अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः
अथात आश्रोतनाञ्जनविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से आश्रोतनाञ्जनविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—पिछले अध्यायों में ऊर्ध्वजगुप्त रोगों तथा उनके प्रतीकारों का निर्देश किया गया है, अतएव गण्डूषादिविधि के बाद अब यहाँ नेत्ररोगों के प्रतिषेध के लिए आश्रोतन तथा अञ्जन विधानों को प्रस्तुत किया जा रहा है। महर्षि सुश्रुत तथा चरक ने 'आश्च्योतन' शब्द का और श्रीवामभट ने 'आश्रोतन' शब्द का प्रयोग किया है। इसे व्याकरण की दृष्टि से देखें—'इरितो बा' (३।१।५७)——'यकारहितोऽप्ययम्'। अर्थात् उक्त शब्द 'य' सहित एवं 'य' रहित दोनों ही प्रकार से शुद्ध है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—ज.चि. २६; सु.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३२ में देखें।
सर्वेषामक्षिरोगाणामादावाश्रोतनं हितम् । एकोदकगङ्गुधर्पाश्रुदाहरागनिर्बर्हणम् ॥ १ ॥
आश्रोतन का वर्णन—सभी प्रकार के नेत्ररोगों में सबसे पहले आश्रोतनविधि हितकारक होती है। इसके प्रयोग से नेत्रों में होने वाली पीड़ा, गड़ने या सूई चुभने की-सी पीड़ा, खुजली, घर्ष (रगड़—मानो आँख के भीतर बालू के कण घुस गये हों, उस प्रकार का कष्ट), आसुओं का बहना, दाह तथा लालिमा हट जाती है ॥ १ ॥
उष्णं वाते, कफे कोष्णं, तच्छीतं रक्तपित्तयोः ।
दोषानुसार आश्रोतन—वातज नेत्ररोगों में उष्णवीर्य तथा उष्णस्पर्श युक्त, कफूज विकारों में गुनगुना और रक्तज तथा पित्तज विकारों में शीतवीर्य तथा शीतस्पर्श द्रव का आश्रोतन कराना चाहिए।
निवातस्थस्य वामेन पाणिनोस्मौल्य लोचनम् ॥ २ ॥
शुक्ती प्रलम्ब्याऽन्येन पिचुवर्त्या कनीनिके । दश द्वादश वा बिन्दून् द्रघङ्गुलादवसेचयेत् ॥ ३ ॥
ततः प्रमूष्य मुदुना चैलेन, कफवातयोः । अन्येन कोष्णपानीयप्लुतेन स्वेदयेन्मृदु ॥ ४ ॥
आश्रोतन-विधि—नेत्ररोगी को निवातस्थान (जहाँ सीधा हवा का प्रकोप न हो) में लिटाकर चिकित्सक अपने बाँये हाथ से उसकी आँख को खोलकर दाहिने हाथ से लम्बी सीप में रखी हुई औषधि को अथवा दूसरी पिचु (रई के फाहा) की बत्ती से दोनों नेत्रों की कनीनिकाओं (नासिका के समीप के नेत्रसन्धियों) को दो अंगुल ऊपर से १० या १२ बूँदों से सींचे। तदनन्तर मुलायम तथा साफ वस्त्र से उसे साफ कर दें। यदि कफज अथवा वातज विकार हो तो गुनगुने जल में भिगाये हुए दूसरे फाहा से हल्का-सा नेत्रों के ऊपर स्वेदन करना चाहिए ॥ २-४ ॥
वक्तव्य—'श्च्युतिरु सरणे' धातु का अर्थ बूँद-बूँद गिरना, टपकना, बहना तथा रिसना आदि होता है, किन्तु सेचन-क्रिया भी इसी से सम्बन्धित है। जैसे—नेत्रों पर पोटली रखना, धारा गिराना आदि ये सब उसी के अर्थ हैं। ऊपर महर्षि वामभट ने 'शुक्तौ प्रलम्ब्या' पाठ स्वीकार कर द्रविड प्राणायाम किया है और श्रीहेमाद्रि ने उसका 'शुक्तिस्थद्रवनिमग्नार्द्रया' यह अर्थ किया है। यदि यहाँ 'शुक्त्या' पाठ स्वीकार कर लिया जाय तो 'प्रलम्ब्या' इसका विशेषण हो जायेगा। 'अन्येन' पद का अर्थ है—'दक्षिणकरण'।