भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

११२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न--**घटाकाश के दृष्टांत से तो देह और आत्मा के भेद की शंका उत्पन्न होती है । जैसे आकाश से घट भिन्न है, और घट से आकाश भिन्न है, वैसे आत्मा से देह भिन्न है, और देह से आत्मा भिन्न है, दोनों के भिन्न-भिन्न होने से ही द्वैत साबित हुआ, अद्वैत आत्मा तो साबित न हुआ ?

**उत्तर--**जनकजी कहते हैं कि आत्मा महान् समुद्र की तरह है, उसमें प्रपंच लहरों की तरह है । इस प्रकार का अनुभव-रूप ज्ञान ही अद्वैत में प्रमाण है ॥ २ ॥

मूलम् ।

अहं सः शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद्विश्वकल्पना । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

अहम्, सः, शुक्तिसंकाशः, रूप्यवत्, विश्वकल्पना, इति, ज्ञानम्, तथा, एतस्य, न, त्यागः, न, ग्रहः, लयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सः=वहतथा=इसका कारण
अहम्=मैंएतस्य=इसका
शुक्तिसंकाशः=शुक्ति के तुल्य हूँन त्यागः=न त्याग है
विश्वकल्पना=विश्व की कल्पनान लयः=न लय है
रूप्यवत्=रजत के समान हैइति ज्ञानम्=यही ज्ञान है ॥