भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

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अष्टाङ्गहृदय

मुदु धूम के द्रव्य—अगुरु, गुगुलु, मोथा, धुनेर, शैलेय ( छरीला ), जटामांसी, खस, नेत्रबाला, दालचीनी, रणुका, मुलेठी, बेल् की गिरी, एलबालुक, श्रीवेष्टक ( चीड़ की गोद = विरोजा या लीसा ), सर्जरस ( राउ ), ध्यामक ( कतुण ), मदन ( मोम ), नागरमोथा, शल्लकी ( सलाई = चीड़ की लकड़ी ), कुंकुम, उड़द, जी, कुन्दुक गोद, तिल, बादाम आदि फलों के तेल, चन्दन आदि सार वाले काष्ठों के स्नेह ( तेल ), मेदस, मज्जा, वसा और घृत इन द्रव्यों से मुदु धूम का निर्माण किया जाता है ॥ १३-१५ ॥

शमने शल्लकी लाक्षा पृथ्वीका कमलोत्पलम् । न्यग्रीधोदुम्बराश्वत्यलक्षरोघत्वचः सित्ता ॥ १६ ॥

यष्टीमधु सुवर्णत्वक् पद्यकं रक्त्यष्टिका । गन्धाश्चाकृष्टतगराः—

मध्य धूम के द्रव्य—इसी को शमन धूम भी कहते हैं। शल्लकी ( सलाई ), लाख, पृथ्वीका, कमल, नीलकमल, बरगद, गूलर, पीपल, पाकर, लोघ ( इन वृक्षों ) की छालें, मिश्री, मुलेठी तथा अमलतास की छाल, पद्मकाष्ठ, मजीठ, कूठ तथा तगर अथवा कूठ एवं तगर को छोड़कर एलादि गण में कहे गये सभी सुगन्धद्रव्यों का ग्रहण किया जाता है ॥ १६ ॥

—तीक्ष्णे ज्योतिष्मती निशा ॥ १७ ॥

दशमूलमनोह्वालं लाक्षा श्वेता फलत्रयम् । गन्धद्रव्याणि तीक्ष्णानि गणो मूर्द्धविरेचनः ॥ १८ ॥

तीक्ष्ण धूम के द्रव्य—मालकौगुनी, हल्दी, दशमूल, मैनमिल, हरिताल, लाख, अपामार्ग ( चिरन्दि ), त्रिफला, तीक्ष्ण गन्धद्रव्य तथा शिरोविरेचन गण के द्रव्यों का प्रयोग ( देखें—अ.हृ.सू. १५।४ ) इस योग में किया जाता है ॥ १७-१८ ॥

जले स्थितामहोरात्रमिपीकां द्वादशाङ्गुलाम् । पिष्टैर्धूमोपधैरेवं पञ्चकृत्वः प्रलेपयेत् ॥ १९ ॥

वर्तिरङ्गुण्डकस्थूला यवमध्या यथा भवेत् । छायाशुष्कां विगर्भा तां स्नेहाभ्यक्तां यथायथम् ॥

धूमनेत्रार्पितां पातुमग्निरुष्ट्यां प्रयोजयेत् ।

धूमवर्ति-तिर्माणविधि—सरपत की १२ अंगुल लम्बी नली को १ दिन-रात पानी में डाल दें। जब वह भीगने से फूल जाय तब उसके ऊपर उक्त धूमद्रव्यों को पीसकर ५ बार लेप करें। प्रत्येक बार का लेप सूख जाने पर तब दूसरा लेप करें। जब यह लेप अंगूठाभर मोटा हो जाय और उसका आकार जी के सदृश ( आगे-पीछे पतला बीच में मोटा ) हो तब इसे छाया में सूखा लें। जब वह भलीभाँति सूख जाय तो उसके बीच में से सरपत की नली निकाल लें। उस धूमवर्ति को घी आदि से चुपड़ कर धूमनेत्र में लगाकर बीड़ी-सिगरेट की भाँति उसे जलाकर धूमपान करें ॥ १९-२० ॥

वक्तव्य—बीड़ी, सिगरेट, चुफ्ट, सिगार आदि इसी धूमवर्ति के अद्यतन प्रतिनिधि द्रव्य हैं। अन्तर इतना ही है कि इनमें मादक द्रव्य होते हैं और धूमवर्ति में रोगनाशक औषध-द्रव्य हैं।

शरावसम्पुटच्छिद्रे नाडीं न्यस्थ दशाङ्गुलाम् ॥ २१ ॥

अष्टाङ्गुलां वा वक्त्रेण कासवान् धूममापिबेत् ।

कासघ्न धूमपान-विधि—शरावसम्पुट के छिद्र में १० अंगुल अथवा ८ अंगुल लम्बी नली लगाकर कासरोगी धूमपान करें। इस यन्त्र से मुदु, मध्य तथा तीक्ष्ण सभी प्रकार का धूमपान किया जा सकता है ॥

वक्तव्य—शरावसम्पुट का वर्णन अ.सं.सू. २०।१४ में देखें।

कासः श्वासः पीनसो विस्वरत्वं पूर्तिर्गन्धः पाण्डुता केशदोषः ।

कर्णास्याक्षिद्रावकण्ड्वर्तिजाड्यं तन्ना हिम्भा धूमपं न स्मृशन्ति ॥ २२ ॥

इति श्रीवेद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्भागवतविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां

प्रथमे सूत्रस्थाने धूमपानविधिर्नैकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥

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