अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवमनविरचनविधिरध्यायः १८ ]
सूत्रस्थानम्
२२३
ततः सायं प्रभाते वा भुद्धान् स्नातः सुखास्व्नुना । भुञ्जानो रक्तशाल्यन्त्रं भजेत्येयादिकं क्रमम् ॥
स्नान एवं भोजनविधि—भूलीभाति वमन हो जाने के बाद उसी दिन सायंकाल अथवा दूसरे दिन प्रातःकाल समुचित प्रकार से भूख लगने पर गुनगुने जल से स्नान करके पेया आदि के क्रम से लालशालि के चावलों द्वारा निर्मित भोजन करे ॥ २८ ॥
वक्तव्य—इस विषय पर मधुत का दृष्टिकोण—‘ततोऽपराह्ने’...‘भोजयेत्तम्’ । ( सु.चि. ३३।११ ) अर्थात् वमन अथवा विरचन कराने से शरीर के शुद्ध हो जाने पर गरम जल से स्नान कराकर कुलथी, मूँग या अरहर की दाल के यूप ( जूस ) के साथ अथवा जांगल प्राणियों के मांसरस से तथा लाल शालि-चावलों के योग से बनायी गयी पेया, विलेपी आदि को खिलायें। यहाँ जो वाग्भट ने रक्तशालिधान्य का ग्रहण किया है, इस सम्बन्ध में भगवान् पुनर्वसु ने कहा है—‘लोहितशाल्यः शुक्लाध्यान्यां पय्यतमत्वे श्रेष्ठतमाः’ । ( च.सू. २५।३८ ) अर्थात् लालशालि के चावल स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिए हितकर होते हैं।
पेयां विलेपीमकृतं कृतं च यूपं रसं त्रीनुभयं तथैकम् ।
क्रमेण सेवेत नरोऽन्नकालान् प्रधानमध्यवारशुद्धिशुद्धः ॥ २९ ॥
पेया आदि क्रम-निर्देश—प्रधान, मध्य तथा अवर भेद से शरीर-शुद्धि तीन प्रकार की होती है। सामान्य रूप से दो अन्नकाल ( भोजन के समय ) होते हैं—१. प्रातःकाल तथा २. सायंकाल। वमन-विरचन से शुद्ध किये गये पुरुष के आहार-भेद छः होते हैं—१. पेया, २. विलेपी, ३. अकृतयूप, ४. कृतयूप, ५. अकृत-मांसरस तथा ६. कृतमांसरस। प्रधानशुद्धि-विधि से शुद्ध पुरुष ३-३ अन्नकालों में ऊपर कही गयी पेया, विलेपी आदि का सेवन करता हुआ इस कल्प के पूरा होने पर अर्थात् १८वें दिन के बाद स्वाभाविक रूप से भोजन करे। मध्यशुद्धि-विधि से शुद्ध पुरुष २-२ अन्नकालों में उक्त पेया आदि का सेवन कर लेने पर १२वें दिन के बाद स्वाभाविक भोजन करे और अवरशुद्धि-विधि से शुद्ध पुरुष १-१ अन्नकाल में पेया आदि का छः दिनों तक सेवन करने के बाद स्वाभाविक भोजन करे ॥ २९ ॥
वक्तव्य—आचार्य वाग्भट ने उक्त श्लोक को चरकसंहिता-सिद्धिस्थान १।११ से लिया है। पेया, विलेपी, यवागु, यूप आदि का वर्णन शास्त्रसंहिता म.खं. २।१६४-१७४ में भी देखें। ‘अकृत’ उन्हें कहा जाता है, जिन्हें न छोँका जाता है और न जिनमें सोठ, नमक आदि मसाले डाले जाते। इसके विपरीत गुणों वाले भोजन को ‘कृत’ कहते हैं।
यथाऽगुरग्रिस्तृणगोमयाद्यैः सन्धुभ्यमाणो भवति क्रमेण ।
महान् स्थिरः सर्वपचस्तथैव शुद्धस्य पेयादिभिरन्तराग्निः ॥ ३० ॥
पेया आदि से लाभ—जैसे अप्रिकण को तृण ( घास-फूस ) तथा गोमय ( गोहरी, कण्डा, बनोपल ) आदि के संयोग से सुलगाने ( प्रज्वलित करने ) से वह अग्नि महान् ( पहले की तुलना में बड़ा ), स्थिर तथा सब पदार्थों को पकाने या पचाने वाला होता है; ठीक वैसे ही पेया, विलेपी आदि सुपचभय्यों के सेवन करने से जठराग्नि भी सशक्त ( खाये हुए भोजन को पचाने में समर्थ ) हो जाता है ॥ ३० ॥
जघन्यमध्यप्रवरे तु वेगाश्वत्वार इष्टा वमने षडष्टी ।
दशैव ते द्वित्रिगुणाविरके प्रस्थस्तथा स्यादद्विचतुर्गुणश्च ॥ ३१ ॥
वमन-विरचन के वेग एवं परिमाण—जघन्य ( हीन ), मध्यम तथा प्रवर ( प्रधान ) भेद से क्रमशः ४, ६ एवं ८ वेग वमनों में होते हैं तथा विरचनों में वे वेग क्रमशः १०, २० तथा ३० होते हैं। इन विरचनों में निकलने वाले मल का क्रमशः भार जघन्य विरचन में १ प्रस्थ, मध्यम विरचन में २ प्रस्थ तथा प्रवर विरचन में ४ प्रस्थ बतलाया गया है ॥ ३१ ॥
पित्तावसानं वमनं विरेकादर्द्धं, कफान्तं च विरेकमाहुः ।