भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदये

सुखोणोदकगण्डूषैर्जायते वक्त्रलाघवम्।

सुखोणोदक गण्डूष—गुनगुने जल के गण्डूष करने से मुख के भीतर हलकापन आ जाता है।

निवाते सातपे स्वित्तमुदितस्कन्धकन्धरः ॥१०॥

गण्डूषमपिबन् किञ्चिदुन्नतास्यो विधारयेत्।

गण्डूष करने की विधि—हवा रहित स्थान में तथा जहाँ धूप लग रही हो ऐसे स्थान में बैठकर कन्धों तथा गरदन पर स्वेदन कराने के बाद मर्दन कराकर गण्डूषद्रव को बिना पिये मुख को उठाकर धारण करें। ऐसा करने से उस गण्डूषद्रव का प्रभाव गले के छिद्र से लेकर सम्पूर्ण मुखगुहा पर पड़ता रहेगा ॥१०॥

कफपूर्यास्त्या यावत्स्रवद्राणाक्षताऽथवा ॥११॥

गण्डूष-धारण की अवधि—जब तक मुख के भीतर पूरा कफ न भर जाय और जब तक नासिका तथा आँखों से प्राव न होने लग जाय, तब तक उस गण्डूष को मुख में रखें, फिर थूक दें। ऐसा ५ अथवा ७ बार करें ॥११॥

असन्नायौ मुखे पूर्णे गण्डूषः, कवलोऽन्यथा।

गण्डूष एवं कवल परिभाषा—गण्डूष में औषधद्रव से पूरा मुख इतना भर लिया जाता है कि वह फिर मुख के भीतर हिलाया नहीं जा सकता, इसे 'गण्डूष' कहते हैं और 'कवल' उसे कहते हैं जो द्रव मुख में भर लेने पर इधर-उधर हिलाया जा सके। यही दोनों में भेद है।

वक्तव्य—शाङ्कधराचार्य का कथन है कि द्रव द्रव्य से 'गण्डूष' और कल्क द्रव्य से 'कवल' प्रयोग किया जाता है। पान को मुख में लेकर बहुत समय तक रखना या घुलाना यह 'कवल' का ही एक भेद है। 'कवल' का एक पर्याय 'ग्रास' (कौर) भी है।

मन्याशिरःकर्णमुखाक्षिरोगाः प्रसेककण्ठामयवक्त्रशोषाः ॥१२॥

हल्लासतन्द्राचिपीनसाश्च साध्या विशेषात्कवलग्रहेण।

कवल-धारण के लाभ—मन्यास्तम्भ, शिरोरोग, कर्णरोग, मुखरोग, नेत्ररोग, लालाप्राव, कण्ठरोग, मुखशोष, हल्लास (जी मिचलाना), तन्द्रा (डेंड्राई), भोजन के प्रति अरुचि एवं प्रतिशयाम नामक रोग कवलधारण करने पर मुखसाध्य होते हैं ॥१२॥

कल्को रसक्रिया चूर्णस्त्रिविधं प्रतिसारणम् ॥१३॥

प्रतिसारण के भेद—प्रतिसारण (मंजन) तीन प्रकार का होता है—१. कल्क, २. रसक्रिया तथा ३. चूर्ण ॥१३॥

वक्तव्य—प्रतिसारण शब्द की निष्पत्ति इस प्रकार है—'प्रति + सु + णिच् + ल्युट्। इसका अर्थ है—मंजन, मलहम लगाना आदि। इसका उल्लेख सु. चि. २२ (मुखरोग-चिकित्सा) में अनेक स्थलों में आया है। देखें—श्लोक ५, १३, १४, २० आदि। कल्क = चटनी। रसक्रिया—'क्वाथादीनां पुनः क्वाथाद् घनत्वं सा रसक्रिया'। अर्थात् क्वाथ किये गये रस को पकाते-पकाते गाढ़ा (अबलेह जैसा) करना। चूर्ण—सूखे द्रव्यों को कूट-छानकर तैयार किये गये द्रव्य को चूर्ण कहते हैं। जैसे—विफल के क्वाथ से गण्डूष, कल्क से कवल, चूर्ण से प्रतिसारण और रसक्रिया का मलहम की भाँति प्रयोग।

युज्यतात् कफरोगेषु गण्डूषविहितोषधैः।

प्रतिसारण का प्रयोग—गण्डूष के लिए निर्दिष्ट औषधद्रव्यों द्वारा निर्मित प्रतिसारणों का प्रयोग कफजनित मुखरोगों में करना चाहिए।