अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआश्रितनाअनविधिरध्यायः २३ ]
सूत्रस्थानम्
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—लेखनं तत्र कथायास्त्वपूषणीः ॥ १० ॥
लेखन अंजन—यह क.सैले, खट्टे, नमकीन तथा कटुरस-प्रधान द्रव्यों द्वारा बनाया जाता है ॥ १० ॥
रोपणं तित्तकैद्रव्यैः—
रोपण अंजन—तित्तरस-प्रधान द्रव्यों द्वारा रोपण अंजन का निर्माण किया जाता है।
—स्वादुशीतैः प्रसादनम् । तीक्ष्णाञ्जनभिसन्तप्ते नयेन तत्प्रसावनम् ॥ ११ ॥ प्रयुज्यमानं लभते प्रत्यञ्जनसमाह्वयम् ।
प्रसादन अंजन—मधुररस-प्रधान तथा शीतवीर्य द्रव्यों से निर्मित अंजन को प्रसादन अंजन कहते हैं।
प्रत्यञ्जन—तीक्ष्ण ( लेखन ) अंजन का प्रयोग करने से सन्तप्त ( जिसमें जलन हो रही हो ) नेत्र में जलन की शान्ति के लिए चूर्ण रूप जिस अंजन का प्रयोग किया जाता है, उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं ॥ ११ ॥
बक्तव्य—‘प्रसादन अंजन’ को ‘स्नेहन अंजन’ भी कहा गया है। अंजन के अन्य तीन भेद इस प्रकार हैं—१. गुटिका, जैसे—चन्द्रोदयावर्ति आदि। २. रस, जैसे—नेत्रबिन्दु आदि और ३. चूर्ण, सुरमा आदि। प्रत्यञ्जन का प्रयोग स्वस्थ नेत्रों में प्रतिदिन किया जा सकता है। इसे देखें—अ.सं.सू. ३२१८।
दशाङ्गुला तनुर्मध्ये शलाका मुकुलानना ॥ १२ ॥
प्रशस्ता, लेखने ताब्री, रोपने काल्लोहजा । अङ्गुली च, सुवर्णाया रूप्यजा च प्रसादने ॥ १३ ॥
अञ्जन-शलाका—इसकी लम्बाई १० अंगुल, मध्य भाग कुछ मोटाई युक्त तथा अगला भाग गोल होना चाहिए। लेखन अंजन लगाने के लिए तांबा की, रोपण अंजन लगाने के लिए काल्लोह ( इसपाती लोह ) की शलाका अथवा अंगुली और प्रसाद अंजन लगाने के लिए सोने अथवा चाँदी की शलाका ( सलाई ) होनी चाहिए। शलाका के अभाव में सभी अंजन अंगुली से लगाये जा सकते हैं ॥ १२-१३ ॥
बक्तव्य—बरेली के बाजार में अथवा सर्वत्र शृंगार-साधन की दूकानों में विभिन्न धातुओं की सलाई सहित सुरमादानियों मिलती हैं। प्रायः मटर या राजमाष की गोलाई के समान मोटी सलाई सुरमा लगाने के लिए उत्तम मानी जाती है। सलाई का चिकना होना अति आवश्यक होता है। सुरमादानी तथा सलाई सोना, चाँदी, पीतल, कांसा, जस्ता ( यशद ), शीशा तथा काँच की बनायी जाती हैं। सुरमा के साथ उक्त धातुओं का भी उपयोग नेत्रों को लाभ पहुँचाता है। इसके लिए धातुओं के गुण-धर्मों पर विचार करें।
पिण्डो रसक्रिया चूर्णस्त्रिघैवाञ्जनकल्पना । गुरो मध्ये लघो दोषे तां क्रमेण प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥
अञ्जनो की त्रिबिध कल्पना—अंजनों के निर्माण तीन प्रकार से किये जाते हैं—१. पिण्ड ( गोली या बत्ती के रूप में ), २. रसक्रिया ( मधु या काजल के रूप में ) तथा ३. चूर्ण ( नयनामृत, ममीरा का सुरमा आदि )। इनके प्रयोग—दोषों के बह जाने पर पिण्ड अंजनों का, मध्यम दोष होने पर रसक्रिया का तथा लघु दोष में चूर्ण रूप में प्रयुक्त होने वाले अंजनों का प्रयोग करना चाहिए ॥ १४ ॥
हरेणुमात्रा पिण्डस्य वेल्तमात्रा रसक्रिया । तीक्ष्णस्य, द्विगुणं तस्य मृदुनः—
अञ्जनो की मात्रा—तीक्ष्ण पिण्ड ( वर्ति ) रूप अंजन की मात्रा हरेणु ( बड़े चने ) के बराबर, रसक्रिया नामक अंजन की मात्रा वेल्त ( वायविङग ) के बराबर होती है। मृदु पिण्ड अंजन की मात्रा दो हरेणु के बराबर और मृदु रसक्रिया नामक अंजन की मात्रा दो वेल्त के बराबर होती है।
—चूर्णितस्य च ॥ १५ ॥
हे शलाके तु तीक्ष्णस्य, तिस्रस्तदितरस्य च ।
तीक्ष्ण अञ्जनो की मात्रा—तीक्ष्ण चूर्ण अंजन की मात्रा दो सलाई में जितना चूर्ण ( सुरमा या अंजन ) उठ जाय उतनी मात्रा होती है तथा मृदु चूर्णाञ्जन की मात्रा तीन सलाईभर होती है ॥ १५ ॥