भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 387 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 261

वमनविरचनविधिरध्यायः १८ ]

सूत्रस्थानम्

२२५

पुनःविरचन-प्रयोग —इस विधि से यदि अल्पमात्रा में भी विरचन हो तो उस रात्रि में उसे थोड़ा-सा हलका आहार ( दलिया, खिचड़ी आदि ) खिलाकर दूसरे दिन फिर उसे विरचक औषधि पिलायी जाय। उदरप्रदेश का भलीभाँति स्नेहन न होने के कारण यदि विरचन न हुआ हो तो उसे फिर दस दिन के बाद विरचन करने के लिए औषध-सेवन कराये। इसके पूर्व स्नेहन-स्वेदन का प्रयोग भी अवश्य करें। इस बार भी औषधयोग का समुचित विधान तथा उसे अभिमन्त्रित कर तभी उसका सेवन करना चाहिए॥ ३६-३७॥

हल्कुक्ष्यशुद्धिरुचिहल्कृत्वेः श्लेष्मपित्तयोः ॥ ३८ ॥

कण्डूविदाहः पिटिकाः पीनसो वातविड्ग्रहः । अयोगलक्षणम्—

हीनयोग ( अयोग ) के लक्षण —हृदय एवं उदर की ठीक प्रकार से शुद्धि का न होना, अतएव भारीपन की प्रतीति, अरुचि, कफ तथा पित्त के उभड़ जाने से जी मिचलाने की जैसी प्रतीति का होना, खुजली, जलन, शरीर में पिड़काओं की उत्पत्ति, पीनस ( प्रतिशय ), अपानवायु, मूत्र एवं पुरीष की प्रवृत्ति में हकावट का होना—ये लक्षण होते हैं॥ ३८ ॥

—योगो वैपरीत्ये यथोदितात् ॥ ३९ ॥

समयोग के लक्षण —ऊपर कहे गये हीनयोग के लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना समयोग कहा जाता है। यह तन्त्रकार द्वारा सूत्ररूप में निर्देश है॥ ३९ ॥

विद्विपित्तकफवातेषु निःसृतेषु क्रमात्मवेत् । निःश्लेष्मपित्तमुदकं श्वेतं कृष्णं सलोहितम् ॥ ४० ॥

मांसधवनतुल्यं वा भेदःखण्डभसेव वा । गुदनिःसरणं तृष्णा भ्रमो नेत्रप्रवेशनम् ॥ ४१ ॥

भवन्त्यतिविरिक्तस्य तथाऽतिवमनामयाः ।

अतियोग के लक्षण —इस प्रकार के विरचन में पहले पुरीष ( मल ), फिर पित्त, कफ तथा अपान-वायु के निकल जाने पर भी कफ एवं पित्त रहित मलद्वार से सफेद, काला तथा लाल अथवा मांस को घोने से जैसा वर्ण जल का हो जाता है, वैसा जल निकलने ल्याता है अथवा भेदस् के टुकड़ों का घ्राव होता है, गुदभ्रंश ( कौंच का निकलना ), बार-बार प्यास का लगना, चक्करों का आना, आँखों का भीतर की ओर को धँस जाना तथा विरचन के अतियोग होने पर वमन के अतियोग के लक्षण भी दिखलायी देने लगते हैं॥ ४०-४१ ॥

वक्तव्य —वमन के अतियोग के लक्षण इसी अध्याय के २६वें श्लोक में देखें। अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान अध्याय ८ में आमविष के लक्षणों से वमन तथा विरचन के अतियोग लक्षणों का मिलान करें। इसी 'आमविष' के कारण ही विस्मृत्तिका की उत्पत्ति होती है।

सम्यग्विरिक्तमेव च वमनोक्तेन योजयेत् ॥ ४२ ॥

धूमवर्ज्येन विधिना—

समयोग में पश्चातुक्तम् —विरचन-विधि का सम या सम्यक् योग हो जाने पर धूमपान-विधि के बिना वमनोत्तर विधि के उपचारों से इसे जोड़ें अर्थात् इसे स्नेहाचार कराये॥ ४२ ॥

—ततो वसितवानिव । क्रमेणान्नानि भुञ्जानो भजेत्कृतिभोजनम् ॥ ४३ ॥

समयोग में भोजन-विधि —स्नेहन करने के बाद समुचित वमन कराये गये पुरुष के समान लाल शालिचावलों की पेया, विलेयी आदि का भोजनकाल में सेवन करता हुआ वह बाद में स्वाभाविक भोजन का सेवन करें॥ ४३ ॥

मन्दवहिमतंशुद्रमक्षमं दोषदुर्बलम् । अदृष्टजीर्णलिङ्गं च लङ्घ्येत्पीतभेषजम् ॥ ४४ ॥

लंघन-निर्देश —विरचन करने के बाद यदि अग्नि मन्द पड़ गया हो, भलीभाँति संशोधन न हो सका हो, रोगी दुर्बल न हो, दोषों की वृद्धि से दुर्बलता आ गयी हो अथवा अपच के लक्षण दिखलायी दे रहे हों तो इन सभी स्थितियों में विरचक औषध का पान किये हुए रोगी पुरुष को लंघन कराये॥ ४४ ॥

स्नेहस्वेदौषधोत्कृत्तेशसङ्घैरिति न बाध्यते ।

१५ अ० ह०