अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः ।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
यत्, पदम्, प्रेप्सवः, दीनाः, शक्राद्याः, सर्वदेवताः, अहो, तत्र, स्थितः, योगी, न, हर्षम्, उपगच्छति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यत् = | जिस | स्थितः = | स्थित होता हुआ भी |
| पदम् = | पद को | योगी = | योगी |
| प्रेप्सवः = | इच्छा करते हुए | हर्षम् = | हर्ष को |
| शक्राद्याः = | शक्रादि | न उपगच्छति = | नहीं प्राप्त होता है |
| सर्वदेवताः = | सब देवता | अहो = | यही आश्चर्य है ॥ |
| दीनाः = | दीन हो रहे हैं | ||
| तत्र = | उस पद पर |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**संसार विषे व्यवहार में स्थित हुआ भी ज्ञानी अज्ञानी के तुल्य क्यों नहीं हो सकता है ?
**उत्तर—**अज्ञानी को लाभ और अलाभ में सुख और दुःख होते हैं, परन्तु ज्ञानवान् को नहीं होते हैं । इसी से उनकी तुल्यता नहीं बन सकती है ।
जनकजी कहते हैं कि हे गुरो ! इन्द्र से आदि लेकर सब देवता जिसे आत्मपद की प्राप्ति की इच्छा करते हुए बड़ी दीनता को प्राप्त होते हैं, और जिस पद की अप्राप्ति होने में बड़े शोक को प्राप्त होते हैं, उस आत्म-पद में स्थित हुआ