अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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पाँचवाँ प्रकरण । १०५
आस्पद-रूप करके सम्बन्ध नहीं है। जब तू असंग है, और शुद्ध है, तब फिर तेरे विषे त्याग और ग्रहण कहाँ है, इस-वास्ते अब तू देह-संघात को लय कर, अर्थात् 'मैं देह हूँ, या 'मेरा यह देह है'—ऐसे अहंकार को भी दूर करके अपने स्वरूप में स्थित हो ॥ १ ॥
मूलम् ।
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः । इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
उदेति, भवतः, विश्वम्, वारिधेः, इव, बुद्बुदः, इति, ज्ञात्वा, एकम्, आत्मानम्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भवतः= | तुझसे | एकम्= | एक |
| विश्वम्= | संसार | आत्मानम्= | आत्मा को |
| उदेति= | उत्पन्न होता है | एवम् एव= | ऐसा |
| इव= | जैसे | ज्ञात्वा= | ज्ञान करके |
| वारिधेः= | समुद्र से | लयम्= | शान्ति को |
| बुद्बुदः= | बुद्बुद | व्रज= | प्राप्त हो ॥ |
| इति= | इस प्रकार |
भावार्थ ।
जैसे समुद्र में अनेक बुद्बुदे और तरंग उत्पन्न होते हैं, फिर समुद्र में ही लय हो जाते हैं, समुद्र से भिन्न नहीं हैं,