अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
बक्तव्य —भगवान् धन्वन्तरि ने बस्तियों को दो भागों में बाँटा है। यथा—१. निरुहण तथा २. स्नेहन। आस्थापन और निरुहण ये नैरुहिक बस्ति के पर्यायवाची नाम हैं। इसी का भेद है—माधुवैलिकबस्ति और इसके पर्याय हैं—यापनाबस्ति, युक्तस्थबस्ति एवं सिद्धबस्ति। शरीर से दोषों को निकालने अथवा शरीर का रोहण करने के कारण इसे निरुहणबस्ति कहते हैं। आयु (यौवन) को स्थिर रखने के कारण इसी को आस्थापनबस्ति कहते हैं। माधुवैलिकबस्ति का वर्णन आगे निरुहण-चिकित्सा प्रसंग में कहा जायेगा। यथाप्रमाण कही हुई बस्ति के परिमाण में से चौथा भाग निकालने पर स्नेहबस्ति का ही भेद अनुवासनबस्ति नाम से कहा जाता है। शरीर के भीतर रह जाने पर भी जो दूषित नहीं होती अथवा जिसका प्रयोग प्रतिदिन किया जा सकता है, अतएव इसे 'अनुवासनबस्ति' कहते हैं। इसी का एक भेद है—'मात्राबस्ति'। इसमें आधे से भी आधी मात्रा ली जाती है। इसमें किसी प्रकार के परिहार की आवश्यकता नहीं होती है। देखें—सु.चि. ३५।१८।
बस्ति-परिचय —अनुवासनबस्ति की परिभाषा तो ऊपर दी गयी है। यथा—'अनुवसन् अपि न दुष्यति' अथवा 'अनुद्विसं दीयते इति अनुवासनः'। अर्थ ऊपर दिया है। यह अनुवासनबस्ति की उत्तम परिभाषा है। यापनाबस्ति —जिन बस्तियों के प्रयोग से मानव तथा स्त्री को दीर्घकाल तक युवा-युवती बनाये रखा जा सके, उन्हें 'यापनाबस्ति' कहते हैं। युक्तस्थबस्ति —आचार्य चक्रपाणि ने उक्त बस्ति का परिचय इस प्रकार दिया है—घोडे जुते हुए स्थ में बैठकर तत्काल जाने वाले व्यक्ति को भी किसी प्रकार की तैयारी किये बिना भी यह बस्ति दी जा सकती है और देने के बाद किसी प्रकार का परहेज भी इसमें नहीं करना पड़ता, यही उक्त नाम की सार्थकता है। मात्राबस्ति —'षट्पल्लौ तु भवेच्छ्रेष्ठा मध्यमा त्रिपल्ली भवेत्। कनीयस्यध्यर्धपला विधा मात्राऽनुवासनं'॥ अर्थात् चौबीस पल में से चतुर्थश (६ पल) स्नेह लेने से अनुवासनबस्ति की उत्तम मात्रा होती है। तीन पल की मध्यम मात्रा और डेढ़ पल की कनीयसी मात्रा होती है। भगवान् पुनर्वसु का कथन है —'निरुहपादांशमेन तैलम्' अर्थात् चौबीस पल निरुहद्रव्य के होने पर छः पल स्नेह की मात्रा चतुर्थश होती है, यह उत्तम मात्रा है। इसी क्रम में मध्यम तथा कनीयसी मात्रा को भी समझे। आचार्य गयी के अनुसार —६ पल स्नेहबस्ति में, ३ पल अनुवासनबस्ति में और १३ पल मात्राबस्ति में स्नेह की मात्रा होती चाहिए। उत्तरबस्ति—जो बस्ति स्त्री अथवा पुरुष के मूत्रमार्ग में दी जाती है, उसे उत्तरबस्ति कहते हैं। इसके भी निरुहण तथा अनुवासन नाम से दो भेद होते हैं।
अनास्थाप्यास्त्वत्तिस्निग्धः क्षतोरस्को भृशं कुशः। आमातिस्तारी बमिमान् संशुद्धो दत्तनावनः॥
श्वसकासप्रसेकाशौहिध्याध्मानाल्यवहयः। शूनपायः कूताहारो बद्धच्छिद्रादकोदरी॥५॥
कुष्ठी च मधुमेही च मासान् सप्त च गर्भिणी।
निरुहण के अयोज्य —जिसे अधिक स्नेहपान कराया गया हो, उःक्षत का रोगी, अत्यन्त कुश (दुर्बल), आमज अतिसार का रोगी, छर्दि ( वमन ) का रोगी, वमन-विरचन कराने के तत्काल बाद, जिसे नस्य का प्रयोग कराया गया हो, श्वासरोगी, कासरोगी, प्रसेक ( कफदोष की वृद्धि के कारण जिसके मुख से लार निकल रही हो ) का रोगी, अशौरिणी, हिचकी का रोगी, आध्यान, मन्दाग्नि, जिसके गुदप्रदेश में सूजन हो, जिसने तत्काल भोजन किया हो, बद्धगुदोदर, छिद्रोदर तथा जलोदर का रोगी, कुष्ठरोगी, मधुमेह का रोगी और जिसके गर्भ को सात मास हो गये हों ऐसी स्त्री को भी आस्थापन ( निरुहण ) बस्ति का प्रयोग नहीं कराना चाहिए॥४-५॥
बक्तव्य —भगवान् पुनर्वसु ने व.सि. २।१४ में जिन रोगियों को अनास्थाप्य कहा है, उनका परिगणन तो श्रीवाग्भट ने उक्त श्लोकों में प्रायः कर दिया है, किन्तु जिन्हें चरक ने सि. २।१४-१५में गद्य द्वारा कहा है उनका उल्लेख नहीं किया। अस्तु, उन्हें आप चरक के उक्त सन्दर्भ में देख लें। जिसे श्रीवाग्भट ने 'मासान् सप्त च गर्भिणी' कहा है, उसके स्थान पर चरक में 'आमप्रजाता' पाठ है, आप ऐसी स्थिति में भी निरुहणबस्ति का प्रयोग न करें।