अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवमनविरचनाविधिरध्यायः १८ ]
सूत्रस्थानम्
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है। अतएव अधिक दोषों को अथवा स्वयं निकलने वाले दोषों को थोड़ा-थोड़ा बार-बार निकल जाने देना चाहिए ॥५०॥
दुर्बलस्य मृदुद्वयैरल्पात् संशमयेत् तान् ॥५१॥
दुर्बल के दोषों पर विचार—दुर्बल (कमजोर) पुरुष के थोड़े दोषों को मृदुविरचक द्रव्यों द्वारा यथासम्भव शमन-चिकित्सा द्वारा शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिए ॥५१॥
क्लेशयन्ति चिरं ते हि हन्युर्वैनमनिर्हृताः ।
दोषनिर्हरण की आवश्यकता—यदि स्ल्पमात्रा में बचे हुए वे दोष शोघन-विधि से नहीं निकाले जाते तो वे उस पुरुष को चिरकाल तक कष्ट देते रहते हैं अथवा इसे मार डालते हैं।
वक्तव्य—इसी विषय को दृष्टि में रखकर भगवान् पुनर्वसु ने भी कहा है—‘दुर्बलोऽपि महादोषो विरच्यो बहुशोऽल्पशः । मृदुभिर्भेषजैर्दोषा हन्युर्वैनमनिर्हृताः’ ॥ (च.क. १२।६९)
मन्दाग्निं कूरकोष्ठं च सक्षारलवणैर्घृतैः ॥५२॥
सन्धुक्षिताग्निं विजितकफवार्तं च शोधयेत् ।
पुनः शोघन-निर्देश—मन्दाग्नि तथा कूरकोष्ठ वाले व्यक्तियों को जवाखार तथा लवण मिले हुए घी का सेवन कराकर उनकी जठराग्नि को प्रदीप्त करे और उसके कफ एवं वार्त दोष पर विजय प्राप्त करें, तदनन्तर उनका संशोधन करें ॥५२॥
रूक्षबह्निरलिकूरकोष्ठव्यायामशीलिनाम् ॥५३॥
दीप्ताग्निनां च भेषज्यमविरच्यैव जीर्यति । तेष्यो बस्तिं पुरा दद्यात्ततः स्निग्धं विरेचनम् ॥५४॥
शकुन्त्रिर्हृत्य वा किञ्चित्तीक्ष्णाभिः फलवर्तिभिः । प्रवृत्तं हि मलं स्निग्धो विरेको निहरैत्सुखम् ॥
विरचन में विविध विचार—जिनका कोष्ठ रूक्ष (रूखा) है, वातदोष अवरुद्ध है, जिनका कोष्ठ कूर है, जो निरन्तर व्यायाम किया करते हैं तथा जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त है; इस प्रकार के व्यक्तियों को दी गयी विरेचनकारक औषधि बिना अपना कार्य (विरचन) किये ही पच जाती है। ऐसे पुरुषों को विरेचक औषध देने से पहले अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए अथवा तीक्ष्ण विरेचक द्रव्यों द्वारा बनायी गयी फलवर्ति का गुद में प्रवेश कराये। इससे जब थोड़ा मल निकल जाय तब स्निग्ध विरेचन देना चाहिए, इस विधि से मल सुखपूर्वक निकल आता है ॥५३-५५॥
विषाभिघातपिटिकाकुष्ठशोफविसर्पिणः । कामलापाण्डुमेहार्तात्रातिस्निग्धान् विशोधयेत् ॥
शोघन के अयोग्य रोगी—विषविकार, अभिघात, पिडका, कुष्ठ, शोथ, विसर्प, कामला, पाण्डुरोग तथा प्रमेहरोग से पीड़ित व्यक्तियों को थोड़ा-सा स्नेहन कराकर तभी विरेचन-औषधि का प्रयोग कराना चाहिए। विरेचन-देने के पहले स्नेहन कराना आवश्यक है किन्तु जिन्हें स्नेहन-प्रयोग कराया गया है, उन्हें रूक्ष विरेचन देना हितकर होता है ॥५६॥
सर्वान् स्नेहविरैकैश्च, रूक्षैस्तु स्नेहभावितान् ।
शोघन के भेद—जिनका थोड़ा-सा स्नेहन किया गया है, विष-सेवन से पीड़ित जो थोड़े रूक्ष हैं इनका स्नेहयुक्त विरेचक औषधों द्वारा शोघन करना चाहिए और जिनका भलीभाँति स्नेहन किया गया हो उनका रूक्ष विरेचक पदार्थों द्वारा शोघन करना चाहिए।
कर्मणां वमनादीनां पुनरप्यन्तेऽन्तेरे ॥५७॥
स्नेहस्वेदी प्रयुज्जीत, स्नेहमन्ते बलाय च ।
स्नेहन-स्वेदन प्रयोग—वमन तथा विरेचन जब कराये जा रहे हों उस काल में इनके बीच-बीच में बार-बार स्नेहन एवं स्वेदन प्रयोग कराते रहने चाहिए। ऐसा न तोच लें कि प्रारम्भ में तो स्नेहन-स्वेदन करा दिये थे, वे ही पर्याप्त हैं। प्रत्येक प्रकार की चिकित्सा-विधि के अन्त में रोगी का बल बढ़े, इस सदिच्छा से उसे स्नेहन कराना चाहिए ॥५७॥