भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 405 में से

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पृष्ठ 116

छठा प्रकरण ।

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मूलम् ।

आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत् ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

आकाशवत्, अनन्तः, अहम्, घटवत्, प्राकृतम्, जगत्,
इति, ज्ञानम्, तथा एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आकाशवत्=आकाशवत्एतस्य=इसका
अहम्=मैंन त्याग=न त्याग है
अनन्तः=अनन्य हूँ=और
जगत्=संसारन ग्रहः=न ग्रहण है
घटवत्=घटवत्=और
प्राकृतम्=प्रकृतिजन्य हैन लयः=न लय है
तथा=इस कारणइति ज्ञानम्=ऐसा ज्ञान है ॥

भावार्थ ।

शिष्य की परीक्षा के वास्ते पाँचवें प्रकरण द्वारा गुरु ने लययोग-रूप चिंतन का उपदेश किया । अब इस छठे प्रकरण में गुरु अपने अनुभव को दिखाता हुआ लयादिकों के असंभव को दिखाता है—

लय चिंतन-रूप योग भी मेरे में नहीं बनता है । लय उसका होता है, जो उत्पतिवाला पदार्थ है । जिसकी उत्पत्ति

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