अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य —भगवान् धन्वन्तरि ने स्नेह को जीवनोंपयोगी बतलाते हुए इस प्रकार कहा है—‘स्नेहसारोऽयं पुरुषः’...‘द्योज्यः’। (सु.चि. ३१।३) अर्थात् यह पुरुष स्नेह के सहारे ही स्वस्थ रह पाता है और प्राणों का भी मुख्य आधार स्नेह ही है। प्रायः रोग भी स्नेहसाध्य होते हैं, अतः स्नेह का प्रयोग पीने, अनुवासन, शिरोविरेचन, शिरोबस्ति, उत्तरबस्ति, तस्य, कर्णपूरण (कान में डालने), शरीर पर मालिश करने तथा भोजन के साथ किया जाता है।
मलो हि देहादुत्कलेश्य ह्रियते वासतो यथा ॥५८॥
स्नेहस्वेदेस्तथोत्किल्लघ्वः शोध्यते शोधनैर्मलः।
मलों का उत्कलेशन —जिस प्रकार कपड़ा पर जमी हुई मैल को स्नेहन (स्नेह तथा क्षार प्रधान पदार्थ साबुन) तथा स्वेदन (गरम पानी) द्वारा उभाड़ कर निकाला जाता है, उसी प्रकार शरीर स्थित मलों को स्नेहन एवं स्वेदन विधियों से उत्कलेशन (उभाड़) कर वमन एवं विरेचन नामक शोधनों से बाहर निकाल दिया जाता है ॥५८॥
स्नेहस्वेदावनभ्यस्य कुर्यात्संशोधनं तु यः ॥५९॥
द्वार शुष्कमिवानामे शरीरं तस्य दीर्यते।
स्नेहन-स्वेदन के लाभ —स्नेहन तथा स्वेदन का अभ्यास (निरन्तर सेवन) किये बिना जो रोगी संशोधन का प्रयोग करता है, उसका शरीर उस प्रकार फट जाता है जैसे स्नेहन तथा स्वेदन किये बिना झुकाने का प्रयत्न करने पर सूखी लकड़ी टूट या फट जाती है ॥५९॥
बक्तव्य —सामान्य रूप से स्नेहन-स्वेदन किये कराये बिना वमन तथा विरेचन होते भी हैं और कराये भी जाते हैं। यहाँ जो प्रमुख रूप से स्नेहन-स्वेदन की चर्चा है, वह पञ्चकर्म-विधि को ध्यान में रखकर ही की गयी है।
बुद्धिप्रसादं बलमिन्द्रियाणां धातुस्थिरत्वं ज्वलनस्य दीपितम्।
चिराच्च पाकं वयसः करोति संशोधनं सम्यगुपास्यमानम् ॥६०॥
इति श्रोवैद्यपतिसिंहगुप्तसुश्रुतमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां
प्रथमे सूत्रस्थाने वमनविरेचनविधिर्नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥
संशोधन से लाभ —शास्त्रोक्त विधि द्वारा सेवन किया गया संशोधन (वमन-विरेचन) बुद्धि को निर्मल करता है, इन्द्रियों को बल प्रदान करता है, रस-रक्त आदि धातुओं में स्थिरता ला देता है, ज्वलन (जठराग्नि) को प्रदीप्त कर देता है और चिरकाल तक वृद्धावस्था को समीप नहीं आने देता। ये ही भाव जीवन में अपेक्षित होते हैं ॥६०॥
बक्तव्य —भगवान् पुनर्वसु ने संशोधन-विधियों की प्रशंसा इस प्रकार की है—‘दोषाः कदाचित् कुर्यान्ति जिता लङ्घनपाचनैः। जिताः संशोधनैर्ये तु न तेषां पुनरुद्भवः’ ॥ (च.सु. १६।२०) अर्थात् लंघन एवं पाचन विधियों से शान्त किये वात आदि दोष कभी-कभी फिर भी कुपित हो जाते हैं, किन्तु संशोधन-विधि से जिनका निर्हरण कर दिया जाता है, उनकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती। यही संशोधन-विधि की प्रमुखता है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित
निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में
वमन-विरेचनविधि नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१८॥