भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

सूत्रस्थानम्‌ |

सडग्राहि मूत्रशकृतो

सड़ग्राहि वातपित्ता

सतिक्त स्वादु यत्पीलु

सतिक्तकटुवक्षारं

सतिक्तोषणमैरण्डं

सतुषोरणमझरुता

सतोदकण्डू: शोफस्तं

सद्य: सद्योव्रणान्‌

सन्दंशाभ्यां त्वगादिस्थ॑

सब्दिग्धनावं वृक्ष च

सन्धानकारी मधुरो

सन्धुक्षिताम्रिं विजित

सन्धौ साधारणे तेषां

सपूतिमांस सोत्सद्रं

स पेयो5शॉ5ग्निसादाश्म

सप्तपर्णकरज्जार्क

सप्तमे सप्त तान्यष्टौ

सबाष्पैश्व यदोत्तिष्ठेद्‌

सम॑ मेहनमुष्के च

समग्रगुणसारेषु

समन्तादप्यहोरात्रम्‌

समस्थूलकृशाभुक्तम्‌

समानो5 ग्रिसमीपस्थ:

समाप्यते स्थानमिदं

समाहितमुखाग्राणि

समीक्ष्य सम्यगात्मान

समोरणातपायासै:

सामो मृदुररुक शीघ्र

सम्पृक्‍ताददुष्टशुद्धास्रा

सम्भिन्नालापं व्यापाद

सम्मुखो यन्त्रयित्वा

सम्यग्गत्या च धातूना

सम्यग्दग्धे तवक्षीरि

सम्यग्घीनातियोगाश्व

सम्यग्योगेन वमितं

सम्यग्विद्धा स्र॒वेद्वारां

सम्यक्साध्या न सिद्ध्न्ति

सम्यक्‌ स्निग्धो5थवा

स योज्यो नीलिकाव्यज्भ

सरो विदाही दृक्शुक्र

सर्पास्मं प्राणकर्णार्श

१२८

१३६९

१४८

श्छोकानुक्रमणिका

अ० अंक

सर्पिर्मज्जा वसा तैलं १६ २

सर्वतो5नुसरन्‌ दोषान्‌ रे० २६

सर्वत्र चाष्टमं भागं 2 3

सर्वथेक्षेत नादित्य॑ है हे

सर्वदेहप्रविसृतान्‌ टैडे ->तस्रें४

सर्वद्रवाणां शेषाणां १९ ४५

सर्वशस्त्रानुशस्त्राणां र३े० १

सर्वात्मिना नेत्र॒बलाय २४ २२

। सर्वान्‌ स्नेहविरेकैश्व १८. ५७

सर्वेषामक्षिरोगाणा २३ ९

सर्वोषिधक्षमे देहे है

सविषा वजयित्ताभि: २६ र७

सशब्दमतिविद्धातु २७. ३५

सशेषमप्यतो धार्य॑ २७. ४६

सशोषशोफातीसार ६ १५६

ससितं माहिषं क्षीरं ३े रे

सस्फोटदाहतीव्रोष॑ रे०. ४८

सस्वादुतिक्तकटुकम्‌ ५ .--- हे

सहकाररसोन्मिश्रान्‌ कं 7--- है

सहसा सूत्रबद्धेन उरी

स हि भूरितरं दोषं ऐश

स हीनो हीनशीतादि १२५७ >>

सागारधूमलवण २७. २७

साधक हृदगतं पित्त १२८ रू

साधारणं सममलं है

साध्येठसाध्य इति व्याधि. १ १

सानुलोमानिलस्नेह (०-55 पैड

सामुद्रं तन्न पातव्यं “ीज

साम्भोजजलतीरान्ते 4 822"

सायं प्रातस्तयोर्मोक्षो रे 5७55६

सारिवोशीरकाश्मर्य मल - हर

सा शुष्का विपरीताउत: ६

सा सार्धद्यइगुला स्व २६. २२

| सिद्धां वा मत्स्यपवने ७ ० रे६

सिद्धार्थकप्रवेशाग्रं +

सिद्धिर्बस्त्यापदां षष्ठो 2-7

सिरादिदाहस्तैरेव ३67 - > ४४

सिरादिनाशस्तृष्मूर्च्छा 5५0 52% ५.

सिरास्नायुविलग्रन्तु २८: पद

सीय्येन्न दूरे नासन्ने ३3 शक

सुखायुषी परांकुर्यात्‌ ७ . ५५

सुखार्था: सर्वभूतानां

सुखाहार्य यतश्छित्वा

सुखोष्णोदकगण्ड्बै

सुगन्धिशीतहद्यानां

सुदग्धं घृतमध्वक्तं

सुनिषण्णो5ग्रिकृद्वृष्य:

सुरसयुगफणिज्जं

सुरसादिर्गण: श्लेष्म

सुराकृशानां पुष्ट्यर्थ

सुरूपाणि सुधाराणि

सुविरिक्तेक्षिलघुता

सुशीतलेपसेकाम्र

सुसंयतस्य पज्चाइ्ग्या

सूक्ष्मसृक्ष्मा: समीक्ष्यैषां

सूक्ष्मां शलाकां प्रणयेत्‌

सूचीभिरिव गात्राणि

सूत्रस्थानमिमे5 ध्यायां

सृमरश्चमर: खड़गो

सृष्टमूत्रप्रीषाश्च

सृष्टमूत्रशकृद्वातो

सेवेत कामत: काम

सेव्यादैस्तत्र गण्ड्षा:

सैन्धवं दाडिम॑ धात्री

सो5लसोत्यर्थदुष्टास्तु

सो5ल्‍्पेनाप्यपचारेण

सौधेषु सौधधवलां

सौमनस्यकृतो हद्यान्‌

सौवीरबदराड्रील्ल

सौवीरमज्जन नित्य॑

सौषिर्यलाघवकरम्‌

स्तम्भ: कषायरसता

स्तम्भनीयक्षतक्षीण

स्तम्भित: स्याद्ले लब्धे

स्त्याने5प्रे वेदना5त्यर्थ

स्त्रीणां तु स्मृति

स्त्रीस्नेहनित्यमन्दाग्नि

स्नेह विरेचनस्यान्ते

स्थाप्यो5यं मध्यम:

स्थौल्यकाश्योपचारेण

स्थौल्याग्रिसदनश्वास

स्नातो5नुलिप्त: कर्पूर

अष्टाङ्गहृदये

| अ० | अंक | | अ० | अंक | | अ० | अंक ---|---|---|---|---|---|---|---|--- स्नानमर्दिनवेनास्य | २ | १८ | स्पृष्टे पूरस्य सञ्चारो | २९ | ६ | स्वेदातियोगाच्छर्दिश्च | १७ | १७ स्नानानुलेपनहिमा | ७ | ७६ | स्मृतिमेधायुरारोग्य | ७ | ७५ | स्वेदोऽतिस्वेदीर्गन्ध | ११ | १४ स्निग्धं शीतं गुरुं स्वाः | ६ | ८४ | स्यादुदाक्शाङ्गुलोऽलावु | २५ | २७ | स्वेदो हितस्वनात्रेयो | १७ | २८ स्निग्धं सोमात्मकं शुद्ध | ११ | २८ | स्याद्यङ्गुलवित्सारः | २६ | ३३ | स्वेद्यसंशोध्यमद्यस्त्री | १६ | ५ स्निग्धः शीतो गुरुर्मन्दः | १ | १२ | स्रोतोऽशङ्कुफेनाले | २४ | १६ | स्वोन्मागार्धचतुर्थांश | २६ | ४ स्निग्धद्रवोष्णध्वनोत्थ | १६ | ३६ | स्रोतोमार्दवक्रुत्स्वेदी | ६ | २८ | ह | | स्निग्धरिवजोत्तमाङ्गुर्य | २० | १७ | स्वं स्वमुक्तानि यन्त्राणि | २५ | ३९ | हन्ति दोषत्रयं कुच्छं | ६ | ७४ स्निग्धां रुक्षां श्लक्ष्णं | २९ | ४५ | स्वकर्म्मगुणहानिः स्यात् | २८ | ६ | हरिणैण्कुट्टर्घसं | ६ | ४३ स्निग्धसं गन्धः स तीक्ष्णश्च | २१ | २ | स्वानशय्यासुखाभ्यङ्ग | १४ | ११० | हरेणुमात्रा पिण्डस्य | २३ | १५ स्निग्धोमा स्वादुतिक्तोष्णा | ६ | २४ | स्वप्नेन रात्रौ कालस्य | २३ | १९ | हरेदहैवलात् दोषान् | १८ | ५१ स्नेहकिल्बिन्ना कोष्ठागा | १७ | २९ | स्वयादजीर्णो सञ्जात | ८ | ३० | हर्म्यपुष्टे वसेद्राष्ण | ३ | ४८ स्नेहनं पयसा पिष्टे | २४ | १५ | स्वस्थानस्य कायात्रे | ११ | ३४ | हर्म्यं क्रोधं भयं चापि | २९ | ७९ स्नेहशोधनयुक्तयेवं | १९ | ६७ | स्वस्थानस्थस्य समता | १२ | २४ | हारितमार्गं हारिद्र | ७ | ४४ स्नेहसर्पप्रभाहानिः | ७ | १२ | स्वातुं निदाचे शरदि | ३ | ५६ | हासस्य दन्तकाष्ठस्य | २१ | ६ स्नेहस्वेदैस्तथोत्कलिष्टः | १८ | ५९ | स्वादुः पट्टश्च मधुरम् | ९ | २१ | हितं विषमर्णं तत्र | ४ | १५ स्नेहस्वेदी प्रयुज्जीत | १८ | ५८ | स्वदुपाकरसं नातिशीतोष्णं | ६ | १६९ | हिप्पाकासविषश्चास | ६ | १०८ स्नेहम्बेदीषधोल्लेकेश | १८ | ४५ | स्वादुपाकरसं स्निग्धं | ६ | १२२ | हिप्पाघ्नानानिल्लेख्य | ५ | १७ स्नेहेन स्वेदनस्तीक्ष्णो | १० | १३ | स्वादुपाकरसाः स्निग्धा | ६ | ४ | हिमवन्मल्योद्भूतो | ५ | १० स्नेहपीता तनुरिव | २४ | १२ | स्वादुपाकरसाः स्निग्धा | ६ | ११६ | हीनवेगः कणाधारी | १८ | २३ स्नेहपीते प्रयुक्तेषु | २७ | ८ | स्वातुं रुक्षं सलवणं | ६ | ९५ | हीनानायांतिनिपुण | २ | ४९ स्नेहस्य कल्पः सश्रेष्ठः | १६ | १७ | स्वादुल्लं शीतमुष्णं च | ६ | १३५ | हीनोऽर्थनेन्द्रियस्याल्पः | १२ | ३६ स्नेहस्यान्याभिभूतत्वा | १६ | १६ | स्वितं निष्पीडितरसं | ६ | ९६ | हृद्यं पटोलं कुमिनूत् | ६ | ७९ स्नेहान् यथास्वमेतेषां | १६ | ४५ | स्वेदः क्लेदः सुतिः कोयः | १२ | ५२ | हृद्यः केशयो गुरुत्व्यः | ६ | ११० स्नेहानामुत्तमं शीतं | ५ | ३९ | स्वेदनं गृहं तीक्ष्णोष्णं | १७ | १८ | हृद्यदीपनभैषज्य | ४ | २९ स्नेहोच्चिताश्च ये स्नेहाः | १६ | ३८ | स्वेदनं फलवर्तिं च | ८ | १६ | हृदोगकामलशिवत्र | १४ | २८ स्नेहोदेगः बलमः सम्यक् | १६ | ३१ | स्वेदनं स्तम्भनं श्लक्षणं | १७ | १९ | हृदययामुनसङ्गङ्ग | ४ | २० स्नेहोपरकृतदेहस्य | २७ | ४५ | स्वेदेषपधुमांस्ततो | ७ | १३ | हस्तने जीर्णं एवान्ते | १४ | १९ स्पृष्टे तु कण्डूदाहोपा | ७ | १९ | स्वेदस्तापीपनाहोष्य | १७ | १ | हृत्वमध्योत्तमा मात्रा | १६ | १८

॥ ३ ॥

चरकसंहिता

'वैद्यमनोरमा' हिन्दी व्याख्या विशेषवक्तव्यादि संवलित

व्याख्याकार-द्रव्य

आचार्य विद्याधर शुक्लप्रो. रविदत्त त्रिपाठी
अवकाश-प्राप्त रीडर : चरकसंहिताप्रधानाचार्य एवं अधीक्षक
राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालयराजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसीमुजफ्फरनगर

आयुर्वेदीय चिकित्सा वाङ्मय में चरकसंहिता विश्वकोष के समान चिकित्सा-विधियों का एक आकर ग्रन्थ है। आयुर्वेद की समस्त प्रतिष्ठा का श्रेय इस एक ग्रन्थरत्न को ही है, इसमें कोई अत्युक्ति नहीं है। विज्ञान चिकित्सक के लिए 'चरकसंहिता' में वर्णित चिकित्सा के व्यावहारिक ज्ञान का होना नितान्त आवश्यक मानते हैं—

सुश्रुते सुश्रुतो नैव वाग्भटे नैव वाग्भटः ।

चरके चतुरो नैव चिकित्सां कां करिष्यति? ॥

इस ग्रन्थ की विद्वज्जनसमादृत टीकाओं में सम्प्रति संस्कृत में जेज्जट, चक्रपाणि, योगीन्द्रनाथ सेन, गंगाधर राय; हिन्दी में जामनगर प्रकाशन, काशीनाथ पाण्डेय व गौरखनाथ चतुर्वेदी तथा ब्रह्मानन्द त्रिपाठी; अंग्रेजी में आचार्य प्रियव्रत शर्मा, रामकरण शर्मा एवं भगवानदास कृत टीका—ये प्रसिद्ध हैं। इसमें कुछ की टीका सम्पूर्ण और कुछ अपूर्ण हैं। इन टीकाकारों ने ग्रन्थ के अभिप्राय के साथ ही अपने विचारों की भी अभिव्यक्ति की है।

वर्तमान काल में आयुर्वेद के अध्याेता छात्र संस्कृत के मूलपाठ या संस्कृत टीका के अध्ययन में कठिनाइयों का अनुभव करते हैं। संस्कृत भाषा के अपेक्षित ज्ञान के अभाव में संस्कृत टीकाओं के माध्यम से ग्रन्थ की विषयवस्तु का ज्ञान अर्जित करना उनके लिए असम्भव है।

अद्यावधि उपलब्ध हिन्दी टीकाओं में मूल का अनुवाद करने में टीकाकारों द्वारा जिस भाषा का प्रयोग किया गया है, उसमें विषय की स्पष्ट अभिव्यक्ति, उचित शब्द-विन्यास, प्रवाह और भाषासौष्ठव का समुचित सामञ्जस्य न बन पाने के कारण इस ग्रन्थ के पढ़ने तथा विषय को ग्रहण करने में नीरसता एवं अन्धमनस्कता की स्थिति हो जाती है। इसलिए समय की पुकार, छात्रों की रुझान और उपयोगिता के विचार-मन्थन से यह आवश्यकता प्रतीत हुई कि 'चरकसंहिता' की एक ऐसी हिन्दी-व्याख्या प्रस्तुत की जाय, जिसमें रमणीयता हो, सरसता हो, सुगम-सुबोध प्रचलित शब्दों का प्रयोग एवं भाषा परिमार्जित हो, चार्ट और सारणी के द्वारा विषयों का स्पष्टीकरण हो, मूल संस्कृत के अभिप्राय को स्पष्टतया व्यक्त किया गया हो और ग्रन्थ के पढ़ने में अध्याेता की रुचि का संवर्धन हो तथा जिसके पढ़ने में मन की संलग्नता हो। अस्तु, इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर यह 'वैद्यमनोरमा' नाम की हिन्दी व्याख्या प्रस्तुत की गयी है, जिसके अध्याेता स्वयमेव इसकी सार्थकता का अनुभव करेंगे।

इस कार्याचिकित्सा-प्रधान ग्रन्थ की समस्त विशेषता प्रत्येक रोग की चिकित्सा-प्रक्रिया के वर्णन में निहित है। कहीं-कहीं लम्बे अध्याय हैं और उन सम्पूर्ण अध्यायों में कहे गये विषयों को हृदयङ्गम कर पाना कठिन होता है, इसलिए इस व्याख्या में सम्पूर्ण अध्याय के विषयों को सरलतापूर्वक मन में बैठा लेने की दृष्टि से प्रत्येक अध्याय के अन्त में संक्षिप्त सारांश दिया गया है। 'मान' के प्रकरण ( चरक. कल्प. अ. १२ ) में प्राचीन मान के साथ आधुनिक मानों का तुलनात्मक विवरण भी दिया गया है। इस प्रकार यह 'वैद्यमनोरमा' व्याख्या प्रत्येक दृष्टि से अध्याेताओं एवं जिज्ञासुओं के मन को आकृष्ट करेगी; और विशेषकर छात्रों की रुचि को जाग्रत कर विषयवस्तु को सुगमतया बोध कराने में समर्थ होगी। हमें विश्वास है कि छात्रों को विषयबोध कराने और विद्वज्जनों को ऊहापोह का अवसर प्रदान करने में यह व्याख्या सर्वथा समर्थ होगी।

१-२ भाग सम्पूर्ण