अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| समदुःखसुखः= | तुल्य है दुःख और सुख जिसको | समजीवितः= मृत्युः | तुल्य है जीना और मरना जिसको |
| पूर्णः= | जो पूर्ण है | एवम् एव= | ऐसा |
| आशानैराश्ययोः= | आशा और निराशा में | सन्= | होता हुआ |
| लयम्= | ब्रह्म-दृष्टि को | ||
| समः= | जो बराबर है | व्रज= | (तू) प्राप्त हो ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! तू आत्मानंद करके पूर्ण है । दैवयोग से शरीर में उत्पन्न हुए जो सुख दुःख हैं, उनमें भी तू पूर्ण है, आशा और निराशा में भी तू सम है, जीने और मरने में भी तू सम है, तू निर्विकार है, सुख दुःखादि सब अनात्मा के धर्म हैं, और मिथ्या हैं । क्योंकि इनके धर्मी जो देहादिक हैं, वे भी सव मिथ्या हैं । उत्पत्ति से पूर्व जो देहादिक नहीं थे, और नाश से उत्तर भो नहीं रहते हैं, वे बीच में भी प्रतीतिमात्र हैं । जो वस्तु उत्पत्ति से पूर्व और नाश से उत्तर न हो, वह बीच में भो वास्तविक नहीं होती है, केवल प्रतीतमात्र ही होती है । जैसे स्वप्न के पदार्थ और रज्जु विषे सर्पादिक मिथ्या हैं, वैसे यह जगत् भी मिथ्या है । वास्तव में, तीनों कालों में नहीं है, केवल ब्रह्म ही ब्रह्म है ॥
सर्वं खल्विदं ब्रह्म ॥
यह संपूर्ण जगत् निश्चय करके ब्रह्म-रूप ही है, ऐसे चिंतन का नाम ही लयचिंतन है ॥ ४ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां पंचमं प्रकरणं समाप्तम् ॥