भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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चौथा प्रकरण । ९५

भी योगी विषय-भोग की प्राप्ति होने से, न तो वह हर्ष को प्राप्त होता है, और न विषयों के न प्राप्त होने से या नष्ट होने पर वह शोक को प्राप्त होता है । क्योंकि आत्म सुख से अधिक और सुख नहीं है, वह उसको नित्य प्राप्त है ॥ २ ॥

मूलम् ।

तज्जस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते ।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानाऽपि संगतिः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

तज्जस्य, पुण्यपापाभ्याम्, स्पर्शः, हि, अन्तः, न, जायते,
न, हि, आकाशस्य, धूमेन, दृश्यमाना, अपि संगतिः ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तज्जस्य =उस पद को जानने- वाले केहि =क्योंकि
आकाशस्य =आकाश का
अन्तः =अन्त:करण कासंगतिः =सम्बन्ध
पुण्यपा-<br>पाभ्याम् =पुण्य और पाप के साथदृश्यमाना =देखा जाता हुआ
अपि =भी
स्पर्शः =सम्बन्धधूमेन =धूम के साथ
न जायते =नहीं होता है =नहीं है ॥

भावार्थ ।

ज्ञानवान् विधि-वाक्यों का किङ्कर नहीं होता है, इसी वास्ते उसको पुण्य-पाप भी स्पर्श नहीं करते हैं । जिस विद्वान् ने तत्पद और त्वम्पद के अर्थ को महाकाव्यों द्वारा भोग-त्यागलक्षणा करके अभेद अर्थ को निश्चय कर लिया है, उसके अन्तःकरण के धर्म जो पुण्य और पाप हैं, उनके साथ उसका