भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पाँचवाँ प्रकरण।

—:०:—

मूलम् ।

न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि ।
संघातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

न, ते, सङ्गः, अस्ति, केन, अपि, किम्, शुद्धः, त्यक्तुम्, इच्छसि, संघातविलयम्, कुर्वन्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ते= तेरात्यक्तम्= त्यागना
केन अपि= किसी के साथ भीइच्छसि= चाहता है
संग= संगएवम् एव= इस प्रकार ही
= नहींसंघातविलयम्= देहाभिमान का त्याग
अस्ति= हैकुर्वन्= करता हुआ
अतः= इसलियेलयम्= मोक्ष को
शुद्धः= तू शुद्ध हैव्रज= प्राप्त हो ॥
किम्= किसको

भावार्थ ।

चतुर्थ प्रकरण में शिष्य की परीक्षा के लिए उपदेश किया था, अब उसकी दृढ़ता के लिये चार श्लोकों करके लय का उपदेश करते हैं—
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! तू शुद्धबुद्ध-स्वरूप है, तेरा देह गेहादिकों के साथ अहंकार और ममत्व का