अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा प्रकरण । १०३
रहता है । तत्पद और त्वपद के लक्ष्यार्थ का भागत्याग लक्षणा करके, और महावाक्यों करके अभेदता से जो जानता है, वही अद्वैत ज्ञान है । जिसको अद्वैत ज्ञान प्राप्त है, वह विद्वान् है, वही बाधितानुवृत्ति करके सम्पूर्ण व्यवहारों को करता भी है; पर उसको किसी का भय नहीं होता है । क्योंकि उसके भय का—द्वैतज्ञान का—बाध हो गया है । इसी वार्ता को श्रुति भगवती भी कहती है— द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ १ ॥ अर्थात् द्वैत से ही निश्चय करके भय होता है । उदरमन्तरं कुरुतेऽथ तस्य भयं भवति । जो थोड़ा सा भी भेद करता है, उसको भय होता है । अन्योऽसावहमन्योस्मि न स वेद यथा पशुः । जो अपने से ब्रह्म को भिन्न जानकर उपासना करता है, वह पशु की तरह ब्रह्म को नहीं जानता है । ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति । ब्रह्मवित् ब्रह्मरूप ही होता है । तरति शोकमात्मवित् । आत्मवित् संसार-रूपी शोक से तर जाता है । इन श्रुति वाक्य से भी सिद्ध होता है कि विद्वान् को किसी दूसरे का भी भय नहीं होता है, क्योंकि उसकी दृष्टि में कोई भी दूसरा नहीं है ॥ ६ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ।
—:०:—