भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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छठा प्रकरण । १११

प्रश्न-अनंत-स्वरूप आत्माका देहादिकों में निवास कैसे हो सकता है ? बड़ी वस्तु छोटी वस्तु के भीतर नहीं आ सकती है ? उत्तर-जैसे घटमठादिक आकाश के निवास के स्थान हैं, और भेदक भी हैं, वैसे ही देहादिक भी अनंत-स्वरूप आत्मा के निवास का स्थान है, और भेदक भी है । वास्तव में तो यह जगत् मिथ्या माया का कार्य होने से मिथ्या है । इस प्रकार वेदान्त करके सिद्ध जो ज्ञान है, वही अनुभवरूप होकर जगत् के मिथ्यात्व में प्रमाण है, इस वास्ते लयचिंतनादिक भी जगत् के नहीं बन सकते हैं ॥ १ ॥

मूलम् । महोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः । इति ज्ञानं तथैतस्य त्यागो न ग्रहो लयः ॥ २ ॥

पदच्छेदः । महोदधिः, इव, अहम्, सः, प्रपञ्चः, वीचिसन्निभः, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंएतस्यत्यागः=इसका त्याग है
महोदधिः इव=समुद्र सदृश हूँच=और
सः=यहन=
प्रपञ्चः=संसारग्रहः लयः=ग्रहण और लय है
वीचिसन्निभः=तरंगों के तुल्य है
तथा=इस कारणइति ज्ञानम्=यह ज्ञान है अर्थात् इस प्रकार के विचार को ज्ञान कहते हैं ॥
न=