंकारिक परिचय हमें यह समझा रहा है कि तेजोगुण-प्रधान नेत्र में कभी भी दिन में उसमें भी उष्णकाल में तीक्ष्णांजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसी से मिलता-जुलता एक उदाहरण ज्योतिषशास्त्र में है—'त्रिज्येच्छं नैव युक्तं कदापि'। अर्थात् क्र-वधू अपने-अपने घर में सबमें बड़े हों तो उनका विवाह ज्येष्ठ में न करें। यहाँ भी 'तेजसः' से सम्बन्ध है, अस्तु।
न रात्रावपि शीतेऽति नेत्रे तीक्ष्णांजनं हितम् । दोषमग्नावयेत्तत्संधं कण्डूजाड्यादिकारि तत् ॥
तीक्ष्ण अंजन का निषेध—अधिक शीतकाल में रात के समय में भी तीक्ष्ण अंजन हितकारक नहीं होता, क्योंकि शीतकाल में कालप्रभाव से जमे हुए दोष को वह अंजन निकाल तो पाता नहीं, इसके विपरीत वह नेत्र में स्तम्भता, खजली तथा जड़ता आदि विकारों को पैदा कर देता है ॥ २२ ॥