अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
वैसे ही मन के संकल्प से यह जगत् उत्पन्न हुआ है और मन के ही लय होने से जगत् लय हो जाता है । देवीभागवत में कहा है—
शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।
बन्धमोक्षौ मनस्संस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ १ ॥
आत्मा सदैव शुद्ध और मुक्त है, वह कदापि बंध को नहीं प्राप्त होता है बंध और मोक्ष दोनों मन के धर्म हैं । मन के शान्त होने से बंध और मोक्ष का नाम भी नहीं रहता है । आत्मा में मन के लय करने से सारा जगत् लय को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥
मूलम् ।
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि ।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
प्रत्यक्षम्, अपि, अवस्तुत्वात्, विश्वम्, न, अस्ति, अमले, त्वयि, रज्जुसर्पं, इव, व्यक्तम्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| व्यक्तम् = | दृश्यमान | रज्जुसर्पं = | रज्जु सर्पं |
| विश्वम् = | संसार | इव = | सदृश भी |
| प्रत्यक्षम् अपि = | प्रत्यक्ष होता हुआ भी | न अस्ति = | नहीं है |
| अवस्तुत्वात् = | वास्तव में | एवम् एव = | इसी लिये |
| अमले = | मल रहित | लयम् = | शान्ति को |
| त्वयि = | तुझ विषे | व्रज = | ( तू ) प्राप्त हो ॥ |