अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
वमन-विरेचन की अवधि एवं मान—पित्त के निकलने तक वमन कराना चाहिए। इस वमन द्रव का मान विरेचनों में निकले मल के भार से आधा होना चाहिए। इसमें भी जघन्य, मध्य, प्रवर भेद से भार का निर्धारण कर लेना चाहिए और विरेचन को तब पूर्ण समझें जब उसके अन्त में कफ निकल जाय।
द्विजान् सविट्कानपनीय वेगान् मेयं विरेके, वमने तु पीतम् ॥ ३२ ॥
भारमापन-विधि—यह भार तीलने की प्रक्रिया मल के दो अथवा तीन वेगों के निकल जाने के बाद में करनी चाहिए। वमन में पहले पिलये या पीये गये मद्य आदि द्रव पदार्थों अथवा वमनकारक क्वाथ की मात्रा को छोड़ कर ही तीलना चाहिए ॥ ३२ ॥
वक्तव्य—श्रीवाग्भट ने ब.सि. १।१४ से उक्त श्लोक को अविकल उद्धृत किया है। बरक में भलीभाँति कराये गये विरेचन के ये लक्षण दिये हैं—‘म्रीतों की शुद्धि, इन्द्रियों की निर्मलता, शरीर में हलकापन, उत्साहशक्ति की प्राप्ति, अग्नि का प्रदीप्त होना, नीरोगता, क्रमशः मल, पित्त, कफ तथा अपानवायु का निकलना’ ॥ देखें—ब.सि. १।१७। ध्यान दें—कभी-कभी पित्तान्त एवं कफान्त में भले ही भ्रम हो जाय परन्तु सम्यक् वान्त तथा सम्यक् विरिक्त के जो लक्षण कहे गये हैं, उनके दर्शन होने पर वमन-विरेचन का सम्यक् योग हो गया है, ऐसा समझें।
अथैनं वामितं भूयः स्नेहस्वेदोपपादितम्। श्लेष्मकाले गते ज्ञात्वा कोष्ठं सम्यग्विरेचयेत् ॥ ३३ ॥
वमन के बाद विरेचन—वमन कराने के बाद पुनः विधिपूर्वक स्नेहन-स्वेदन कराकर श्लेष्मकाल (प्रातःकाल) के बीत जाने पर रोगी अथवा स्वस्थ पुरुष के कोष्ठ (मुहु, मध्य, कूर भेद से) का विचार करके विरेचनोपयोगी औषधि का प्रयोग करा कर उसे विरेचन कराये ॥ ३३ ॥
वक्तव्य—भगवान् पुनर्वसु ने वमन के बाद विरेचन कराने की विधि का समुचित वर्णन ब.सू. १५।१७ में किया है, प्रसंगवश इसका अवलोकन कर लें।
बहुपित्तो मुहुः कोष्ठः क्षीरेणापि विरिच्यते।
मुहुकोष्ठ का वर्णन—जिस पुरुष के शरीर में पित्तदोष की प्रधानता होती है, उसे ‘मुहुकोष्ठ’ वाला कहते हैं। ऐसे पुरुषों को गरमा-गरम दूध पीने मात्र से विरेचन हो जाता है।
प्रभूतमास्तः कूरः कृष्णशुष्कचामादिकैरपि ॥ ३४ ॥
कूरकोष्ठ का वर्णन—जिस पुरुष के शरीर में वातदोष की प्रधानता होती है, उसे ‘कूरकोष्ठ’ वाला कहते हैं। ऐसे पुरुषों को काली निशोथ, जो तीक्ष्ण विरेचक होती है, के प्रयोग से भी बड़े कष्ट के साथ विरेचन हो पाता है ॥ ३४ ॥
कर्पायमधुरैः पित्ते विरेकः, कटुकैः कफे। स्निग्धोष्णलवणैर्वायी—
दोषानुसार विरेचन—पित्तज विकारों में कषाय तथा मधुर रस-प्रधान द्रव्यों द्वारा विरेचन देना चाहिए। कफज विकारों में कटुस-प्रधान द्रव्यों से विरेचन दें और वातज विकारों में स्निग्ध तथा उष्णवीर्य द्रव्यों में लवण मिलाकर विरेचन देना चाहिए।
—अप्रवृत्ती तु पाययेत् ॥ ३५ ॥
उष्णाम्बु, स्वेदयेदस्य पाणितापेन चोदरम्।
विरेचक-उपाय—यदि उक्त औषध-प्रयोग करने पर भी विरेचन न हो रहा हो तो उसे गुनगुना जल पिलाया चाहिए और हाथों को सेंक कर उसके पेट को सेंकें। इन उपायों से विरेचन हो जाता है ॥ ३५ ॥
उत्थानेऽल्पे दिने तस्मिन्भुक्त्वाऽन्येद्युः पुनः पिबेत् ॥ ३६ ॥
अदृढस्तेहकोष्ठस्तु पिबेदूर्ध्वं दशाहतः। भूयोऽप्युपकृतततनुः स्नेहस्वेदविरेचनम् ॥ ३७ ॥
यौगिकं सम्यगालोच्य स्मरन्पूर्वमतिक्रमम्।