भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

तीक्ष्णाञ्जन या धूमपान—यदि नेत्रमण्डल में खुजली अथवा जड़ता का अनुभव हो रहा हो तो तीक्ष्ण अंजन का अथवा तीक्ष्ण धूमपान का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ३० ॥

तीक्ष्णाञ्जनाभितप्ते तु चूर्णं प्रत्यञ्जनं हिमम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थान आश्वोतनाञ्जनविधिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥


प्रत्यञ्जन का वर्णन—तीक्ष्ण अञ्जन का प्रयोग करने पर यदि आँख में जलन प्रतीत हो रही हो तो चूर्ण ( सुरमा ) का प्रत्यञ्जन करना चाहिए ॥ ३१ ॥

वक्तव्य—प्रतिदिन आँख में जो सुरमा लगाया जाता है, इसी को प्रत्यञ्जन कहते हैं। देखें—अ.ह.सू. २।५। नेत्र से खूब आँसू गिरे इसके लिए रसाञ्जन का प्रयोग एक-एक सप्ताह में करना चाहिए। सुश्रुत में भी देखें—सु.उ. १८।६८।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में आश्वोतनाञ्जनविधि नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २३ ॥


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