भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

आश्वीतनाअनविधिरध्यायः २३ ]

सूत्रस्थानम्

२६७

नाअयेद्वीतवमितविरिक्ताशितवेगिते । क्रुद्धज्वरितान्ताक्षिशिरोरुक्शोकजागरे ॥ २३ ॥

अवृष्टेऽर्क शिरःस्नाते पीतयोर्धूमसद्योः । अजीर्णोऽन्यकसन्तप्ते दिवासुप्ते पिपासिते ॥ २४ ॥

अंजन के अयोय्य व्यक्ति—भयभीत पुरुष, जिसने अभी वमन किया हो, जिसने अभी विरिजन किया हो, जिसने तत्काल भोजन किया हो, मल-मूत्र आदि के बेग के समय, क्रोध की स्थिति में, ज्वर होने पर, तान्त ( सूक्ष्मदर्शन, तेजोमय पदार्थों को देखने के बाद अथवा अभिघात ) होने पर, नेत्ररोग में, शिरोरोग में, शोक की स्थिति में, अधिक जागरण होने पर, सूर्य के ढके होने पर, शिरःस्नान करने के बाद, धूम्रपान तथा मद्यपान करने पर, अजीर्ण की स्थिति में, आग या सूर्य से आँखों के सन्ताप्त होने पर, दिन में सोने के बाद तथा प्यास लगी हो उस समय भी अंजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ २३-२४ ॥

वक्तव्य—उक्त व्यक्तियों को अंजन का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए, यदि कर दिया जाता है तो उसका क्या प्रतिफल होता है, इसका विवेचन सु.उ. १८६८ से ७४ तक दिया गया है, देखें।

अतितीक्ष्णमृदुस्तोकबहृच्छघनकर्कशम् । अत्यर्थशीतलं तप्तमअनं नावचारयेत् ॥ २५ ॥

निषिद्ध अंजन का वर्णन—अतितीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, बहुत कम, बहुत अधिक, अत्यन्त द्रव, बहुत गाढ़ा, कर्कश ( खुरदरा ), अत्यन्त शीतल तथा अत्यन्त तपा हुआ ( गरम ) इस प्रकार के अंजन प्रयोग करने योग्य नहीं होते, अतएव इन्हें निषिद्ध कहा गया है ॥ २५ ॥

अथानुन्मीलयन् दुष्टिमन्तः सञ्चारयेच्छतैः । अञ्जिते वर्त्तनीं किञ्चिञ्चालयेच्छैवमअनम् ॥ २६ ॥

तीक्ष्णं व्याप्नोति सहसा, न चोन्मेषनिमेषणम् । निष्पीडनं च वर्त्तभ्यां खालनं वा समाचरेत् ॥

अंजन-प्रयोगविधि—अंजन लगाने के बाद पलकों को बिना खोले हुए नेत्रगोलक को धीरे-धीरे भीतर-ही-भीतर नीचे, ऊपर, दाहिने तथा बायें घुमाता रहे और थोड़ा-थोड़ा पलकों को भी कुछ-कुछ टपटपाता रहे। इस प्रकार करने से आँख में लगाया हुआ अंजन आँख के चारों ओर फैल जाता है। विशेष करके यह विधि तीक्ष्ण अंजन के प्रयोग की है। अंजन लगाने के तत्काल बाद सहसा उन्मेष ( पलक को उठाना ) तथा निमेष ( पलक को गिराना ) क्रिया नहीं करनी चाहिए। आँख की पलकों द्वारा अक्षिगोलक को दबाना अथवा आँख को घोंना नहीं चाहिए ॥ २६-२७ ॥

वक्तव्य—अंजन लगाने की सुश्रुतसम्मत विधि को देखें—सु.उ. १८६४-६५।

अपेतौषधसंरम्भं निर्वृत्तं नयनं यदा । व्याधिदोषर्तुयोग्याभिरिद्धिः प्रक्षालयेत्तदा ॥ २८ ॥

नेत्र-प्रक्षालनविधि—अंजन लगाने के बाद जब औषध का लगाना एवं गड़ना बन्द हो जाय तब रोग, दोष, ऋतु ( काल ) के अनुकूल अर्थात् शीतकाल में गुनगुने जल से तथा गर्मी में शीतल जल से नेत्र को धो देना चाहिए ॥ २८ ॥

दक्षिणाङ्गुष्ठकेनाक्षि ततो वामं सवाससा । ऊर्ध्ववर्त्तनीं सङ्गृह्य शोध्यं वामेन चेतर्त्तु ॥ २९ ॥

नेत्र-शोधनविधि—उसके बाद दाहिने अँगूठा पर कोमल एवं साफ वस्त्र लपेट कर उससे बायें नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर उसे साफ कर देना चाहिए और वस्त्र लपेटे हुए बायें अँगूठा से उसके दाहिने नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर दाहिने नेत्र को साफ कर देना चाहिए ॥ २९ ॥

वर्त्तमप्राप्तोऽअनाद्वोषो रोगान् कुर्यादतोऽन्यथा ।

नेत्र-शोधन में हेतु—अंजन का प्रयोग करने के पश्चात् उक्त विधि से प्रक्षालन ( घोना ) तथा शोधन न करने से पलकों के भीतर बचे हुए अंजन से कुपित हुए दोष रोगों को उत्पन्न कर देते हैं।

वक्तव्य—इसका स्पष्टीकरण देखें—‘अति विरकात्’...‘दीर्घव्यानि’ । ( अ.सं.सू. ३२।१९ )

कण्डूजाडयेऽअनं तीक्ष्णं धूम्रं वा योजयेत् पुनः ॥ ३० ॥

२६८

अष्टाङ्गहृदये

तीक्ष्णाञ्जन या धूमपान—यदि नेत्रमण्डल में खुजली अथवा जड़ता का अनुभव हो रहा हो तो तीक्ष्ण अंजन का अथवा तीक्ष्ण धूमपान का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ३० ॥

तीक्ष्णाञ्जनाभितप्ते तु चूर्णं प्रत्यञ्जनं हिमम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थान आश्वोतनाञ्जनविधिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥


प्रत्यञ्जन का वर्णन—तीक्ष्ण अञ्जन का प्रयोग करने पर यदि आँख में जलन प्रतीत हो रही हो तो चूर्ण ( सुरमा ) का प्रत्यञ्जन करना चाहिए ॥ ३१ ॥

वक्तव्य—प्रतिदिन आँख में जो सुरमा लगाया जाता है, इसी को प्रत्यञ्जन कहते हैं। देखें—अ.ह.सू. २।५। नेत्र से खूब आँसू गिरे इसके लिए रसाञ्जन का प्रयोग एक-एक सप्ताह में करना चाहिए। सुश्रुत में भी देखें—सु.उ. १८।६८।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में आश्वोतनाञ्जनविधि नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २३ ॥


चतुर्विंशोऽध्यायः

अथातस्तर्पणपूटपाकविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से तर्पण एवं पूटपाक विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —तेईसवें अध्याय में नेत्ररोगों की शान्ति के लिए जिन आश्रोतन तथा अज्ञान विधियों का वर्णन किया था, उनसे प्रायः नेत्रों में दुर्बलता आ जाती है। अतएव उसके बाद इस अध्याय में नेत्रतर्पण आदि विधियों का वर्णन किया जा रहा है। तर्पण का अर्थ है—नेत्रों को द्रव औषधों के सेचन से तृप्त करना। इस कार्य में पूटपाक-विधि उपकारक होती है। गीले या सूखे औषध-द्रव्यों से विधिभेद से स्वरस निकाला जाता है और केवल सूखे द्रव्यों का पूटपाक-विधि से स्वरस निकाला जाता है। इसका ज्ञान महाकवि भवभूति को भी था। देखें—‘पूटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः’। इन दोनों विधियों से प्राप्त रस का सेचन आँखों में किया जाता है और इससे नेत्र तृप्त होते हैं।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —सू.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३३ में देखें। चरक ने इस शालाक्यतन्त्र को पराधिकार समझकर इसका वर्णन अपनी संहिता में नहीं किया है।

नयने ताभ्यति स्तब्धे शुष्के रूक्षेऽभिघातिते। वातपित्तातुरे जिह्वे शीर्णपक्ष्माविलेक्षणे ॥ १ ॥

कृच्छ्रोन्मोलिशिराहर्षशिरोत्पाततमोऽर्जुनैः । स्यन्दमन्यान्यतोवातवातपर्यायशुक्रकैः ॥ २ ॥

आतुरे शान्तरागाश्रुशूलसंरम्बद्वयिके । निवाते तर्पणं योज्यं शुद्धयोर्यूर्द्धकाययोः ॥ ३ ॥

काले साधारणे प्रातः सायं वोतानशायिनः ।

तर्पणविधि-वर्णन —जब आँखों के सामने अन्धेरा प्रतीत हो, जब आँखें स्तब्ध हों, सूखी हों, रूखी हों, उन पर किसी प्रकार का आघात लगा हो, नेत्र पर वात या पित्त दोष की विकृति हो, नेत्रगोलक टेढ़े हो गये हों (जिसे ऐंचा-ताना कहते हैं), पक्षम (बरैनियों) के बाल उखड़ गये हों, दृष्टि मलिन हो गयी हो, नेत्रों को खोलने में कष्ट होता हो; जब नेत्र सिराहर्ष, सिरोत्पात, तिमिररोग, अर्जुनरोग, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, अन्यतोवात, वातपर्यय अथवा शुक्ररोग से पीड़ित हों तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए। जब आँखों की लालिमा, आँसू बहना, शूल, संरम्ब (शोथ) तथा दृषिका (नेत्रमल) ये शान्त हो जायें तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए। नस्य से सिर का तथा वमन-विरचन आदि द्वारा शरीर का शोधन कराकर निवातस्थान में, समशीतोष्ण काल में प्रातःकाल अथवा सायंकाल में रोगी को चित लिटाकर तर्पण का प्रयोग करना चाहिए ॥ १-३ ॥

यवमाषमयीं पालीं नेत्रकोशाद्भिः समाम् ॥ ४ ॥

द्वयङ्गुलोच्चां दृढां कृत्वा यथास्वं सिद्धभावेत्। सर्पिनिर्मिलिते नेत्रे तप्ताम्बुप्रबिलायितम् ॥ ५ ॥

नक्तान्थवाततिमिरकृच्छ्रोबोधदिके वसाम्। आपक्षमाग्रात्—

तर्पण की दूसरी विधि —इस विधि में भी रोगी को चित लिटाकर उसके नेत्रकोश से बाहर जो या उड़द के आटे के समान आकार की एक पाली बनवाये, जो दो अंगुल ऊँची हो और दृढ़ हो, जो तर्पण

२७०

अष्टाङ्गहृदये

द्रव डालने पर टूट न जाय। उसमें दोष तथा रोग के अनुसार सिद्ध किये हुए स्नेह को भर दें। इस सिद्ध स्नेह को भरते समय नेत्रों को बन्द कर लें। यदि स्नेह में घृत है तो उसे गरम पानी में पात्र सहित रखकर पिघला लें। यदि रतीघी, वातदोष-प्रधान तिमिररोग हो तथा कठिनायी से नींद खुलती हो तो इन रोगों में वसा का प्रयोग करना चाहिए। यह वसा उस पाली में उतनी भरनी चाहिए, जिससे बरीनी के बाल उसमें डूब जायें ॥ ४-५ ॥

—अथोन्मेषं शनकैस्तस्य कुर्वतः ॥ ६ ॥

मात्रा विगणयेत्त्र वत्ससन्धिस्तित्तसिते। दृष्टौ च क्रमशो व्याघौ शतं त्रीणि च पञ्च च ॥ ७ ॥

शतानि सप्त चाष्टौ च, दश मन्ये, दशानिले। पिते षट्, स्वस्थवृत्ते च बलासे पञ्च धारयेत् ॥ ८ ॥

स्नेह-धारणकाल—स्नेह के भर जाने के बाद वह रोगी धीरे-धीरे आँख या आँखों को खोलने का प्रयत्न करे। तदनन्तर चिकित्सक रोगी के समीप बैठकर मात्रा की गणना इस प्रकार करे—वत्सगत रोग में १००, सन्धिगत रोगों में २००, सफेदमण्डल के रोगों में ५००, कृष्णमण्डल के रोगों में ७००, दृष्टिमण्डल के रोगों में ८००, अधिमन्त्ररोग में १०००, वातज नेत्ररोगों (वातपर्यय आदि) में १०००, पित्तज नेत्ररोगों में ६००, स्वस्थवृत्त अर्थात् स्वस्थ पुरुष के प्रति प्रयोग किये जाने पर भी ६०० तथा कफज रोगों में ५०० मात्रा तक का समय स्नेह धारण करने के लिए पर्याप्त है ॥ ६-८ ॥

बत्क्य—जिस कालप्रमाण को महर्षि वाग्भट ने 'मात्रा' कहा है, उसे श्रीसुश्रुत ने (सु.उ. १८८ में) 'वाक्' कहा है। ये शब्द प्राचीन काल में काल को नापने के लिए प्रयुक्त किये जाते थे। यहाँ मात्रा शब्द से लघुमात्रा उच्चारण के बराबर काल का ही ग्रहण करना चाहिए। १०० मात्रा के उच्चारण में प्रायः ३ मिनट लग जाते हैं, यही स्थिति वाक् की भी है।

कृत्वाऽपाङ्के ततो द्वारं स्नेहं पात्रं निगालयेत्। पिबेच्च धूम्रं, नक्षेत व्योम रूपं च भास्वरम् ॥ ९ ॥

तर्पण का पश्चात् कर्म—अपांग (आँख का बाहरी कोर) की ओर द्वार करके अर्थात् उस ओर सिर सहित आँख को झुकाकर नेत्र-तर्पण के लिये डाले गये स्नेह को किसी पात्र में निकाल लें (सुश्रुत के अनुसार—'स्विक्नेन यवपिष्टेन शोधयेत्' (सु.उ. १८।१०) अर्थात् जो के सने हुए आटा को उबाल कर उससे नेत्र के अवयवों का उबटन करके उसे शुद्ध करें।), तदनन्तर उसे धूम्रपान करायें। यह व्यक्ति आकाश की ओर अर्थात् दूरी में स्थित वस्तुओं को देखने का प्रयत्न न करे और सूर्य आदि चमकीली वस्तुओं को न देखें ॥ ९ ॥

इत्थं प्रतिदिनं वायौ, पिते त्वेकान्तरं, कफे। स्वस्ये च द्रघन्तरं दद्यादातुरेतैरिति योजयेत् ॥ १० ॥

दोषानुसारं तर्पण—इस प्रकार वातदोष में प्रतिदिन, पित्तदोष में एक दिन छोड़कर अर्थात् प्रति तीसरे दिन और कफदोष में तथा स्वस्थ पुरुष के नेत्रों में दो-दो दिन का अन्तर देकर तर्पण का प्रयोग तब तक करता रहे जब तक सम्यक् तर्पण के लक्षण उत्पन्न न हो जायें ॥ १० ॥

बत्क्य—वृद्धवाग्भट ने कुछ अधिक स्पष्ट निर्देश दिये हैं—नेत्रतर्पण के लिए जो आधार (चहार-दिवारी) बनाया था उसे हटाकर कल्क से आँख के अवयवों को पोछ कर उसे धूम्रपान करायें और गुनगुने जले से उसका मुख धुलवा कर रोगानुसार उसे समुचित भोजन करायें। देखें—अ.सं.सू. ३३।५।

प्रकाशक्षमता स्वास्थ्यं विशदं लघु लोचनम्। तृप्ते, विपर्ययोऽतृप्तेऽतितृप्ते श्लेष्मजा रुजः ॥

तर्पण का समयोग—इसमें रोगी के नेत्रों में प्रकाश की ओर देखने की शक्ति हो जाती है, नेत्र की स्वस्थता का अनुभव, नेत्र में स्वच्छता तथा आँखों में हल्कापन प्रतीत होता है। तर्पण का हीनयोग—इसमें

तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः २४ ]

सूत्रस्थानम्

२७१

समयोग के लक्षणों के विपरीत लक्षण होते हैं। तर्पण का अतियोग—इसमें कफज रोगों की उत्पत्ति हो जाती है ॥ ११ ॥

वक्तव्य —तर्पण के हीनयोग में तब तक तर्पण कराना चाहिए जब तक समयोग के लक्षण दृष्टिगोचर न हों और तर्पण के अतियोग में कफनाशक विधियों ( नस्य, धूमपान, अञ्जन, सेक, गण्डूष, कवल आदि ) का प्रयोग कराना चाहिए। कफनाशक विधियों का वर्णन यहाँ भी किया गया है तथा सुश्रुत में भी। देखें—सू.उ. १८।१६।

स्नेहपीता तनुरिव क्लान्ता दृष्टिर्हि सौदति । तर्पणानन्तरं तस्मादुगुबलाधानकारिणम् ॥ १२ ॥ पुटपाकं प्रयुजीत पूर्वोत्तेज्येव यक्षमत् ।

पुटपाक का वर्णन —जिस प्रकार स्नेहपान कर लेने पर शरीर ढीला पड़ जाता है, वैसे ही स्नेह द्वारा तर्पण करने पर दृष्टि भी ढीली पड़ जाती है। अतएव तर्पण-प्रयोग के बाद दृष्टि को बलवती बनाने के लिए पुटपाक-विधि से निकाले गये रसों का यथोचित प्रयोग करना चाहिए। इसका प्रयोग पहले श्लोक २-३ में कहे गये वातज एवं कफज रोगों में करना चाहिए ॥ १२ ॥

स वाते स्नेहनः, श्लेष्मसहिते लेखनो हितः ॥ १३ ॥ दृग्दीर्बल्येऽनिले पिते रक्ते स्वस्थे प्रसादनः ।

दोषानुसार पुटपाक-प्रयोग —पुटपाक तीन प्रकार के होते हैं—१. स्नेहन, २. लेखन तथा ३. प्रसादन। इनका उपयोग—स्नेहन पुटपाक का प्रयोग वातज नेत्ररोगों में, लेखन पुटपाक का प्रयोग कफयुक्त वातज नेत्ररोगों में तथा प्रसादन पुटपाक का प्रयोग दृष्टि की दुर्बलता में, वातज, पित्तज तथा रक्तप्रकोपज नेत्र-रोगों में और स्वस्थ नेत्रों में इनको सदा स्वस्थ रखने की दृष्टि से किया जाता है ॥ १३ ॥

भूशयप्रसहानूपमेदोमज्जवसाभिषैः ॥ १४ ॥ स्नेहनं पयसा पिष्टैर्जीवनीयेश्च कल्पयेत् ।

स्नेहन पुटपाक के द्रव्य —भूशय ( लोमड़ी आदि प्राणी ), प्रसह ( अ.ह.सू. ६।४८ इसमें प्रसहवर्ग के प्राणियों की गणना की गयी है ) तथा अनूप ( 'बृहदकनगोऽनूपः'—शा.सं.पू.खं. १।६४ ) देश में रहने वाले मृग एवं पक्षियों की मेदा, मज्जा, मांस तथा जीवनीय गण के द्रव्यों को दूध में पीसकर स्नेहन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १४ ॥

मृगपक्षियकुन्मांसमुक्तायस्ताप्रतैन्धवेः ॥ १५ ॥ स्रोतोजशङ्खफेनालेलेखनं मस्तुकल्कितैः ।

लेखन पुटपाक के द्रव्य —जांगलदेशीय मृग एवं पक्षियों के यकृत, मांस, मोती, लौहभस्म, ताम्रभस्म, संधानमक, काला तथा सेफेद मुरमा, शंख, समुद्रफेन और हरिताल—इन द्रव्यों को मस्तु ( दही के पानी ) में पीसकर लेखन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १५ ॥

मृगपक्षियकुन्मज्जवसान्त्रहृदयामिषैः ॥ १६ ॥ मधुरैः सघृतैः स्तन्यक्षीरपिष्टैः प्रसादनम् ।

प्रसादन पुटपाक के द्रव्य —साधारणदेशीय मृग एवं पक्षियों के यकृत, मज्जा, वसा, अन्त्र ( आंत ), हृदय, मांस तथा मधुरवर्ग में परिगणित द्रव्य एवं घी—इन सबको स्त्री के दूध में पीसकर प्रसादन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १६ ॥

२७२

अष्टाङ्गहृदये

बिल्वमात्रं पृथक् पिण्डं मांसभेषजकल्कयोः ॥ १७ ॥

उरूकवटाम्भोजपत्रैः स्नेहादिषु क्रमात्। वेष्टयित्वा मुदा लिप्तं धवधन्वनगोमयैः ॥ १८ ॥ पचेत्यदीनैरन्यामं पक्वं निष्पीड्य तदस्मत्। नेत्रे तर्पणवद्युज्यात्—

पुटपाक-रचनाविधि—ऊपर तीन प्रकार के पुटपाकों के निमित्त कहे गये मांस आदि द्रव्यों तथा औषधद्रव्यों का बिल्वभर ( १-१ पल = ४ तोला ) कल्क ( चटनी ) लेकर गोला जैसा बनायें। फिर क्रमशः स्नेहन पुटपाक के लिए एण्ड के पत्तों से, लेखन पुटपाक के लिए बरगद के पत्तों से तथा प्रसादन पुटपाक के लिए कमल के पत्तों से लपेट कर उन सबके ऊपर दो अंगुल मोटा मिट्टी का लेप करके उसी क्रम से स्नेहन को धव की लकड़ियों में, लेखन को धामिन की लकड़ियों में तथा प्रसादन को उपलौ ( गोहरी ) की आग में पकायें। जब मिट्टी ऊपर से लाल हो जाय तो पका हुआ समझें। शीतल हो जाने पर मिट्टी को धीरे से हटाकर उसका रस निचोड़ कर तर्पण-विधि की भाँति इस रस का भी प्रयोग करना चाहिए ॥ १७-१८ ॥

—शतं द्वे त्रीणि धारयेत् ॥ १९ ॥

लेखनस्नेहनाल्येषु—

धारणकाल-अवधि—पुटपाक से प्राप्त रस को नेत्रों में डालने के बाद लेखन पुटपाक के रस को १०० मात्रा तक रखें। स्नेहन पुटपाक के रस को २०० मात्रा तक रखें और अन्तिम प्रसादन पुटपाक के रस को ३०० मात्रा तक रखें ॥ १९ ॥

—कोष्णौ पूर्वौ, हिमोऽपरः।

उष्ण-शीतप्रयोग भेद—इन पुटपाक के रसों में पहले के दो ( स्नेहन तथा लेखन ) पुटपाकों का रस गुनगुना करके प्रयोग करना चाहिए और बाद वाला अर्थात् प्रसादन पुटपाक का रस शीतल ही प्रयोग करना चाहिए।

धूमपोऽन्ते तयोरिव—

पश्चात् कर्म—स्नेहन तथा लेखन पुटपाक से निकले हुए रसों के प्रयोग करने के बाद रोगी को धूमपान कराना चाहिए। इससे स्नेह द्वारा उभड़े हुए कफ की शान्ति हो जाती है। 'एव' शब्द प्रसादन पुटपाक के अन्त में धूमपान-सेवन का निषेध करता है।

—योगास्तत्र च तुत्पित्वत् ॥ २० ॥

योगों का निर्देश—इस पुटपाक के प्रयोग में योग ( समयोग, हिनयोग तथा अतियोग ) तर्पण के समान ही होते हैं ( देखें—अ.हृ.सू. २४११ ) ॥ २० ॥

तर्पणं पुटपाकं च नस्यानहं न योजयेत्।

तर्पण एवं पुटपाक का निषेध—जिनको अ.हृ.सू. २०११-१३ में नस्य-सेवन के अयोग्य कहा गया है, उन्हें तर्पण एवं पुटपाक का प्रयोग भी नहीं कराना चाहिए।

यावन्त्यहानि युञ्जीत द्विस्ततो हितभागभवेत् ॥ २१ ॥

मालतीमलिकापुष्पैर्बद्धाक्षो निवसेन्निशाम्।

तर्पण एवं पुटपाक की अवधि—जितने दिनों तक तर्पण अथवा पुटपाक का प्रयोग कराया गया हो उससे दुगुने दिनों तक पथ्य का सेवन कराना चाहिए और इन दिनों रात्रि में मालती ( चमेली ) तथा मलिका के फूलों को आँखों पर बाँधकर सोना चाहिए ॥ २१ ॥

तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः २४ ]

सूत्रस्थानम्

२७३

वक्तव्य —तर्पण तथा पुटपाक के अनुचित प्रयोग से जो रोग पैदा हो जाता है, उसकी चिकित्सा अंजन, आश्रोतन तथा स्वेदन आदि द्वारा तत्काल करें। देखें—सू.उ. १८।३०।

सर्वार्त्तमना नेत्रबलाय यत्नं कुर्वीत तस्याञ्जनतर्पणाद्यैः ॥ २२ ॥

दृष्टिश्च नष्टा विविधं जगच्च तमोमयं जायत एकरूपम् ॥ २३ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भानभटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने तर्पणपुटपाकविधिर्नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


नेत्ररक्षा की आवश्यकता —नेत्ररक्षा के उपाय—नस्य, अंजन, तर्पण आदि ( इस अध्याय में कहे गये ) उपचारों द्वारा सभी प्रकार से नेत्रों की शक्ति को बलवान् बनाये रखने के लिए सर्वदा प्रयत्न करते रहना चाहिए। यदि किसी प्रकार की असावधानी से नेत्रों में विकार उत्पन्न हो जाता है और उससे नेत्र की दर्शनशक्ति नष्ट हो जाती है तो यह विश्व रूप संसार उस नेत्रहीन के लिए अन्धकारमय एकरूप का होकर रह जाता है ॥ २२-२३ ॥

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारावत् त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में

तर्पणपुटपाकविधि नामक चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २४ ॥


१८ अ० ह०

पञ्चविंशोऽध्यायः

अथातो यन्त्रविधिमध्येयार्थं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से यन्त्रविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

वक्तव्य —प्रस्तुत अध्याय से पहले अध्यायों में बस्ति, नस्य, अञ्जन, क्षार आदि के प्रयोग भी यन्त्रों की अपेक्षा रखते हैं, अतः उनका वर्णन करने के बाद अब यहाँ यन्त्रविधि नामक अध्याय का वर्णन किया जा रहा है। इस २५वें अध्याय में ४८ यन्त्रों का वर्णन किया गया है, इनका प्रयोग विविध प्रकार के रोगों की चिकित्साओं के लिए किया जाता है। वृद्धबागभट ने अ.सं.सू. ३४।३ में ये यन्त्र असंख्य होते हैं, इस प्रकार 'अतः कर्मवशात् तेषामियत्ताऽवधारणमशक्यम्' कहा है। वृद्धबागभट ने एक ही अध्याय में यन्त्र तथा शस्त्रों का वर्णन किया है, जिसे अष्टाङ्गहृदय में २५वें तथा २६वें अध्यायों में अलग कहा है। यन्त्र उन उपकरणों को कहते हैं, जिनसे चुभा हुआ काँटा, उखाड़ने योग्य दाँत, निकालने योग्य मृतगर्भ आदि को पकड़ कर निकाला जाता है। इनके अतिरिक्त गुद, भग, मुख आदि को चौड़ा करके भीतर देखने, औषध प्रयोग करने आदि का कार्य भी लिया जाता है, जिनका वर्णन आगे यथास्थान किया जायेगा। सुश्रुत ने 'मन तथा शरीर को पीड़ित करने वाले शल्य होते हैं, इनको निकालने के उपाय यन्त्र होते हैं', ऐसा कहा है। देखें—सू.सू. ७।४।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सू. सू. ७ तथा अ. सं. सू. ३४ में देखें।

विशेष —चरक ने यन्त्र तथा शस्त्रों का वर्णन यह कहकर कि 'तत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविद्यौ'। (च.चि. ५।४४) अर्थात् चरककायचिकित्सा-प्रधान संहिता है और यन्त्र-शस्त्र के प्रयोग में धन्वन्तरि के अनुयायी चिकित्सकों का अधिकार है। फिर भी च.चि. २५।५५ से ६० तक छः प्रकार के शस्त्रकर्मों का वर्णन करते हुए कहा है—'इति षड्विधमृद्विष्टं शस्त्रकर्म मनोविभिः'। यहाँ यह मनोपि शब्द सुश्रुत आदि शल्यशास्त्रज्ञों की ओर संकेत करता है।

नानाविधानां शल्यानां नानादेशप्रबाधिनाम्। आहर्तुमस्युपायो यस्तद्यन्त्रं यच्च दशने ॥ १ ॥

अशोभगन्दरादीनां शस्त्रक्षाराशियोजने। शेपाङ्गपरिरक्षायां तथा बस्त्यादिकर्मणि ॥ २ ॥

घटिकालाबुभृङ्गं च जाम्बवौष्ठादिकानि च।

यन्त्रों का वर्णन —शरीर के विभिन्न देशों (अवयवों) में गढ़े हुए या चुभे हुए शल्यों, जो कष्ट पहुँचा रहे हों, को निकालने का जो उपाय है, उसे यन्त्र कहते हैं और जो अश्व, भगन्दर आदि को देखने में सहायक होते हैं उन्हें भी यन्त्र कहते हैं। शस्त्र, क्षार तथा अश्विकर्म का प्रयोग करते समय शेष अंगों की सुरक्षा के लिए भी इन यन्त्रों की आवश्यकता पड़ती है। बस्ति (गुदबस्ति, उत्तरबस्ति) आदि कर्मों में भी इनका प्रयोग होता है। ये यन्त्र घटिका (घड़ा, लोटा), अलग्बु (तुम्बी), शृंगी (सिगी) इनका प्रयोग वातदोष तथा दूषित रक्त को चूसकर निकालने में होता है। जाम्बवौष्ठा यन्त्र का प्रयोग क्षार लगाने में और काँटा आदि निकालने में सन्दश (चिमटी) आदि का प्रयोग होता है ॥ १-२ ॥

अनेकरूपकार्याणि यन्त्राणि विविधात्यतः ॥ ३ ॥

विकल्प्य कल्पयेद्वृद्ध्या—

यन्त्रविधिरध्यायः २५ ]

सूत्रस्थानम्

२७५

यन्त्रों की विविधता—उक्त यन्त्रों के विविध आकार-प्रकार तथा अनेक कार्य होते हैं अर्थात् योग्य चिकित्सक इनसे अनेक कार्य ले सकते हैं। अतः अपनी विवेकबुद्धि से विचार करके इनका प्रयोग किया जा सकता है॥ ३॥

—यथास्थूलं तु वक्ष्यते।

सामान्य वर्णन—सामान्य दृष्टि से उक्त यन्त्रों का वर्णन आगे किया जायेगा।

वक्तव्य—महर्षि सुश्रुत ने १०१ यन्त्रों का होना स्वीकार कर उनका विभाजन इस प्रकार ६ भागों में किया है। यथा—(क) स्वस्तिकयन्त्र २४, (ख) सन्दशयन्त्र २, (ग) तालयन्त्र २, (घ) नाडीयन्त्र २०, (ङ) शलाकायन्त्र २८ तथा (च) उपयन्त्र २५; योग—१०१। देखें—सु.सू. ७।६। वाग्भट ने सुश्रुतोक्त उपयन्त्र को अनुयन्त्र संज्ञा दी है। देखें—अ.हृ.सू. २५।३२-४०। ये सभी यन्त्र लौहधातु से अथवा लौह जैसे दृढ़ पदार्थ से बनाये जाते हैं। देखें—सु.सू. ७।७। लौह शब्द से सभी धातुओं का ग्रहण किया जाता है। देखें—'सर्व स्यात्तैजसं लोहम्'। (अमरकोष २।९।९९)

तुल्यानि कङ्कसिंहर्क्षकाकादिमृगपक्षिणाम्॥ ४॥

मुखैर्मुखाणि यन्त्राणां कुर्यात्संज्ञकानि च। अष्टादशाङ्गुलायामान्यायसानि च भूरिशः॥ ५॥ मसुराकारपर्यन्तैः कण्ठे बद्धानि कीलकैः। विद्यात्स्वस्तिकयन्त्राणि मूलेऽङ्कुशतानि च॥ ६॥ तैर्दुंदेरस्यिसंलग्नशल्याहरणमिष्यते ।

स्वस्तिकयन्त्र-परिचय—स्वस्तिकयन्त्रों के मुख (अग्रभाग) कंकपक्षी, सिंह, ऋक्ष (भालू), कौआ आदि मृग, पक्षियों के मुखों की आकृति वाले होते हैं, अतएव इन यन्त्रों के नाम भी उन्हीं प्राणियों के नामों के अनुसार रखे गये हैं। यथा—कंकमुख, सिंहमुख आदि। अधिकांश इन यन्त्रों की लम्बाई १८ अंगुल होती चाहिए और इनका निर्माण लोहा धातु से होना चाहिए। इनके कण्ठ (मुख के निचले भाग) में मसुर की आकृति वाली कीलों से बँधे हों और इनका अन्तिम भाग (छोर) अंकुश की भाँति मुड़ा होना चाहिए। क्योंकि इसे पकड़े रहने से हाथ फिसलता नहीं। ये यन्त्र दृढ़ बने हों। इनसे अस्थियों में चुभे हुए शल्यों का आहरण करना चाहिए॥ ४-६॥

कीलबद्धविमुक्ताग्री सन्दंशो योदशाङ्गुलो॥ ७॥

त्वक्शिरास्नायुपिशितलग्नशल्यापकर्षणो ।

सन्दशयन्त्र-परिचय—सन्दशयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. कीलबद्ध (पेंच या कील से जुड़े हुए, जैसे—सँइसी), जिन्हें अन्यत्र सनिग्रह अथवा सनिबन्धन भी कहते हैं तथा २. विमुक्ताग्र (जैसे—चिमटा या चिमटी), जिन्हें अन्यत्र अनिग्रह या अनिबन्धन भी कहा जाता है। इन दोनों की लम्बाई सोलह अंगुल होती है। इनका उपयोग त्वचा, सिरा (धमनी), स्नायु तथा मांस में धँसे, गड़े शल्य (काँटा) आदि को निकालने में किया जाता है॥ ७॥

षडङ्गुलोऽन्त्यो हरणे सूक्ष्मशल्योपपक्षमणाम्॥ ८॥

सन्दशयन्त्र का भेद—ऊपर जो दो सोलह अंगुल वाले सन्दशयन्त्र कहे हैं, उनसे अतिरिक्त इसका एक भेद और होता है, जिसकी लम्बाई छः अंगुल होती है। इसका उपयोग सूक्ष्म शल्य तथा उपपक्षम अर्थात् परबालों को निकालने में किया जाता है॥ ८॥

मुचुण्डी सूक्ष्मदन्तर्जर्मूले रुचकभूषणा। गम्भीरव्रणमांसातानमर्मणः शेषितस्य च॥ ९॥

मुचुण्डी यन्त्र का वर्णन—उक्त षड्गुल सन्दश यन्त्र का नाम 'मुचुण्डी' है। इसके मुख के भीतरी भाग में छोटे-छोटे दाँत जैसे होते हैं, यह सीधी होती है। इसके अन्तिम छोर में रुचक (अँगूठी) का

१७६

अष्टाङ्गहृदय

आभूषण पहनाया जाता है। इसका कोई उपयोग न होने के कारण ही इसे भूषण कहा गया है। इसका उपयोग गहरे ब्रणों ( घावों ) के मांसों तथा शेष बचे हुए अर्म नामक नेत्ररोग-विशेष का आहरण के लिए किया जाता है ॥ ११ ॥

द्वे द्वादशाङ्गुले मत्स्यतालवत् द्वयेकतालके। नालयन्ते स्मृते कर्णनाडीशल्यापहारिणी ॥ १० ॥

तालयन्त्र-परिचय—तालयन्त्र दो होते हैं—१. एकतालक तथा २. द्वितालक। इनके ताल मछली के गले के ताल के सदृश होते हैं। इनकी दोनों लम्बाई १२-१२ अंगुल होती है। इनका उपयोग कान, नासिका तथा नाडीब्रण के भीतर का शल्य ( पूय = मवाद तथा गर्भ को भी शल्य कहा गया है ) को निकालने में होता है ॥ १० ॥

नाडीयन्त्राणि सुषिराण्येकानेकमुखानि च। स्रोतोगतानां शल्यानामामयानां च दर्शने ॥ ११ ॥

क्रियाणां सुकरत्वाय कुर्यादाचूषणाय च। तद्विस्तारपरीणाहृदैर्घ्यं स्रोतोऽनुरोधतः ॥ १२ ॥

नाडीयन्त्र-परिचय—नाडीयन्त्र सुषिर ( खोखले ) होते हैं। बाहर की ओर उनमें अनेक छिद्र बनाये जाते हैं। इनका उपयोग गुद तथा भग ( योनि तथा गर्भाशय ) आदि स्रोतों में गये हुए शल्यों को एवं उनके भीतर पैदा हुए अर्श के मस्यों को देखने के लिए किया जाता है। उक्त स्थानों में क्षारकर्म, अग्निदाह आदि चिकित्सा करने में उक्त यन्त्रों से सुविधा होती है। इनका प्रयोग रक्त-आचूषण आदि के लिए भी होता है। ( आचूषण क्रिया में प्रयुक्त नाडीयन्त्र अनेक छिद्रों वाला नहीं होता। आप ध्यान दें—छिद्रों के होने पर आचूषण क्रिया नहीं हो सकेगी। ) स्रोतों के आकार-प्रकार का विचार कर तदनुसार उन यन्त्रों के विस्तार, परिणाह ( मोटा या पतलापन ) तथा दीर्घता ( लम्बा-छोटापन ) का निर्धारण कर लेना चाहिए ॥ ११-१२ ॥

वक्तव्य—‘क्रियाणां सुकरत्वाय’ इस पद्यांश में महर्षि वामट का ‘सुकरत्वाय’ यह प्रयोग वैदिक प्रक्रिया के अनुसार ही ठीक माना जा सकता है। जैसे—‘क्त्वो यक्’ ( ७१।४७ ) पाणिनि के इस सूत्र का उदाहरण है—‘द्विं सुपुर्णो गत्वाय’। ( ऋग्वेद ) और अव्ययान्त शब्दों से ‘सु’ का लोप होकर वह शब्द सदा एक ही रूप में बना रहता है, क्योंकि ‘यत्रव्येति तदव्ययम्’ अर्थात् जिस शब्द के रूप विभक्तियों के अनुसार परिवर्तित नहीं होते उसे ‘अव्यय’ कहते हैं।

दशाङ्गुलाऽर्धनाहाऽन्तःकण्ठशल्यावलोकनी। नाडी—

कण्ठशल्यावलोकनी नाडी—कण्ठ के भीतर गये हुए शल्य को देखने के लिए जिस नाडीयन्त्र का निर्माण कराया जायेगा, वह १० अंगुल लम्बी और ५ अंगुल मोटी होनी चाहिए।

—पञ्चमुखच्छिद्रा चतुष्कर्णस्य सङ्ग्रहे ॥ १३ ॥

वारङ्गस्य, द्विकर्णस्य त्रिच्छिद्राः तत्प्रमाणतः ।

द्विकर्ण, चतुष्कर्ण नाडीयन्त्र—चार कर्ण वाले वारंग ( मूठ ) को पकड़ने के लिए पाँच मुखों वाली नाडी तथा दो कर्ण वाले वारंग को पकड़ने के लिए तीन छेदों ( मुखों ) वाली नाडी उसी प्रमाण से बनायी जाती है ॥ १३ ॥

वारङ्कर्णसंस्थानानाहृदैर्घ्यानुरोधतः ॥ १४ ॥

नाडीरेवविधाश्चात्या द्रष्टुं शल्यानि कारयेत् ।

विविध नाडीयन्त्र—शल्य के वारंग ( मूठ ), कर्ण ( फर ), संस्थान ( आकार, स्वरूप ), आनाह ( मोटाई ) तथा लम्बाई के अनुसार उसे ( शल्य को ) देखने के लिए विविध प्रकार के नाडीयन्त्र तैयार करवाने चाहिए ॥ १४ ॥

यन्त्रविधिरध्यायः २५ ]

सूत्रस्थानम्

२७७

पञ्चकर्णिकया मूर्ध्नि सन्दृशो द्वादशाङ्गुलम् ॥ १५ ॥ चतुर्थसुषिरा नाडी शल्यनिर्घातिनी मता ।

शल्यनिर्घातिनी नाडी—जिसका ऊपरी भाग कमल की कर्णिका के सदृश हो, लम्बाई १२ अंगुल हो और जिसका चौथाई भाग ( ३ अंगुल ) खोलला हो, उस नाडीयन्त्र को 'निर्घातिनी नाडी' कहते हैं ॥ १५ ॥

वक्तव्य—शल्य का जिस ओर से प्रवेश हुआ हो उसके प्रवेश के अनुरूप निकालने में इसका प्रयोग किया जाता है। इसका खोलला भाग शल्य में फँसाकर विपरीत दिशा से यन्त्र को ठोककर शल्य को सुगमता से निकाल लिया जाता है।

अर्शासां गोस्तनाकारं यन्त्रकं चतुरङ्गुलम् ॥ १६ ॥

नाहे पञ्चाङ्गुलं पुंसां प्रमदानां षडङ्गुलम् । द्विच्छिदं दशने व्याधेरकेच्छिदं तु कर्मणि ॥ १७ ॥ मध्येऽस्य त्र्यङ्गुलं छिदमङ्गुण्डोदरविस्तृतम् । अर्धाङ्गुलोन्च्छितोद्भूतकर्णिकं च तद्वर्धतः ॥

अर्शोयन्त्र-परिचय—अर्शों को देखने तथा उनमें औषध-प्रयोग करने की दृष्टि से यह यन्त्र दो प्रकार का होता है। इसका आकार गाय के स्तन के सदृश होता है, इसकी लम्बाई चार अंगुल, मोटाई पुरुषों के लिए पाँच अंगुल और स्त्रियों के लिए छः अंगुल होती है। जो यन्त्र अर्शों ( मस्यों ) को देखने के लिए प्रयुक्त होता है उसमें लम्बे आकार के दो छिद्र बनाये जाते हैं। जिस यन्त्र द्वारा मस्यों पर क्षार आदि औषध-द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है, उसमें एक छिद्र होता है। ये छिद्र यन्त्र के पार्श्व ( अगल-बगल ) में तीन अंगुल लम्बे अँगुठा के बराबर चौड़े होते हैं। इन यन्त्रों के मुखद्वार में आधा अंगुल ऊँची बाहर की ओर को मुड़ी हुई कर्णिका होती ॥ १६-१८ ॥

वक्तव्य—अर्शों ( मस्यों ) को देखने के लिए दो छिद्र किन्तु औषध-प्रयोग के लिए एक छिद्र वाला यन्त्र होता है। इसकी उपादेयता बतलाते हुए भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है—'एक छिद्र ( द्वार ) होने से शस्त्र, क्षार तथा अधिक्रम दूसरे स्थान पर न हो जाय, इसका भय नहीं रहता'। देखें—सु. जि. ६।११।

शम्यायं तादृगच्छिदं यन्त्रमर्शःप्रपीडनम् ।

शमोयन्त्र-परिचय—अर्शोयन्त्र की आकृति के सदृश ही एक शमोयन्त्र होता है, इसमें छेद नहीं होता। इसका प्रयोग अर्शों को प्रपीडन ( दबाना, मसलना ) के लिए किया जाता है।

सर्वथाऽपनयेदोष्ठं छिद्रादूर्ध्वं भगन्दरे ॥ १९ ॥

भगन्दरयन्त्र—इस यन्त्र का प्रयोग भगन्दर में क्षार या क्षारसूत्र आदि का प्रयोग करने के लिए किया जाता है। इसमें अर्शोयन्त्र की भाँति छिद्र तो होता है किन्तु ओष्ठ ( कर्णिका ) नहीं होता ॥ १९ ॥

प्राणार्बुदार्शसामेकच्छिद्रा नाड्यङ्गुलद्वया । प्रवेशिनीपरीणाहा स्याद्भगन्दरयन्त्रवत् ॥ २० ॥

प्राणयन्त्र-परिचय—प्राणयन्त्र के पार्श्व में एक छिद्र होता है, इस यन्त्र की नाडी ( नाली ) दो अंगुल लम्बी और इसकी मोटाई प्रवेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के बराबर होती है। इसका आकार भगन्दर यन्त्र के सदृश होता है, अतएव इसमें भी कर्णिका नहीं होती है। इसका प्रयोग नासिकाछिद्र के भीतर पैदा हुए अर्बुद तथा अर्श पर क्षार-प्रयोग के लिए होता है ॥ २० ॥

अङ्गुलित्राणकं दातं वार्शं वा चतुरङ्गुलम् । द्विच्छिदं गोस्तनाकारं तद्वत्तविवृतो मुखम् ॥ २१ ॥

अंगुलित्राणक यन्त्र—इस यन्त्र का निर्माण हाथीदाँत से अथवा सुदृढ़ शीशम आदि लकड़ी से कराया जाता है। इसकी लम्बाई चार अंगुल तथा इसके दोनों ओर छिद्र बनवाया जाता है। इसकी आकृति गाय

२७८

अष्टाङ्गहृदये

के स्तन के जैसी होती है। इसका उपयोग मुख को खोलने के लिए होता है। इसे अंगुलिब्राणक इसलिए कहा जाता है कि दूसरे रोगी के मुख के खोलने पर उसके दांतों से चिकित्सक की अंगुलियों की रक्षा हो जाती है ॥ २१ ॥

योनिब्रणेश्वरं मध्ये सुधिरं षोडशाङ्गुलम्। मुद्राबद्धं चतुर्भिस्तमभोजमुकूलानम् ॥ २२ ॥

चतुःशलाकमाक्रान्तं मूले तद्विकसेन्मुखे।

योनिब्रणेश्वरं यन्त्र—योनि (भग तथा गर्भाशय) के भीतर उत्पन्न हुए ब्रण आदि को देखने के लिए इस यन्त्र का प्रयोग होता है। यन्त्र-परिचय—यह बीज में खाली (खोखला) होता है। इसकी लम्बाई सोलह अंगुल होती है। यह चार भित्तियों (पत्तियों या पाटियों) से बना हुआ बाहर से मुद्रा (कँगनी) द्वारा बँधा हुआ, मुकुलित कमल के सदृश मुख वाला तथा भित्तियों के मूल भाग में चार शलाकाओं से घिरा हुआ होता है। इन शलाकाओं पर दबाव पड़ने पर उसका मुखभाग खुल जाता है, जिसके कारण योनि का मुख खुलकर उसके भीतरी अवयव स्पष्ट देखे जा सकते हैं ॥ २२ ॥

यन्त्रे नाडीब्रणाभ्यङ्गशालनाय षडङ्गुले ॥ २३ ॥

बस्तियन्त्राकृती मूले मुखेऽङ्गुष्ठकलायखे। अग्रतोऽकर्णिके मूले निबद्धमुदुचर्मणी ॥ २४ ॥

नाडीब्रण के यन्त्र—नाडीब्रण का अभ्यञ्जन (नाडीब्रण के भीतर स्नेह (घृत, तैल, वसा, मज्जा) पहुँचाने) करने के लिए तथा नाडीब्रण को घोने के लिए प्रयुक्त किये जाने वाले ये दो यन्त्र हैं। इनकी लम्बाई छः अंगुल होती है। ये यन्त्र आकार में बस्तियन्त्र के सदृश होते हैं। इनके मूल में अँगूठा के बराबर और मुख (अगले भाग) में मटर के दाने के बराबर छेद होना चाहिए। इसके मुख की ओर कर्णिका नहीं होती किन्तु मूलभाग में दो कर्णिकाएँ होती हैं और उन पर कोमल चमड़े की बस्ति बाँधी जाती है। इसे व्रणबस्ति भी कहते हैं ॥ २३-२४ ॥

द्विद्वारा नलिका पिच्छनलिका बोदकोदरे।

नाडीयन्त्र—यह नाडीयन्त्र पिच्छनलिका अर्थात् मोर या गीध के पंख की नली के खोखले भाग से बनाया जाता है। इसके दोनों ओर छेद होते हैं। इसका प्रयोग जलोदर के जल को निकालने के लिए किया जाता है। देखें—अ.हृ.चि. १५।१४।

धूमबस्त्यादियन्त्राणि निर्दिष्टानि यथायथम् ॥ २५ ॥

अन्य यन्त्र—धूमयन्त्र, बस्तियन्त्र आदि अन्य अनेक यन्त्रों का वर्णन यथास्थान कर दिया गया है ॥ २५ ॥

वक्तव्य—बस्तियन्त्र का वर्णन अ.हृ.सू.अ. १९ में, प्रधाननस्य यन्त्र का अ. २० में, धूमयन्त्र का अ. २१ में और आश्वोतन के लिए नाडीयन्त्र का अ. २३ में वर्णन क्रमशः किया गया है।

व्यङ्गुलास्यं भवेच्छङ्गं चूषणेऽष्टादशाङ्गुलम्। अग्रे सिद्धार्थकच्छिद्रं सुनद्धं चूचुकाकृति ॥ २६ ॥

शृंगनाडीयन्त्र—शृंगनाडी (सिंगी) यन्त्र का मुखभाग तीन अंगुल चौड़ा और इसकी लम्बाई अठारह अंगुल होती है। इसके अगले भाग में सरसों के बीज के आने-जाने लायक छेद होता है। यह भाग स्वी के स्तन के चूचुक के सदृश होता है। यह यन्त्र भलीभाँति बँधा हुआ होता है, जिसमें कहीं से हवा न निकल सके। इसका प्रयोग दूषित रक्त तथा वायु को चूसने के लिए किया जाता है ॥ २६ ॥

वक्तव्य—प्राचीन काल में सिंगी का प्रयोग करने वाले 'जर्राह' लोग इधर-उधर घूमा करते थे और उनके निश्चित स्थान भी होते थे। वे सिंगी लगाने में कुशल होते थे। इस सिंगीयन्त्र के दोनों ओर छिद्र होते हैं। चौड़े छिद्र को वेदनास्थान पर लगाकर एक हाथ से उस यन्त्र को दबाकर मुख द्वारा जोर से वहाँ की हवा खींच ली जाती है और उस मुख वाले छिद्र को बन्द कर दिया जाता है। थोड़ी देर में वहाँ की हवा उस यन्त्र में भर जाती है तब उस यन्त्र को खींचकर निकाल लिया जाता है, इससे उस स्थान की पीड़ा शांत हो जाती है। इसे कच्ची सिंगी कहते हैं।

यन्त्रविधिध्यायः २५ ]

सूत्रस्थानम्

२७९

पक्की सिंगी से दूषित रक्त को निकाला जाता है। पीड़ित स्थान पर उत्तरा से पच्छ ल्याकर (छोलकर) उसके ऊपर सिंगी रखकर उक्त प्रकार से सिंगी का चौड़ा भाग रखकर दूसरी ओर मुख से चूसें। इस विधि से उस स्थान का दूषित रक्त निकल जाता है, फलतः वेदना शान्त हो जाती है। इस विषय पर सुश्रुत के विचार—‘गाय के साँग से निर्मित सिंगी उष्णवीर्य, मधुर, स्निग्ध गुणवाली होती है। अतः इससे वातदूषित रक्त निकाला जाता है। जाँक लगाकर पित्तदूषित रक्त निकलवाना चाहिए। अलाबु (तुम्बी) द्वारा कफदूषित रक्त को निकलवाना चाहिए। देखें—सु.सू. १३।५-७। इसी का समर्थन चरक ने भी किया है। देखें—च.वि. २।१६९।

स्यादद्वादशाङ्गुलोऽलाबुर्नाहे त्वष्टादशाङ्गुलः।

चतुस्यङ्गुलवृत्तास्यो दीप्तोऽन्तः श्लेष्मरक्तहृत॥ २७॥

तुम्बीयन्त्र-परिचय—अलाबु (तुम्बी) १२ अंगुल लम्बी, १८ अंगुल मोटी तथा ३ या ४ अंगुल चौड़े मुख वाली होनी चाहिए। उसके भीतर दीपक जलाकर उसके गरम हो जाने पर प्रयोग करने से कफदूषित रक्तविकार समाप्त हो जाते हैं॥ २७॥

बक्तव्य—सुश्रुतसम्मत उक्त विचार को महर्षि वाग्भट ने प्रस्तुत किया है। देखें—‘सान्तर्दीप्याऽलाब्वा’ (सु.सू. १३।८) इस अलाबु में छिद्र नहीं किया जाता। प्रयोग-विधि—जहाँ तुम्बी का प्रयोग करना हो वहाँ गौली मिट्टी या सने हुए आटा का दीपक बनाकर उसमें कपूर या घी की बत्ती जलाकर रख देते हैं। उस बत्ती के ऊपर उस छेदरहित तुम्बी को रखकर दबा दें, तत्काल दीपक बुझ जायेगा और तुम्बी में खिंचाव प्रतीत होने लगेगा। घड़ी-दो-घड़ी के बाद तुम्बी को निकाल कर उस स्थान को मसल देना चाहिए, स्थानीय वातजनित वेदना शान्त हो जाती है।

तद्वद्वती हिता गुल्मविलयोन्नमने च सा।

घटीयन्त्र-परिचय—इसी के आकार वाला घटीयन्त्र भी होता है। इससे गुल्म का विलयन तथा उन्नमन भी किया जाता है।

बक्तव्य—श्रीहेमाद्रि ने ‘चकारात् श्लेष्मरक्तावच्छृपणे च’ कहा है। यह घटीयन्त्र तुम्बीयन्त्र के समान छिद्ररहित होता है, तब बिना छिद्र के आच्छृपण क्रिया नहीं हो सकती। पाठक इस पर विचार करें।

शलाकाख्यानि यन्त्राणि नानाकर्मकृतीनि च॥ २८॥

यथायोगप्रमाणानि—

शलाकायन्त्र—शलाका नामक यन्त्रों का प्रयोग अनेक चिकित्सा-कर्मों के रूप में होता है। इनके आकार अनेक प्रकार के होते हैं। इनका जिस कर्म के लिए उपयोग होता है तदनुसार इनकी लम्बाई-मोटाई होती है॥ २८॥

—तेषामेषणकर्मणि।

उभे गण्डूपदमुखे—

एषणी शलाका—इनमें दो एषणी नामक शलाकायन्त्र होते हैं। इनसे व्रणवास्तु का अन्वेषण किया जाता है। इन दोनों यन्त्रों का मुख गण्डूपद (केंचुर) के सदृश होता है।

—स्रोतोभ्यः शल्यहारिणी॥ २९॥

मसूरदलवक्त्रे द्वे स्यातामष्टनवाङ्गुले।

स्रोतःशल्यहारिणी शलाका—स्रोतों से शल्य का आहरण करने वाले दो शलाकायन्त्र होते हैं। इनके मुख (अग्रभाग) मसूर की दाल के समान गोल तथा चपटे होते हैं। इन दोनों की लम्बाई ८ तथा ९ अंगुल होती है॥ २९॥

२८०

अष्टाङ्गहृदये

शङ्खवः षट्—

छः शंकुयन्त्र—ये शंकु नामक शलाकार्पे संख्या में छः होती हैं।

—उभौ तेषां षोडशद्रादशाङ्गुली ॥ ३० ॥

व्यूहनेऽहिफणावक्त्रौ—

व्यूहन शंकुयन्त्र—उनमें से एक १६ अंगुल लम्बा और दूसरा १२ अंगुल लम्बा होता है। इन दोनों यन्त्रों के मुख साँप के फण के सदृश टेढ़े होते हैं। इनका उपयोग व्यूहन-कर्म (इधर-उधर फैले हुए मांस आदि को यथास्थान रखने) के लिए होता है ॥ ३० ॥

—द्वौ दशद्रादशाङ्गुली ।

चालने शरपुङ्गुगस्यौ—

चालन शंकुयन्त्र—उनमें से एक १० अंगुल लम्बा और दूसरा १२ अंगुल लम्बा होता है। इन दोनों यन्त्रों के मुख शरपुंख (बाण के फर) के सदृश होते हैं। इनका उपयोग चालन-कर्म (शल्य को हिलाने-डुलाने) में किया जाता है।

—आहार्यं बडिशकृती ॥ ३१ ॥

आहार्य शंकुयन्त्र—दो शंकुयन्त्र बडिश (मछली पकड़ने के कटि) जैसे होते हैं। इनका उपयोग शल्य का आहरण करने (खींचने) के लिए किया जाता है ॥ ३१ ॥

नतोऽग्रे शङ्कुना तुल्यो गर्भशङ्कुरिति स्मृतः । अष्टाङ्गुलायतस्तेन मूद्रगर्भ हरेत् स्त्रियाः ॥

गर्भशंकुयन्त्र—एक गर्भशंकुयन्त्र होता है। जिसका अगला भाग शंकु (काँटा) के सदृश झुका रहता है। यह ८ अंगुल लम्बा होता है। उससे नारी का मूद्रगर्भ (जो सही मार्ग की ओर प्रवृत्त न हुआ हो, उसे) निकाला जाता है ॥ ३२ ॥

वक्तव्य—देखें—अ.हृ.शा. २।२९-३०। यहाँ गर्भशंकुयन्त्र की प्रयोग-विधि दिखलायी गयी है।

अश्मर्याहरणं

सर्पफणावद्वक्रमग्रतः ।

अश्मरीहरण यन्त्र—अश्मरी (पथरी) को निकालने के लिए जिस यन्त्र का प्रयोग किया जाता है, उसका अगला भाग साँप के फण के सदृश आगे की ओर झुका अतएव टेढ़ा होता है।

शरपुङ्गुमुखं

दन्तपातनं

चतुरङ्गुलम् ॥ ३३ ॥

दन्तपातनयन्त्र—शरपुंख (बाण के फर) के सदृश मुखभाग वाला तथा ४ अंगुल लम्बा एक यन्त्र होता है। इसका प्रयोग दाँतों को निकालने (उखाड़ने) के लिए किया जाता है ॥ ३३ ॥

कार्पासविहितोष्णीषाः शलाकाः षट् प्रमाजने ।

प्रमाजनी शलाकायन्त्र—व्रण आदि को साफ करने के लिए जिन शलाकायन्त्रों का प्रयोग किया जाता है, उनकी संख्या ६ है। प्रमाजन करते समय इनके अगले भाग पर रई लपेट दी जाती है, जिसे वाग्भट ने 'विहितोष्णीष' कहा है। 'उष्णीष' का अर्थ है—पगड़ी।

पायावासन्नदूरयं

हे

दशद्रादशङ्गुले ॥ ३४ ॥

पायुयन्त्र—पायु (गुद) यन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. जो यन्त्र बाहरी गुद के समीप के व्रण को साफ करने के लिए होता है, उसकी लम्बाई १० अंगुल होती है। २. जो यन्त्र दूर के (भीतरी) गुदव्रण को साफ करने के लिए प्रयुक्त होता है, उसकी लम्बाई १२ अंगुल होती है ॥ ३४ ॥

हे षट्सप्ताङ्गुले घ्राणे, हे कर्णेऽष्टनवाङ्गुले ।

यन्त्रविधिग्रन्थायः २५ ]

सूत्रस्थानम्

२८१

घ्राण एवं कर्ण यन्त्र—घ्राणयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. समीप के लिए ६ अंगुल लम्बा तथा २. दूर के लिए ७ अंगुल लम्बा। कर्णयन्त्र दो प्रकार के होते हैं—१. समीप के लिए ८ अंगुल लम्बा तथा २. दूर के लिए ९ अंगुल लम्बा।

कर्णशोधनमश्वत्पत्रप्रान्तं सुवाननम् ॥ ३५ ॥

कर्णशोधन यन्त्र—इसका आकार पीपल के पत्र के अग्रभाग की भाँति नुकीला किन्तु उसका मुख मुव ( चमची ) के सदृश कुछ गहरा होना चाहिए। इससे कान की मैल निकाली जाती है ॥ ३५ ॥

शलाकाजाम्बवौष्टानां क्षारैऽग्नीं च पुष्कं त्रयम्।

युज्यतात् स्थूलाणुदीर्घाणां—

विविध शलाकायन्त्र—क्षार तथा अग्नि कर्मों के लिए तीन शलाकायन्त्र तथा तीन जाम्बवौष्ट ( जामुन के फल के सदृश मुख वाले ) यन्त्र होते हैं। ये यन्त्र कोई मोटे, कोई पतले तथा कोई दीर्घ ( लम्बे ) आकार के होते हैं। इस प्रकार इन शलाकायन्त्रों की संख्या १२ होती है।

—शलाकामन्त्रवर्धनी ॥ ३६ ॥

मध्योर्ध्ववृत्तदण्डां च मूले चार्धैस्तुसन्निभाम्।

उक्त शलाकायन्त्रों में से एक का प्रयोग अन्तर्वृद्धिरोग में प्रयुक्त होता है। उसका स्वरूप इस प्रकार होता है—मध्यभाग में ऊपर की ओर ढण्डे के आकार वाला और मूल भाग में अर्धचन्द्राकार होता है ॥ ३६ ॥

कोलास्थिदलतुल्यास्या नासाशोर्बुददाहकृत् ॥ ३७ ॥

एक शलाकायन्त्र का प्रयोग नासिका के भीतर उत्पन्न अर्श तथा अबुद पर दाहकर्म करने के लिए होता है। इस शलाका का मुखभाग बेर की गुठली के आधे भाग के सदृश होता है ॥ ३७ ॥

अष्टाङ्गुला निम्नमुखास्तिष्ठः क्षारीषधक्रमे। कनीनीमध्यमानामीनखमानसमेर्मुखैः ॥ ३८ ॥

तीन अन्य शलाकायन्त्रों का प्रयोग क्षारीषध का प्रयोग करने के लिए होता है। इनकी लम्बाई आठ अंगुल होती है। इनके मुखभाग में मुव ( चमच ) के जैसा गढ़ा होता है। इनके मुख कनीनिका ( कनिष्ठिका ), मध्यमा ( बीच की अँगुली ) और अनामिका ( अँगूठे से चौथी ) अँगुलियों के नखों के सदृश होते हैं ॥ ३८ ॥

स्वं स्वमुक्तानि यन्त्राणि मेदृशुद्धचञ्चनादिषु।

मूत्रमार्ग की शुद्धि के लिए तथा अंजन लगाने के लिए अनेक शलाकायन्त्रों का वर्णन यथास्थान इस ग्रन्थ में किया गया है।

वक्तव्य—मूत्रमार्ग की शुद्धि के लिए देखें—अ.हृ.सू. १९।७०,७३-८२। अंजन-प्रयोग के लिए देखें—अ.हृ.उ. १० सम्पूर्ण। शलाकायन्त्र की सहायता से जिन रोगों की चिकित्सा की जाती है, वे सभी शलाकयन्त्र के अन्तर्गत परिगणित किये जाते हैं।

अनुयन्त्राण्ययस्कात्तरज्जुवस्त्राश्रमभुद्राः ॥ ३९ ॥

वधान्त्रजिह्वाबालाश्च शाखानखमुखद्विजाः। कालः पाकः करः पादो भयं हर्षश्च, तत्क्रियाः ॥

उपायविविधविभजेदालोच्य निपुणं धिया।

अनुयन्त्रों का वर्णन—अनु(णु)यन्त्रों ( उपयन्त्रों ) का परिगणन—अयस्कात्त ( चुम्बक लौह ), रस्सी ( डोरा या धागा ), वस्त्र, पत्थर, मुद्रगर, वघ्र ( लकड़ी या बाँस की पट्टियाँ ), आँत की रस्सी, जीभ ( यह दंतों के बीच में फँसे हुए अन्नकणों या बाल आदि को निकालने में सहायता करती है ), बाल ( लम्बे बाल स्थियों अथवा घोड़े की पूँछ आदि के ), वृक्षशाखा, नख, मुख ( ओष्ठ-आचूषणार्थ ), दाँत, कालपाक ( पकने पर पूयशल्य स्वयं निकल जाता है, यही इसके निकलने का काल होता है ), हाथ, पैर, भय

२८९

अष्टाङ्गहृदये

(इससे क्रोधशत्य निकल जाता है) और हर्ष (इससे शोकशत्य निकल जाता है)—ये १९ अनुयन्त्र हैं। शल्यों को निकालने के उपायों को जानने वाले चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह समय पर अपनी बुद्धि से विचार करके भी अनुयन्त्रों का विभाजन करे; यही उनका उपयोग है॥ ३९-४० ॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने इन्हें उपयन्त्र कहा है। देखें—सू. सू. ८।१५।

निर्घातितोन्मथनपूरणमार्गशुद्धिसंयूहनाहरणबन्धनपीडनानि ।

आचूषणोन्नमननामनचालभङ्गव्यावर्तनर्जुकरणानि च यन्त्रकर्म॥ ४१ ॥

यन्त्रों के विविध कर्म—निर्घातन, उन्मथन, पूरण (बस्ति में द्रव का), मार्गशुद्धि, संयूहन (इकट्ठा करना), आहरण, बन्धन, पीडन (दबाना), आचूषण, उन्मन (उठाना), नामन (झुकाना), चालन, भंग (तोड़ना), व्यावर्तन (घुमाना) तथा ऋजुकरण (सीधा करना)—ये सभी कर्म यन्त्रसाध्य होते हैं॥ ४१ ॥

वक्तव्य—वृद्धवाग्भट ने इनके अतिरिक्त ९ यन्त्रकर्मों का परिगणन इस प्रकार किया है—१. विवरण, २. एषण, ३. प्रमार्जन, ४. प्रक्षालन, ५. प्रघमन, ६. विकर्षण, ७. ब्यंजन (व्यक्त करना), ८. अज्जन और ९. दारण—इस प्रकार ये कुल मिलाकर १५ + ९ = २४ यन्त्र हो जाते हैं। देखें—अ.सं.सू. ३४।२०। सुश्रुत ने १२ यन्त्रदोषों का भी उल्लेख किया है। इस प्रसंग में इनका भी अवलोकन कर लेना चाहिए। देखें—सू. सू. ८।१९। वृद्धवाग्भट ने ८ यन्त्रदोषों का वर्णन किया है। देखें—अ.सं.सू. ३४।३३।

विवर्तते साध्वबगाहते च ग्राह्यं गृहीत्वोदरते च यस्मात्।

यन्त्रेष््वतः कङ्कमुखं प्रधानं स्थानेषु सर्वेष्वधिकारि यच्च॥ ४२ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने यन्त्रविधिर्नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥


कंकमुखयन्त्र—कंकमुख नामक यन्त्र उक्त सभी यन्त्रों में प्रधान माना जाता है, क्योंकि यह आवश्यकतानुसार घुमाया जा सकता है, झोलों में इसका सरलता से प्रवेश हो जाता है, ग्रहण करने योग्य शल्य को पकड़कर यह निकाल देता है और सभी अवयवों में प्रविष्ट होकर साधिकार अपना कर्म करता है॥ ४२ ॥

वक्तव्य—उक्त पद्य अविकल रूप से अष्टांगसंग्रह (सू. ३४।२१) में भी सुलभ है। सभी यन्त्र अपने-अपने कार्यक्षेत्र में प्रशंसा पाते ही हैं। कंकमुख यन्त्र पर वाग्भटद्वय की विशेष अनुकम्पा है, अतएव उसकी प्रशंसा यहाँ की गयी है। इस अध्याय में उक्त यन्त्रों के कर्मों का संक्षेप में वर्णन कर दिया है। वास्तव में जहाँ-जहाँ इनके प्रयोगस्थल हैं, वहाँ-वहाँ इनके प्रयोगों का विस्तारपूर्वक वर्णन है।

इस प्रकार वैद्यरत्न परिणित तारावत् त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित

निर्मला हिन्दी व्याख्या विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान में

यन्त्रविधि-वर्णन नामक पचीसवें अध्याय समाप्त॥ २५ ॥


षड्विंशोऽध्यायः

अथातः शस्त्रविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से शस्त्रविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—इसके पहले अध्याय में यन्त्रों का वर्णन किया जा चुका है, तदनन्तर अब इस अध्याय में शस्त्रों का भेद-उपभेद सहित वर्णन किया जायेगा।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सू.सू. ८ तथा १३ में और अ.सं.सू. ३४ एवं ३५ में देखें। चरकसंहिता में शस्त्रों का वर्णन नहीं किया गया है, तथापि च.वि. २५ में षड्विधि शस्त्रकर्म का उल्लेख श्लोक ५५ से ६० तक किया गया है।

षड्विंशतिः सुकर्मा रैधटितानि यथाविधि। शस्त्राणि रोमबाहीनि ब्राहुत्येनाङ्गुलानि षट् ॥ १ ॥

सुरूपाणि सुधाराणि सुग्रहाणि च कारयेत्। अकरालानि सुधमातसुतीष्णावर्तितेऽयसि ॥ २ ॥

समाहितमुखाग्राणि नीलाम्भोजच्छवीनि च। नामानुगतरूपाणि सदा सन्निहितानि च ॥ ३ ॥

स्वोन्मानाद्यचतुर्थशफलात्येकैकशोऽपि च। प्रायो द्विग्राणि, युञ्जीत तानि स्थानविशेषतः ॥ ४ ॥

( मण्डलाग्रं वृद्धिपत्रमुत्पलाध्यर्द्धधारके। सर्पैषण्यो वेतसाख्यं शरायस्यत्रिकूर्चके ॥ १ ॥

कुशास्यं साटवदनमन्तर्वक्रार्धचन्द्रके ( कम् )। ब्रीहिमुखं कुठारी च शलाकाङ्गुलिशस्त्रके ॥ २ ॥

बडिशं करपत्राख्यं कर्तरी नखशस्त्रकम्। दन्तलेखनकं सूच्यः कूर्चो नाम खजाह्वयम् ॥ ३ ॥

आरा चतुर्विधाकारा तथा स्यात्कर्णवेधनी ( नम् ) ।।

शस्त्रों का वर्णन—सामान्यतः शस्त्रों की संख्या २६ है, जिनका आगे परिगणन किया गया है। इन शस्त्रों का निर्माण कुशल कर्मरों ( कारीगरों ) द्वारा विधिपूर्वक करवाना चाहिए। ये शस्त्र इतने तेज धार वाले हैं जिससे वे रोमों को भी काट सकें, इनकी लम्बाई छः अंगुल होती चाहिए, शस्त्र देखने में सुन्दर ( सुझील ), सुन्दर धार वाले हैं और इनकी मूठ भी अच्छी बनी हो, जिससे वे अच्छी तरह पकड़े जा सकें। इनकी आकृति डरावनी न हो, जिस लोहे से बनाये जायें वह लोहा आग में खूब घमाया ( तपाया ) गया हो और तीक्ष्णायस ( फौलाद ) से बनाये जायें। इन शस्त्रों के मुखाग्र ( फल ) मजबूत हों, इनका वर्ण नीलकमल की आकृति का हो। इन शस्त्रों के आकार आगे वर्णित शस्त्रों के नामों के अनुरूप हों, ये शस्त्र सदा ( चिकित्सकाल में ) चिकित्सक के पास हों। आधे में उसका फल हो और आधे में उसकी मूठ हो। यह दृष्टिकोण प्रत्येक शस्त्र के निर्माण में होना चाहिए। प्रायः स्थान-विशेष के प्रयोग में एक ही प्रकार के दो-तीन शस्त्रों की आवश्यकता पड़ सकती है ॥ १-४ ॥

( छब्बीस शस्त्रों के नाम— १. मण्डलाग्र, २. वृद्धिपत्र, ३. उत्पल, ४. अध्यर्धधारक, ५. सर्प, ६. एषणी, ७. वेतस या वेतसाग्र, ८. शरायस्य, ९. त्रिकूर्चक, १०. कुशास्य, ११. साटवदन, १२. अन्तर्वक्रार्धचन्द्रक, १३. ब्रीहिमुख, १४. कुठारी, १५. शलाका, १६. अंगुलिशस्त्र, १७. बडिश, १८. करपत्र, १९. कर्तरी, २०. नखशस्त्र, २१. दन्तलेखनक, २२. मुर्ध्या, २३. कूर्च, २४. खज ( मथानी ), २५. आरा ( ये चार प्रकार के होते हैं ) तथा २६. कर्णवेधन ॥ १-३ ॥ )

२८४

अष्टाङ्गहृदये

बक्तव्य—कुछ संस्करणों में आरम्भ से ४ श्लोकों के आगे कहे गये ३ श्लोक नहीं मिलते। प्रसंगोचित होने के कारण यहाँ इनका समावेश क्षेपक के रूप में कर लिया गया है। सुश्रुत ने इन शस्त्रों की संख्या २० दी है। देखें—सू.सू. ८।३। सुश्रुतोक्त शस्त्रों के नाम इस प्रकार हैं—१. मण्डलाग्र (Circular knife या Roundhead knife), २. करपत्र (Saw), ३. वृद्धिपत्र (Scalpel), ४. प्रयताग्र (Abscess knife), ५. नखशस्त्र (Nail pairs), ६. मुद्रिका (Finger-knife), ७. उत्पलपत्र (Lancel), ८. अर्धधार (Single edged knife), ९. सूची (Needle), १०. कुशपत्र (Bistoury), ११. आटीमुख (Tardus ginginiamos), १२. शरीरीमुख (Pair of scissors), १३. अन्तर्मुख (Curved bistoury), १४. त्रिकूर्चक (Brush), १५. कुठारिका (Ave shaped), १६. त्रीहिमुख (Trocar), १७. आरा (Owl like knife), १८. बडिश (Hooks), १९. दन्तशंकु (Tooth pick) तथा २०. एषणी (Sharp proves)।

वाग्भट ने सुश्रुत से अधिक जिन शस्त्रों का वर्णन किया है, वे इस प्रकार हैं—सर्पवक्त्र, शलाका, कर्तरी, सूचीकूर्च, खज एवं कर्णव्यघन। विशेष अष्टाङ्गसंग्रह-सू.अ. ३४ में देखें।

मण्डलाग्रं फले तेषां तर्जन्यन्तर्नखाकृति। लेखने छेदने योज्यं पोथकीशुण्डिकादिषु ॥५॥

मण्डलाग्र शस्त्र —ऊपर कहे गये शस्त्रों में से सर्वप्रथम यहाँ मण्डलाग्र शस्त्र का वर्णन किया जा रहा है। इसके फल (अग्रभाग) का स्वरूप तर्जनी (अँगूठा के बगल वाली) अँगुली के नख के भीतरी भाग के सदृश होता है। इसका उपयोग पोथकी (रोहा) तथा गल्फशुण्डि आदि रोगों के लेखन (छीलना, खुरचना) तथा छेदन (काटना) में होता है ॥५॥

वृद्धिपत्रं झुराकारं छेदभेदनपाटने। ऋज्वग्रमुन्नते शोफे गम्भीरे च तदन्त्यथा ॥६॥ तत्राग्नं पुच्छतो दीर्घहृस्वक्त्रं यथाश्रयम्।

वृद्धिपत्र शस्त्र —वृद्धिपत्र शस्त्र छुरा (उस्तरा) के आकार का होता है, इसका अगला भाग ऋजु (सीधा) होता है। इसका प्रयोग ऊँचे (उभार युक्त) ब्रणशोथ को छेदने, भेदने तथा पाटन (चौरने) कर्म के लिए होता है। इससे विपरीत गम्भीर ब्रणशोथ के छेदने आदि कर्मों के लिए प्रयुक्त होता है। उस वृद्धिपत्र शस्त्र का आकार पीछे की ओर को झुका हुआ तथा ब्रणशोथ की स्थिति के अनुसार लम्बे अथवा छोटे मुखवाला होता है ॥६॥

उत्पलाध्धर्धधाराख्ये भेदने तथा ॥७॥

उत्पल एवं अध्धर्धधारक शस्त्र —उत्पलपत्रक एवं अध्धर्धधारक ये दो शस्त्र भी भेदन, छेदन तथा पाटन कर्म में प्रयुक्त होते हैं ॥७॥

सर्पास्यं घ्राणकर्णार्शश्चछेदनेऽर्धङ्गुलं फले।

सर्पवक्त्र शस्त्र —सर्पास्य (सर्पमुख) नामक शस्त्र के फलभाग की लम्बाई आधा अंगुल होती है। इसका प्रयोग नासिकाछिद्रों तथा कानों के भीतर उत्पन्न अशार्कुरों को काटने के लिए होता है।

गतेरन्वेषणे श्लक्ष्णा गण्डूपदमुखेषणी ॥८॥

१. एषणी शस्त्र —एषणी नामक शस्त्र नाडीब्रण (नामूर) का घाव कहाँ तक हुआ है, इसको ढूँढने के लिए होता है। इसका मुख केंचुए के मुख जैसा होता है, वह एषणी स्पर्श में कोमल होती है ॥८॥

भेदनार्थेऽपरा सूचीमुखा मूलनिविष्ट्वा।

२. एषणी शस्त्र —एषणी नामक दूसरा शस्त्र भेदन कर्म के लिए प्रयुक्त होता है। इसका मुख सूर्य के जैसा तीखा होता है। सूर्य की भाँति उसकी जड़ में भी छिद्र होता है। इसके द्वारा क्षारभावित सूत्र का भगन्दर में प्रवेश किया जाता है।

शस्त्रविधिग्रन्थः २६ ]

सूत्रस्थानम्

२८५

वक्तव्य—यहाँ दो एषणी शस्त्रों का वर्णन किया गया है। इसमें प्रथम एषणी यन्त्र है और दूसरा एषणी शस्त्र है।

वेतसं व्यधने—

वेतस शस्त्र—वेतसपत्रक नामक शस्त्र वेधन (बींधना, टुकरे करना, प्रहार करना) कर्म में प्रयुक्त होता है।

—स्राव्ये शरायास्यत्रिकूर्चके ॥ ११ ॥

शरारिमुख एवं त्रिकूर्चक शस्त्र—शरारि नामक एक लम्बी चाँच वाला पक्षी होता है, उसी की चाँच के आकार का यह शस्त्र होता है तथा त्रिकूर्चक (पहले इस शस्त्र से टीके लगाये जाते थे, इसको गोदने की कूची भी कह सकते हैं।)—ये दोनों शस्त्र स्रावण कर्म में प्रयुक्त होते हैं ॥ ११ ॥

कुशाटावदने स्राव्ये द्रुचङ्गुलं स्यात्तयोः फलम्।

कुशपत्रक एवं आटामुख शस्त्र—कुशपत्रक तथा आटामुख या आटीमुख शस्त्रों का फलभाग दो अंगुल लम्बाई युक्त होता है। उक्त दोनों शस्त्रों का प्रयोग स्रावण कर्म में किया जाता है।

तद्वदन्तर्मुखं तस्य फलमध्यर्धमङ्गुलम् ॥ १० ॥

अर्धचन्द्राननं चैतत्—

अन्तर्मुख शस्त्र—अन्तर्मुख नामक शस्त्र का फल आधे चन्द्रमा के आकार का होता है और उसकी धार का मुख भीतर की ओर होता है। इस शस्त्र के मुख की लम्बाई डेढ़ अंगुल होती है ॥ १० ॥

—तथाऽध्यर्धाङ्गुलं फले।

ब्रीहिक्वन् प्रयोज्यं च तच्छिरोदरयोर्ध्वे ॥ ११ ॥

ब्रीहिमुख शस्त्र—ब्रीहिमुख नामक शस्त्र का फल (धार) डेढ़ अंगुल लम्बा होता है। इसका प्रयोग सिरावेध तथा जलोदर के वेधन में किया जाता है ॥ ११ ॥

वक्तव्य—सिरावेध की विधि देखें—ज.ह.सू. २७।२३ से ३४ तक। अं सं.सू. ३४।२८ में ब्रीहिमुख शस्त्र का अन्यत्र प्रयोग भी देखें।

पृथुः कुठारी गोदन्तसदृशार्धङ्गुलानना । तयोर्ध्वदण्ड्या विध्येदुपर्यस्त्वां स्थितां शिराम् ॥ १२ ॥

कुठारी शस्त्र—कुठारी नामक शस्त्र का आकार गाय के दाँत के समान आधा अंगुल चौड़ा होता है। इसके ऊपरी भाग में कुल्हाड़ी के जैसा बेंट लगा रहता है। इस प्रकार के कुठारी शस्त्र से अस्थि के ऊपर स्थित सिरा का वेध करना चाहिए ॥ १२ ॥

ताम्रौ शलाका द्विमुखी मुखे कुरुबकाकृतिः । लिङ्गनाशं तथा विध्येत्—

ताम्रशलाका शस्त्र—लिंगनाश को वेधने के लिए एक ताँबे की शलाका होती है। इसके दोनों ओर धार होनी चाहिए। इसके दोनों मुख कुरुबक (लाल कटसरेया) के फूल के सदृश होते हैं। इसके द्वारा कफज लिंगनाश (मोतियाबिन्द) का वेधन किया जाता है।

—कुर्यादङ्गुलिशस्त्रकम् ॥ १३ ॥

मुद्रिकानिर्गतमुखं फले त्वर्धाङ्गुलायतम् । योगतो वृद्धिपत्रेण मण्डलाग्रेण वा समम् ॥ १४ ॥

तत्प्रदेशस्थिग्राह्यप्रमाणार्पणमुद्रिकम् । सूत्रबद्धं गलघ्रोतोरोगच्छेदनभेदेन ॥ १५ ॥

अंगुली शस्त्र—अंगुलि नामक शस्त्र का आकार अँगूठी जैसा होता है। इसका मुख आगे की ओर निकला रहता है। इसका फल आधा अंगुल लम्बा होता है। आकार में यह वृद्धिपत्र अथवा मण्डलाग्र शस्त्र

२८६

अष्टाङ्गहृदये

के जैसा होता है। इसकी मुद्रिका प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के अगले पोर में पहनने योग्य होती है। इसमें धागा बांधकर चिकित्सक इससे गले के भीतरी स्रोत में उत्पन्न गलशुण्डी आदि का छेदन तथा भेदन कर्म करता है॥ १३-१५॥

वक्तव्य—अंगुलि शस्त्र को सुश्रुत एवं वृद्धवाग्भट ने 'मुद्रिकाशस्त्र' की संज्ञा दी है।

ग्रहणे शुण्डिकार्मादेर्बिधिं सुनताननम्॥

बधिश्च शस्त्र—बधिश्च शस्त्र का स्वरूप मछली पकड़ने के काँटा के सदृश, उसका अगला भाग कुछ मुड़ा या झुका हुआ होता है। इससे गलशुण्डी ( गले का एक विशेष रोग ), अर्म ( नेत्ररोग-विशेष ) तथा आदि शब्द से प्रतिजिह्निका रोग का ग्रहण अर्थात् छेदन कर्म किया जाता है।

छेदेऽस्त्रं करपत्रं तु खरधारं दशाङ्गुलम्॥ १६॥

विस्तारे द्रघङ्गुलं सूक्ष्मदन्तं सुत्स्वरुबधनम्॥

करपत्र शस्त्र—करपत्र नामक शस्त्र की धार खुरदरी होती है। इसकी लम्बाई १० अंगुल और चौड़ाई २ अंगुल होती है। इसके दाँत बहुत छोटे होते हैं। इसके मूलभाग में पकड़ने के लिए लकड़ी की मूठ बंधी रहती है। इससे हड्डियों का छेदन किया जाता है। इसे लोकभाषा में 'छोटी आरी' कहते हैं॥ १६॥

स्नायुसूत्रकचछेदे कर्तरी कर्तरीनिभा॥ १७॥

कर्तरी ( कैची ) शस्त्र—यह शस्त्र कैची के सदृश होता है। इससे स्नायुतन्तु तथा केश ( बाल ) काटे जाते हैं॥ १७॥

वक्रजुधारं द्विमुखं नखशस्त्रं नवाङ्गुलम्॥ सूक्ष्मशल्योद्वृत्तिच्छेदभेदप्रच्छानलेखने॥ १८॥

नखशस्त्र ( नहरनी )—इसके दोनों ओर मुख होता है। इसमें एक मुख ( धार ) सीधा और दूसरा मुख ( धार ) टेढ़ा होता है। इसकी लम्बाई ९ अंगुल होती है, इसका मध्य भाग गोल होता है। इसका उपयोग—इससे सूक्ष्म शल्य निकाला जाता है तथा छेदन, भेदन, पच्छ लगाना एवं छीलना आदि कर्म किये जाते हैं॥ १८॥

एकधारं चतुष्कोणं प्रबद्धाकृतिं चैकतः। दन्तलेखनकं तेन शोधयेद् दन्तशर्कराम्॥ १९॥

दन्तलेखनक शस्त्र—यह एक धार वाला तथा चार कोनों वाला होता है। इसके एक भाग में मूठ होती है। यह भाग कुछ बड़ा होता है। इसका उपयोग दाँतों में जमी हुई शर्करा को खुरच कर निकालना है॥ १९॥

वृत्ता गूढदृढाः पाशे तिस्रः सूच्योऽत्र सीवने।

सूची शस्त्र—सीवन कर्म ( सिलाई ) के लिए तीन प्रकार के सूचीशस्त्रों ( सुइयों ) का प्रयोग होता है। ये आकार में गोल, गुप्त अर्थात् धागा डालने वाला भाग अधिक चौड़ा नहीं होता तथा मजबूत पाशों ( छेदों ) ( जिनमें धागा पिरौया जाता है ) वाले होते हैं।

मांसलानां प्रदेशानां त्र्यग्ना त्र्यङ्गुलमायता॥ २०॥

मांसल ( अधिक मांस वाले ) स्थानों ( शरीर के अवयवों ) को सीने के लिए जिस सूचीशस्त्र की आवश्यकता होती है, वह तीन किनारों वाली और तीन अंगुल लम्बी होती है॥ २०॥

अल्पमांसास्थिसन्धिस्थव्रणानां द्रघङ्गुलमायता।

थोड़े मांस वाले स्थानों, अस्थियों वाले तथा सन्धियों पर उत्पन्न व्रणों ( घावों ) को सीने के लिए दो अंगुल लम्बा सूचीशस्त्र होना चाहिए।