अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
मात्राकाल की परिभाषा—जितना समय घुटना के ऊपर हाथ घुमाने में लगता है अथवा आँख की पलक उठाने तथा गिराने में लगता है, उतने समय का नाम एक मात्रा है। यह समय प्रायः ३ मिलिट का होता है॥ ३३ ॥
कचसदनसितत्वपिअरत्वं परिफुटनं शिरसः समीररोगान् ।
जयति, जनयतीन्द्रियप्रसादं स्वरहनुमूर्द्धबलं च मूर्द्धतैलम् ॥ ३४ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने गण्डूपादिविधितार्म द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
मूर्धतैल का फल—सिर के ऊपर निरन्तर तैल के प्रयोग से बालों का टूटना, झड़ना, सफेद अथवा पीला पड़ना, सिर की त्वचा का फटना तथा सिर सम्बन्धी वातरोगों का विनाश हो जाता है। यह इन्द्रियों की अपने-अपने विषय की ग्रहणशक्ति को बढ़ाता है और इन्द्रियों को प्रसन्न रखता है। स्वर, हनु, सिर को बलवान् बनाता है॥ ३४ ॥
वक्तव्य—अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान अध्याय २१ में इसका संकेत पहले किया जा चुका है, वहाँ देखें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में गण्डूपादि विधि नामक बार्हसर्वा अध्याय समाप्त ॥ २२ ॥