अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
लंघन का फल—लंघन या उपवास करने से स्नेहन तथा स्वेदन विधियों का सेवन करने के कारण जो मिचलाने से तथा मल-मूत्र आदि मलों की स्कावट से उत्पन्न होने वाली किसी प्रकार की बाधा से पीड़ित नहीं होता।
संशोधनासविद्यावस्नेहयोजनलङ्घनैः ॥४५॥
यात्यग्रिमन्दतां तस्मात् क्रमं पेयादिमाचरेत्।
पेया आदि की आवश्यकता—वमन, विरेचन, रक्तप्रावण, स्नेहपान तथा लंघन करने के बाद प्रायः जठराग्नि मन्द पड़ जाती है, अतः पेया आदि का आचरण ( सेवन ) करना चाहिए॥ ४५॥
सुताल्पपित्तश्लेष्माणं मद्यपं वातपैतिकम्॥४६॥
पेयां न पाययेत्तेषां तर्पणादिक्रमो हितः।
पेया-सेवन का निषेध—जिसका पित्त तथा कफ थोड़ा-सा निकला हो, जो मद्यपान का अभ्यासी हो, जो वातपित्तज विकारों से पीड़ित हो—इन सभी को पेया का सेवन न करायें। इनके लिए तर्पण ( सन्तर्पण ) चिकित्सा लाभदायक होती है॥ ४६॥
वक्तव्य—च.सू.अ. २३ सम्पूर्ण में तथा अष्टांगहृदय १४८-९ में इस विषय को देखें।
अपक्वं वमनं दोषान् पच्यमानं विरेचनम्॥४७॥
निर्हरिद्रमनस्यातः पाकं न प्रतिपालयेत्।
वमन-विरेचन की प्रतीक्षा—वमनकारक औषधद्रव्य सेवन करने के पश्चात् बिना पचे ही दोषों को निकाल देते हैं और विरेचनकारक औषधद्रव्य पचते हुए अर्थात् कुछ देर से दोषों को निकालते हैं। अतएव वमनकारक औषधद्रव्य की देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए॥ ४७॥
वक्तव्य—उक्त ४७वाँ श्लोक श्रीवामभट ने च.क. १२६२ से अविकल रूप में उद्घुट करने पर भी 'दोष' के स्थान पर 'दोषान्' पाठभेद किया है।
दुर्बलो बहुदोषश्च दोषपाकेन यः स्वयम्॥४८॥
विरिच्यते भेदनीयेभोज्येस्तमुपादयेत्।
वमन-विरेचन की चिकित्सा—यदि उदर सम्बन्धी दोष अधिक हों और रोगी दुर्बल हो, ऐसी स्थिति में दोषों का पाक हो जाने के कारण औषधद्रव्यों के प्रयोग किये बिना यदि स्वयमेव विरेचन हो रहे हों तो उसे मलभेदक आहारों का प्रयोग कराना चाहिए॥ ४८॥
वक्तव्य—स्वयमेव होने वाले वमन या विरेचन को तत्काल रोकने का प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिए, अपितु उनकी गतिविधि की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि वे दोष निकल जाने पर स्वयं शान्त हो जाते हैं, तो इसे ईश्वर की कृपा समझें। यदि इनका क्रम चालू रह जाता है तो इनकी चिकित्सा करें।
दुर्बलः शोथितः पूर्वमल्पदोषः कुशो नरः॥४९॥
अपरिज्ञातकोष्ठश्च पिबेन्मृदुल्पमौषधम्।
मृदु विरेचन का निर्देश—जो सम्प्रति दुर्बल हो, जिसे पहले संशोधन कराया जा चुका हो, जिसके उदरप्रदेश में थोड़ा दोष शेष रह गया हो, जो मनुष्य कुश हो और जिसके कोष्ठ के सम्बन्ध में भलीभाँति जानकारी न हो कि यह व्यक्ति क्रूर कोष्ठ वाला है या मृदु कोष्ठ वाला है, उसे वमन या विरेचन कारक पहले मृदु औषध अल्प मात्रा में दें॥ ४९॥
वरं तदसकृत्पीतमन्यथा संशयावहम्॥५०॥
हरेद्रहृंश्चलान्दोषानल्पानल्पान् पुनःपुनः।
औषध-प्रयोग में सावधानी—वमन या विरेचनकारक औषधि को थोड़ा-थोड़ा बार-बार पीना अच्छा ( समझदारी ) है और एक साथ अधिक मात्रा में औषध का सेवन करना हानिकारक हो सकता