भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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एकोनविंशोऽध्यायः

अथातो बस्तिविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।

इति ह् स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब हम यहाँ से बस्तिविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —इसके पहले १८वें अध्याय में वमन-विरेचन विधियों से मलों के निर्हरण-विधि का वर्णन किया गया था। बस्ति के प्रयोग से भी मल का निर्हरण किया जाता है, अतएव यहाँ वमन-विरेचन के वर्णन करने के बाद तदनुरूप बस्तिविधि का उपदेश किया जा रहा है।

बस्ति या बस्ति शब्द पर विचार —अमरकोश की रामाश्रमी टीका में 'बस्ति' शब्द की निरुक्ति—'वस निवासे' तथा 'वस आच्छादने' धातुओं से की गयी है। यहाँ वस धातु से 'वसेस्तिः' (उ. ४।१८०) सूत्र के अनुसार 'ति' प्रत्यय का योग होने से उक्त शब्द की निष्पत्ति हुई है। इसका अर्थ है—'वसति मूत्रम् अत्र', जो सर्वथा प्रसंगोचित अर्थ है। तदाकार इस यन्त्र के होने के कारण इसे भी 'बस्तियन्त्र' कहा जाता है।

बस्ति —बी.एस. आटे ने अपने कोश में 'बस्त + षच्' = बकरा, ऐसा विवरण दिया है। जहाँ बस्ति के लिए अनेक प्राणियों के चर्म आदि को लेने का विधान किया है, वहाँ अन्त में उल्लिखित 'बस्त' का ग्रहण कर उसके नाम के अनुसार इसका नाम 'बस्ति' स्वीकार कर लेना अधिक समीचीन प्रतीत नहीं होता। देखें बस्ति-निर्माण के लिए उपयोगी चर्म—सु.चि. ३५।१३ तथा च.सि. ३।१०-११। इसके बाद भी चरक-सुश्रुत आदि संहिताओं में बस्ति शब्द में 'ब' के स्थान पर 'ब' का ही प्रयोग अधिकांश देखा जाता है। आचार्य पुरुषोत्तमदेव ने स्वरचित 'बर्णदेशना' नामक ग्रन्थ में ब, व; न, ण; य, ज; श, स आदि के औचित्य पर संक्षेप में विचार किया है, आप भी उसका अनुशोल्न करें।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सि. १, २, ३; सु.चि. ३५, ३७ तथा ३८; अ.सं.सू. २८ में देखें।

वातोल्बणेषु दोषेषु वाते वा बस्तिरिष्यते। उपक्रमानां सर्वेषां सोऽग्रणीस्त्रिविधस्तु सः ॥ १ ॥ निरुहोऽन्वासनं बस्तिरुत्तरः—

बस्ति का प्रयोग —वात-प्रधान दोषों में अथवा केवल वातदोष में भी बस्ति का प्रयोग करना चाहिए। बस्ति को सभी उपक्रमों (चिकित्साविधियों) में अग्रगण्य (प्रमुख) माना जाता है। यह विधिभेद से तीन प्रकार की होती है—१. निरुह या निरुहण या आस्थापन, २. अन्वासन (अनुवासन) तथा ३. उत्तरबस्ति ॥ १ ॥

बक्तव्य —भगवान् पुनर्वसु ने बस्ति-प्रयोग की उपयोगिता को देखकर अपना तथा दूसरों का मत इस प्रकार उपस्थापित किया है—'तस्मात् चिकित्साधर्मिति ब्रुवन्ति सर्वा चिकित्सामपि बस्तिमेके' ॥ (च.सि. १४०) अर्थ स्पष्ट है।

—तेन साध्येत्। गुल्मानाहवुडफ्फ्हीहशुद्धातीसारशूलिनः ॥ २ ॥

जीर्णज्वरप्रतिशयायशुक्रानिलमलग्रहान्। वधर्माश्रमीरजोनाशान् दारुणांश्वानिलामयान् ॥ ३ ॥

बस्ति-प्रयोग से लाभ —निरुहणबस्ति के प्रयोग से गुल्म, आनाह, खुडरोग (वातरक्तरोग)—वै. निघण्टु), प्लीहविकार, शुद्धातिसार (आमदोषप्रहित अतिसार), शूल, जीर्णज्वर, प्रतिशयाय, शुक्रग्रह (शुक्र की रुकावट या शुक्रोदावर्त), वातग्रह, मलग्रह, वृद्धिरोग, अश्रमी (पथरी हो जाने पर कभी-कभी जो मूत्र में रुकावट आ जाती है), रजोरोध तथा वातज भीषण रोग शान्त हो जाते हैं ॥ २-३ ॥