भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 297

गण्डूपादिविधिरध्यायः २२ ]

सूत्रस्थानम्

२६१

बस्ति के प्रयोगस्थल—सिर की शून्यता, मुखप्रदेश के लकवा, निद्रानाश, नासिका तथा मुख के सूखने पर, तिमिररोग, शिरोरोग एवं दारुण नामक रोग में इसका प्रयोग करें ॥ २६ ॥

वक्तव्य—श्रीहेमाद्रि ने 'दारुण' शब्द का अर्थ 'तीव्र' करके इसे 'शिरोरोग' का विशेषण माना है। पाठक ध्यान दें—वाग्भट ने इसका वर्णन शिरोरोगों में किया है। सुश्रुत ने निदानस्थान के १३वें अध्याय में और माधवकर ने शुद्धरोगनिदान श्लोक ३० में किया है। प्रसंगोचित होने से हमने यहाँ इसका स्पष्टीकरण उपस्थित किया है। इसे बोलचाल की भाषा में 'रूसी' (Dandrufe) कहते हैं।

विधितस्तस्य निषण्णस्य पीठे जानुसमे मूदौ। शुद्धाक्तस्विन्नदेहस्य विनान्ते गव्यमाहिषम् ॥ २७ ॥

द्रावशाङ्गुलविस्तीर्णं चर्मपटुं शिरःसमम्। आकर्णबन्धनस्थानं ललाटे वस्त्रवेष्टिते ॥ २८ ॥

चैलवेणिकया बद्ध्वा माषकल्केन लेपयेत्। ततो यथाव्याधि श्रुतं स्नेहं कोष्णं निषेचयेत् ॥ २९ ॥

ऊर्ध्वं केशभुवो यावदङ्गुलं—

शिरोबस्ति-सेवनविधि—जिस व्यक्ति को इसका प्रयोग कराना हो, सबसे पहले उसका वमन-विरंचन आदि से शोधन कराकर स्नेहन एवं स्वेदन करे। उसके बाद सायंकाल उसे घुटनेभर ऊँचे तथा कोमल आसन (कुर्सी) पर बैठाकर बारह अंगुल चौड़ी तथा सिर की गोलाई के समान लम्बी गाय या भैंस के बमड़े की पट्टी के दोनों छोरों को कान के पास ले जाकर बाँध दें; बाँधने के पहले सिर के चारों ओर कपड़ा लपेटकर बाँधा हो। फिर उसकी दरारों अर्थात् छिद्रों को उद्गद के सने हुए आटे से लीप दें। तदनन्तर रोग के अनुसार औषधकल्क को डालकर पकाये गये स्नेह को गुनगुना करके सिर के ऊपर उस शिरोबस्ति में उतना भर दें जिससे वह स्नेह केशभूमि से एक अंगुल ऊपर तक भर जाय ॥ २७-२९ ॥

—धारयेच्च तम्। आवक्त्रनासिकोक्लेदाद्वाष्टौ पट् चलादिषु ॥ ३० ॥

मात्रासहस्रगुण्यरुजे त्वेकं—

शिरोबस्ति-धारणकाल—उस स्नेह को तब तक धारण करे जब तक मुख एवं नासिका से जल का स्राव न होने लग जाय और वातरोग में दस हजार मात्रा, पित्तविकार में आठ हजार मात्रा, कफरोग में छः हजार मात्रा और स्वस्थ पुरुष में एक हजार मात्रा काल तक इसे धारण करना चाहिए ॥ ३० ॥

—स्कन्धादि मर्दयेत्। मूक्तस्नेहस्य—

पश्चात्कर्म—इतनी देर धारण कर लेने के बाद उस तेल को निकाल लें और सिर में बाँधी गयी बस्ति को खोल लें। तदनन्तर उसके कन्धे आदि अवयवों पर मालिश करें।

—परमं सप्ताहं तस्य सेवनम् ॥ ३१ ॥

शिरोबस्ति-सेवन की अबधि—इस प्रकार शिरोबस्ति का प्रयोग (स्नेहपान की भाँति) अधिक-से-अधिक एक सप्ताह तक करना चाहिए ॥ ३१ ॥

धारयेत्पूरणं कर्णे कर्णमूलं विमर्दयन्। रुजः स्यान्मार्दवं यावन्मात्राशतमवेदने ॥ ३२ ॥

कर्णपूरण का काल—रोगी को किसी एक करवट लेटाकर कान के छिद्र में तेल डालना या भरना चाहिए और साथ ही वह कान की जड़ में अंगुली से मसलता रहे। जब तक कान में उत्पन्न पीड़ा शान्त न हो तब तक लेटे रहना चाहिए। स्वस्थ पुरुष के कान में यदि तेल डाला गया हो तो एक मात्रा परिमित काल तक लेटे रहना चाहिए ॥ ३२ ॥

यावत्यर्थिति हस्ताग्रं दक्षिणं जानुमण्डलम्। निसेपोन्मेषकालेन समं मात्रा तु सा स्मृता ॥ ३३ ॥