अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआश्वीतनाअनविधिरध्यायः २३ ]
सूत्रस्थानम्
२६७
नाअयेद्वीतवमितविरिक्ताशितवेगिते । क्रुद्धज्वरितान्ताक्षिशिरोरुक्शोकजागरे ॥ २३ ॥
अवृष्टेऽर्क शिरःस्नाते पीतयोर्धूमसद्योः । अजीर्णोऽन्यकसन्तप्ते दिवासुप्ते पिपासिते ॥ २४ ॥
अंजन के अयोय्य व्यक्ति—भयभीत पुरुष, जिसने अभी वमन किया हो, जिसने अभी विरिजन किया हो, जिसने तत्काल भोजन किया हो, मल-मूत्र आदि के बेग के समय, क्रोध की स्थिति में, ज्वर होने पर, तान्त ( सूक्ष्मदर्शन, तेजोमय पदार्थों को देखने के बाद अथवा अभिघात ) होने पर, नेत्ररोग में, शिरोरोग में, शोक की स्थिति में, अधिक जागरण होने पर, सूर्य के ढके होने पर, शिरःस्नान करने के बाद, धूम्रपान तथा मद्यपान करने पर, अजीर्ण की स्थिति में, आग या सूर्य से आँखों के सन्ताप्त होने पर, दिन में सोने के बाद तथा प्यास लगी हो उस समय भी अंजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ २३-२४ ॥
वक्तव्य—उक्त व्यक्तियों को अंजन का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए, यदि कर दिया जाता है तो उसका क्या प्रतिफल होता है, इसका विवेचन सु.उ. १८६८ से ७४ तक दिया गया है, देखें।
अतितीक्ष्णमृदुस्तोकबहृच्छघनकर्कशम् । अत्यर्थशीतलं तप्तमअनं नावचारयेत् ॥ २५ ॥
निषिद्ध अंजन का वर्णन—अतितीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, बहुत कम, बहुत अधिक, अत्यन्त द्रव, बहुत गाढ़ा, कर्कश ( खुरदरा ), अत्यन्त शीतल तथा अत्यन्त तपा हुआ ( गरम ) इस प्रकार के अंजन प्रयोग करने योग्य नहीं होते, अतएव इन्हें निषिद्ध कहा गया है ॥ २५ ॥
अथानुन्मीलयन् दुष्टिमन्तः सञ्चारयेच्छतैः । अञ्जिते वर्त्तनीं किञ्चिञ्चालयेच्छैवमअनम् ॥ २६ ॥
तीक्ष्णं व्याप्नोति सहसा, न चोन्मेषनिमेषणम् । निष्पीडनं च वर्त्तभ्यां खालनं वा समाचरेत् ॥
अंजन-प्रयोगविधि—अंजन लगाने के बाद पलकों को बिना खोले हुए नेत्रगोलक को धीरे-धीरे भीतर-ही-भीतर नीचे, ऊपर, दाहिने तथा बायें घुमाता रहे और थोड़ा-थोड़ा पलकों को भी कुछ-कुछ टपटपाता रहे। इस प्रकार करने से आँख में लगाया हुआ अंजन आँख के चारों ओर फैल जाता है। विशेष करके यह विधि तीक्ष्ण अंजन के प्रयोग की है। अंजन लगाने के तत्काल बाद सहसा उन्मेष ( पलक को उठाना ) तथा निमेष ( पलक को गिराना ) क्रिया नहीं करनी चाहिए। आँख की पलकों द्वारा अक्षिगोलक को दबाना अथवा आँख को घोंना नहीं चाहिए ॥ २६-२७ ॥
वक्तव्य—अंजन लगाने की सुश्रुतसम्मत विधि को देखें—सु.उ. १८६४-६५।
अपेतौषधसंरम्भं निर्वृत्तं नयनं यदा । व्याधिदोषर्तुयोग्याभिरिद्धिः प्रक्षालयेत्तदा ॥ २८ ॥
नेत्र-प्रक्षालनविधि—अंजन लगाने के बाद जब औषध का लगाना एवं गड़ना बन्द हो जाय तब रोग, दोष, ऋतु ( काल ) के अनुकूल अर्थात् शीतकाल में गुनगुने जल से तथा गर्मी में शीतल जल से नेत्र को धो देना चाहिए ॥ २८ ॥
दक्षिणाङ्गुष्ठकेनाक्षि ततो वामं सवाससा । ऊर्ध्ववर्त्तनीं सङ्गृह्य शोध्यं वामेन चेतर्त्तु ॥ २९ ॥
नेत्र-शोधनविधि—उसके बाद दाहिने अँगूठा पर कोमल एवं साफ वस्त्र लपेट कर उससे बायें नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर उसे साफ कर देना चाहिए और वस्त्र लपेटे हुए बायें अँगूठा से उसके दाहिने नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर दाहिने नेत्र को साफ कर देना चाहिए ॥ २९ ॥
वर्त्तमप्राप्तोऽअनाद्वोषो रोगान् कुर्यादतोऽन्यथा ।
नेत्र-शोधन में हेतु—अंजन का प्रयोग करने के पश्चात् उक्त विधि से प्रक्षालन ( घोना ) तथा शोधन न करने से पलकों के भीतर बचे हुए अंजन से कुपित हुए दोष रोगों को उत्पन्न कर देते हैं।
वक्तव्य—इसका स्पष्टीकरण देखें—‘अति विरकात्’...‘दीर्घव्यानि’ । ( अ.सं.सू. ३२।१९ )
कण्डूजाडयेऽअनं तीक्ष्णं धूम्रं वा योजयेत् पुनः ॥ ३० ॥