अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 305, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः
अथातस्तर्पणपूटपाकविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से तर्पण एवं पूटपाक विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —तेईसवें अध्याय में नेत्ररोगों की शान्ति के लिए जिन आश्रोतन तथा अज्ञान विधियों का वर्णन किया था, उनसे प्रायः नेत्रों में दुर्बलता आ जाती है। अतएव उसके बाद इस अध्याय में नेत्रतर्पण आदि विधियों का वर्णन किया जा रहा है। तर्पण का अर्थ है—नेत्रों को द्रव औषधों के सेचन से तृप्त करना। इस कार्य में पूटपाक-विधि उपकारक होती है। गीले या सूखे औषध-द्रव्यों से विधिभेद से स्वरस निकाला जाता है और केवल सूखे द्रव्यों का पूटपाक-विधि से स्वरस निकाला जाता है। इसका ज्ञान महाकवि भवभूति को भी था। देखें—‘पूटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः’। इन दोनों विधियों से प्राप्त रस का सेचन आँखों में किया जाता है और इससे नेत्र तृप्त होते हैं।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —सू.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३३ में देखें। चरक ने इस शालाक्यतन्त्र को पराधिकार समझकर इसका वर्णन अपनी संहिता में नहीं किया है।
नयने ताभ्यति स्तब्धे शुष्के रूक्षेऽभिघातिते। वातपित्तातुरे जिह्वे शीर्णपक्ष्माविलेक्षणे ॥ १ ॥
कृच्छ्रोन्मोलिशिराहर्षशिरोत्पाततमोऽर्जुनैः । स्यन्दमन्यान्यतोवातवातपर्यायशुक्रकैः ॥ २ ॥
आतुरे शान्तरागाश्रुशूलसंरम्बद्वयिके । निवाते तर्पणं योज्यं शुद्धयोर्यूर्द्धकाययोः ॥ ३ ॥
काले साधारणे प्रातः सायं वोतानशायिनः ।
तर्पणविधि-वर्णन —जब आँखों के सामने अन्धेरा प्रतीत हो, जब आँखें स्तब्ध हों, सूखी हों, रूखी हों, उन पर किसी प्रकार का आघात लगा हो, नेत्र पर वात या पित्त दोष की विकृति हो, नेत्रगोलक टेढ़े हो गये हों (जिसे ऐंचा-ताना कहते हैं), पक्षम (बरैनियों) के बाल उखड़ गये हों, दृष्टि मलिन हो गयी हो, नेत्रों को खोलने में कष्ट होता हो; जब नेत्र सिराहर्ष, सिरोत्पात, तिमिररोग, अर्जुनरोग, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, अन्यतोवात, वातपर्यय अथवा शुक्ररोग से पीड़ित हों तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए। जब आँखों की लालिमा, आँसू बहना, शूल, संरम्ब (शोथ) तथा दृषिका (नेत्रमल) ये शान्त हो जायें तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए। नस्य से सिर का तथा वमन-विरचन आदि द्वारा शरीर का शोधन कराकर निवातस्थान में, समशीतोष्ण काल में प्रातःकाल अथवा सायंकाल में रोगी को चित लिटाकर तर्पण का प्रयोग करना चाहिए ॥ १-३ ॥
यवमाषमयीं पालीं नेत्रकोशाद्भिः समाम् ॥ ४ ॥
द्वयङ्गुलोच्चां दृढां कृत्वा यथास्वं सिद्धभावेत्। सर्पिनिर्मिलिते नेत्रे तप्ताम्बुप्रबिलायितम् ॥ ५ ॥
नक्तान्थवाततिमिरकृच्छ्रोबोधदिके वसाम्। आपक्षमाग्रात्—
तर्पण की दूसरी विधि —इस विधि में भी रोगी को चित लिटाकर उसके नेत्रकोश से बाहर जो या उड़द के आटे के समान आकार की एक पाली बनवाये, जो दो अंगुल ऊँची हो और दृढ़ हो, जो तर्पण